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Medically Verified By: Dr. (Prof) Vinit Banga
Young onset of parkinson's disease: तंत्रिका तंत्र हमारे शरीर का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा होता है और यह अन्य अंदरूनी अंगों से अलग होता है। हमारे शरीर में तंत्रिका तंत्र के बहुत से काम होते हैं, सरल शब्दों में यह हमारे शरीर की चलने-फिरने, बोलने, हंसने, निगलने और यहां तक की सांस लेने की प्रक्रिया को चलाता है। शरीर पर जितना तनाव होता है, उसके अनुसार इन प्रक्रियाओं को तेज व धीमा करने में मदद करता है। तंत्रिका तंत्र से जुड़ी कई बीमारियां हैं, जिनमें से कुछ न्यूरोडीजेनरेटिव बीमारियां होती हैं। पार्किंसन डिजीज भी उन्हीं में से एक है, जिसके होने का खतरा आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ-साथ ही होता है। लेकिन कुछ मामलों में पार्किंसन डिजीज उम्र से पहले भी हो जाता है, जिसे यंग ऑनसेट ऑफ पार्किंसन डिजीज (YOPD) कहा जाता है। बहुत ही कम लोगों को इस बारे में जानकारी होती है, लेकिन इसकी जानकारी होना बहुत जरूरी है। हमने हेल्थ एक्सपर्ट्स से बात की जिन्होंने इस बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां हमें दी। इस लेख में डॉक्टर पार्किंसन डिजीज और यंग ऑनसेट ऑफ पार्किंसन डिजीज के बारे में बताने वाले हैं।
डॉक्टर विनित बंगा ने बताया कि पार्किंसन डिजीज एक न्यूरोडीजेनेरेटिव डिजीज है, जो आमतौर पर वृद्धावस्था में पाया जाता है। आगे उन्होंने बताया कि डाटा के अनुसार यह दुनिया में होने वाला दूसरा सबसे कोमन तंत्रिका तंत्र से संबंधित रोग है। इस रोग में दिमाग उम्र के साथ-साथ डीजेनेरेटिव होने लगता है, यानी जो उसकी कोशिकाएं हैं वे धीरे-धीरे उम्र के साथ-साथ डैमेज होने लगती है। इससे दिमाग के काम करने की क्षमता भी प्रभावित होने लगती है। इस रोग में दिमाग के खासतौर पर वे हिस्से प्रभावित होते हैं, जहां से डोपामाइन नामक हार्मोन निकलता है, ऐसे में डोपामाइन कम बनने लगता है या फिर बनना पूरी तरह से बंद हो जाता है।
अब डोपामाइन एक तरह का पॉजिटिव हार्मोन है, जो हमारे शरीर को पॉजिटिव साइन देता है। जिससे हमें सकारात्मक महसूस होता है और इसलिए इसे फील-गुड हार्मोन भी कहा जाता है। इसलिए जिन लोगों के शरीर में डोपामाइन कम होता है, उनके शरीर की प्रतिक्रियाएं धीमी पड़ने लगती हैं।
डॉक्टर बंगा ने बताया कि जो पार्किंसन डिजीज के मरीजों में प्रमुख लक्षण देखे जाते हैं, वे डोपामाइन डेफीशिएंसी की वजह से ही देखे जाते हैं। इसके प्रमुख लक्षण कुछ इस प्रकार हो सकते हैं -
पार्किंसन डिजीज के मरीजों की एक पहचान यह भी है कि इस बीमारी के मरीज अन्य बीमारियों की तुलना में स्लो हो जाते हैं। जिसका मतलब है कि उनके शरीर के लगभग सभी क्रियाएं धीमी गति से होने लगती हैं। एक पहचान यह भी है कि उनके शरीर में जो कंपन होगी वह काम करते समय इतनी नहीं होगी जितना आराम के दौरान महसूस होगी। मरीजों को आमतौर पर पहले एक हाथ या पैर में जकड़न जैसा महसूस होगा और फिर यह जकड़न धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैल जाती है।
पार्किंसन डिजीज आमतौर पर 40 साल की उम्र के बाद ही शुरू होने लगती है, जबकि अगर यही बीमारी 50 साल से पहले ही हो रही है और खासतौर पर 25 से 30 की उम्र के आसपास हो रही है, तो यह वाइओपीडी है। जिसे यंग ऑनसेट ऑफ पार्किंसन डिजीज भी कहा जाता है। इस बीमारी के लक्षण एक समान ही रहते हैं, लेकिन अच्छी बात ये है कि इस बीमारी में मरीज की उम्र कम होने के कारण जो ट्रीटमेंट हैं वे अच्छा रिस्पॉन्स देते हैं। हालांकि, ऐसे में इनका डायग्नोसिस में देरी होने का खतरा ज्यादा रहता है। क्योंकि ज्यादातर लोगों को लगता है कि यह बीमारी तो सिर्फ ओल्ड एज के लिए ही है।
देखा गया है कि वाईओपीडी के ज्यादातर मामलों में इसके पीछे किसी जेनेटिक कंडीशन का ही हाथ होता है। सरल शब्दों में कहें तो यदि माता या पिता या उनके सगे भाई-बहनों को यह बीमारी पहले हो चुकी होगी। अगर सगे संबंधियों में ऐसा कोई पेशेंट मिल जाता है, तो बीमारी को ट्रैक करने और ट्रीटमेंट को अच्छे से अच्छा रिस्पॉन्स दिलाने में मदद मिल सकती है।
पार्किंसन डिजीज व वाईओपीडी के ट्रीटमेंट का मुख्य उद्देशय होता है, मरीज को डोपामाइन देना। मरीजों को डोपामाइन हार्मोन दवाओ की मदद से दिया जाता है, क्योंकि उनका शरीर पर्याप्त मात्रा में यह हार्मोन बना नहीं पा रहो होता है और शरीर की जरूरत को पूरा करने के लिए दवाओं के माध्यम से ये दवाएं दी जाती हैं। हालांकि, धीरे-धीरे कुछ सालों बाद ये दवाएं काम करना बंद कर देती हैं।
ऐसी स्थिति में ब्रेन में एक खास तरह का डिवाइस लगा दिया जाता है, जिसे आप एक तरह का ब्रेन पेसमेकर कह सकते हैँ। इसमें इलेक्ट्रोड्स की मदद से ब्रेन के उस हिस्से को स्टीमुलेट किया जाता है, ताकि शरीर को लगातार पॉजिटिव सिग्नल्स मिलते रहें। इस डिवाइस की की बैटरी लाइफ भी 10 से 15 सालों तक होती है और उसके बाद इसकी बैटरी चेंज की जा सकती है।
अगर एक अनुभवी डॉक्टर के द्वारा यह सर्जरी सही तरीके से की जाए तो यह पार्किंसन डिजीज के लिए एक बेहद अच्छा ट्रीटमेंट विकल्प माना जाता है। यह सर्जरी भी कोई बड़ी नहीं होती जिसमें मरीज को बेहोश करना पड़े। यहां तक कि इस सर्जरी के दौरान मरीज को जगा कर रखा जाता है और सर्जरी के दौरान डॉक्टर उससे बात भी करते रहते हैं। इस सर्जिकल प्रोसीजर का नाम डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) है।
डॉक्टर बंगा ने बताया कि डीबीएस सर्जिकल प्रोसीजर कई अलग-अलग तरह की होती है, जिसके अनुसार लागत भी अलग-अलग होती है। लेकिन औसतन लागत की अगर बात की जाए तो यह लगभग 15 से 20 लाख के बीच होती है। इसमें मुख्य लागत इंप्लांट किए जाने वाले डिवाइस की होती है, क्योंकि इस डिवाइस में जो चिप होती है और जो बैटरी होती है वह काफी महंगी होती है।
सर्जरी में लगने वाले समय की अगर बात की जाए तो मरीज को लगभग 5 दिन तक अस्पताल में रखा जाता है, जिसमें दो दिन सर्जरी से पहले और एक दिन सर्जरी के लिए और फिर उसके बाद दो दिन तक मरीज को सर्जरी के बाद अस्पताल में एडमिट करके रखा जाता है। हालांकि, खुशी की बात यह भी है कि ये बीमारी और ये सर्जिकल प्रोसीजर ज्यादातर इंश्योरेंस स्कीम व गवर्नमेंट पैनल में कवर की जाती है। इसलिए सरकारी कर्मचारियों और जिनके बास इंश्योरेंस है और उन्हें पार्किंसन डिजीज या वाईओपीडी है, उनके लिए डीबीएस सर्जिकल प्रोसीजर एक अच्छा विकल्प बन सकता है।
आगे डॉक्टर ने बताया कि डीबीएस सर्जरी के लिए एक अच्छे न्यूरोलॉजिकल और मूवमेंट डिसऑर्डर एक्सपर्ट्स का होना बहुत जरूरी है। क्योंकि मरीज की कंडीशन के अनुसार ही डिवाइस की स्पीड किया जाता है। अगर डॉक्टर अनुभवी नहीं है, तो डिवाइस लगने के बाद भी दिक्कत आ सकती है और इसलिए अच्छे डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को डीबीएस डिवाइस लगने के बाद जिस करंट पर डिवाइस को आज सेट किया गया है, एक साल बाद उसकी करंट लिमिट को कम या ज्यादा करना पड़ता है। इसलिए सही प्रोग्रामिंग का होना बहुत जरूरी है।
अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।