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Pollution effects of sperm health: वायु प्रदूषण आधुनिक दौर की सबसे गंभीर चुनौतियों के रूप में सामने आया है, और यह समस्या खासतौर से भारत जैसे उन देशों में और भी गंभीर रूप लेती जा रही है जहां तेजी से औद्योगीकरण और शहरीकरण हो रहा है। भारत में लगातार बिगड़ रही वायु गुणवत्ता के चलते देशभर के शहरी एवं ग्रामीण वातावरण के लिए संकट पैदा हो गया है। आमतौर पर यही माना जाता है कि प्रदूषित वायुमंडल के कारण सांस और हृदय की सेहत के लिए खतरा होता है, लेकिन पुरुषों की फर्टिलिटी के लिए भी खराब हवा से संकट पैदा हो चुका है, जो चिंता का बड़ा विषय है। डॉ. वेणुगोपाल, आईवीएफ स्पेशलिस्ट, बिरला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ इस बारे में कई जरूरी जानकारियां दी।
हाल के अध्ययनों में वायु प्रदूषण और शुक्राणुओं की गुणवत्ता में गिरावट के परस्पर संबंधों की ओर ध्यान दिलाया गया है। वीर्य की कम हो रही मात्रा, शु्क्राणुओं की सघनता और गतिशीलता कम होना, असामान्य बनावट आदि कुछ ऐसे प्रभाव हैं जो दूषित हवा की वजह से अब तेजी से दिखायी देने लगे हैं। ये बदलाव न सिर्फ प्रजनन की दृष्टि से खतरनाक होते हैं बल्कक सामाजिक-आर्थिक बोझ भी बढ़ाते हैं और इनके कारण हेल्थकेयर पर खर्च बढ़ता है तथा आने वाली पीढ़ियों की फर्टिलिटी भी प्रभावित होती है।
पुरुषों की फर्टिलिटी पर वायु प्रदूषण का असर चौतरफा होता है, और यह कई तरीके से शुक्राणुओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करता हैः
कई हेवी मेटल (भारी धातु) जैसे लेड, ज़िंक और कॉपर, जो कि अक्सर वाहनों से निकलने वाले धुंए और औद्योगिक उत्सर्जन के कारण वायुमंडल में फैल जाते हैं, हार्मोनल बैलेंस को गड़बड़ा देते हैं। इन भारी धातुओं का एस्ट्रोजेनिक, एंटीएस्ट्रोजेनिक और एंटीएंड्रोजेनिक प्रभाव होता है, जो कि गोनाडल स्टेरॉयडोजेनेसिस तथा गेमेटोजेनेसिस को बाधित करते हैं। हाल की रिसर्च से यह भी पता चला है कि सूक्ष्म प्रदूषक पदार्थ (PM2.5) शरीर में मौजूद अवरोधकों जैसे कि ब्लड-टेस्टिस अवरोधक आदि से गुजरकर प्रजनन अंगों में एकत्र होते रहते हैं, और आगे चलकर शरीर में हार्मोनल असंतुलन पैदा करते हैं जिससे फर्टिलिटी पर नकारात्मक असर पड़ता है।
वायु प्रदूषण से रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशिज़ (ROS) पैदा होती हैं जो ऑक्सीडेटिव स्ट्रैस का कारण हैं। ऑक्सीडेटिव स्ट्रैस के कारण लिपिड पेरॉक्सीडेशन, शुक्राणुओं में डीएनए विखंडन और शुक्राणु की कार्यप्रणली पर असर पड़ता है। इस प्रकार की मॉलीक्यूलर क्षति पहुंचने से इंफर्टिलिटी का खतरा बढ़ता है।
वायु प्रदूषण के संपर्क में लगातार बने रहने से स्पर्मेटोजेनेसिस यानि शुक्राणु उत्पादन की प्रक्रिया बाधित होती है। इसके कारण डीएनए विखंडन, शुक्राणुओं की गतिशीलता (मोटिलिटी), और शुक्राणु कोशिकाओं की असामान्य बनावट जैसी समस्याएं सामने आती हैं।
वायु प्रदूषकों के कारण कोशिकाओं में मौजूद जीन्स और अंडकोष (टेस्टिस) समेत विभिन्न अंगों की कार्यप्रणाली पर भी असर पड़ता है। इसके चलते एपिजेनेटिक बदलाव, टेलोमीयर का आकार घटने, और खून एवं शुक्राणुओं की कोशिकाओं में म्युटेशन जैसे परिवर्तन देखने को मिलते हैं। इन परिवर्तनों से न सिर्फ प्रभावित व्यक्ति की रिप्रोडक्टिव हेल्थ प्रभावित होती है बल्कि उसकी संतानों पर भी असर पड़ सकता है।
प्रदूषित वायु में सांस लेने से अंडकोषों में सूजन (इंफ्लेमेशन) आ सकती है, जो शुक्राणु उत्पादन और उनकी कार्यप्रणाली को और बाधित कर सकता है।
अध्ययनों से इस बात के भी संकेत मिले हैं कि वायु प्रदूषकों के घनत्व/सांद्रता में मौसमों के मुताबिक उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, जो शुक्राणुओं की गतिशीलता (स्पर्म मोटिलिटी) और फंक्शन पर खासतौर से पतझड़ और बसंत ऋतु में ज्यादा बढ़ जाते हैं। इसके अलावा, खराब वायु गुणवत्ता का असर केवल मौजूदा पीढ़ी तक ही नहीं रहता, बल्कि यह खासतौर से नर संतानों की फर्टिलिटी तथा हेल्थ को भी प्रभावित करता है।
हालांकि ये चुनौतियां काफी गंभीर हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहें। हमें शुक्राणुओं (स्पर्म हेल्थ) के स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के प्रभावों को कम करने के लिए व्यक्तिगत, मेडिकल, पर्यावरण और नीतिगत स्तरों पर लगातार काम करते रहने की जरूरत है।
आहार संबंधी बदलावः आप अपने आहार में एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर भोजन को शामिल कर ऑक्सीडेटिव स्ट्रैस कम कर सकते हैं और इससे स्पर्म की क्वालिटी पर भी असर पड़ेगा।
शारीरिक व्यायाम: नियमित व्यायाम शारीरिक फिटनेस से शरीर में सक्रियता बनी रहती है जो फर्टिलिटी को नकारात्मक प्रभावों से बचाती है।
धूम्रपान से परहेज़ः तंबाकू सेवन से बचने से भी शुक्राणुओं और रिप्रोडक्टिव हेल्थ में सुधार होता है।
आउटडोर गतिविधियों को कम से कम करनाः पीक पॉल्यूशन पीरियड में, जैसे कि रश आवर या स्मॉग वाले दिनों में घरों से बाहर जाने से बचें, ताकि रिस्क कम हो।
इनडोर एयर प्यूरिफिकेशन एयर प्यूरीफायर के इस्तेमाल से सूक्ष्म प्रदूषक तत्वों और अन्य टॉक्सिन्स के संपर्क में आने से बचाव होता है।
मास्क का इस्तेमाल करें अधिक वायु प्रदूषण होने पर मास्क पहनें ताकि आप खतरनाक प्रदूषकों को सांस में उतारने से बच सकें।
एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट्स का इस्तेमालः विटामिन सी और ई जैसे सप्लीमेंट्स डॉक्टरी मार्गदर्शन में लेने से भी शुक्राणुओं को ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाया जा सकता है।
अधिक सख्त विनियमनः औद्योगिक उत्सर्जन घटाने, वाहन प्रदूषण कम करने और कृषि अवशेषों को जलाने पर रोक लगाने जैसी कार्रवाई से भी वायु गुणवत्ता में काफी हद तक सुधार हो सकता है।
जागरूकता अभियानः जनता को वायु प्रदूषण और फर्टिलिटी के बीच संबंध के बारे में जागरूक बनाना भी बचाव के उपायों को बढ़ावा देने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
नियमित रूप से वीर्य विश्लेषणः जो पुरुष अधिक वायु प्रदूषण से प्रभावित इलाकों में रहते हैं उन्हें नियमित रूप से अपनी फर्टिलटी को मॉनीटर करने के लिए वीर्य विश्लेषण कराना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की समस्या के लक्षणों को शुरुआत में ही पकड़ा जा सके।
वायु प्रदूषण की वजह से पुरुषों की फर्टिलिटी पर असर पड़ना इस मामले में तत्काल आवश्यक कार्रवाई करने की जरूरत की ओर इशारा करता है। इसके लिए, व्यक्तिगत रूप से प्रयास करने की बजाय, संयुक्त स्तर पर कदम उठाने की जरूरत है जिसमें लोक स्वास्थ्य प्रणालियों, उद्योगों और नीति-निर्माताओं की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है। साथ ही, कड़े विनियामक उपायों, जनता को जागरूक बनाने के अभियानों, और कड़ी निगरानी प्रणालियों को भी लागू किया जाना चाहिए ताकि वायु प्रदूषण के नुकसानदायक प्रभावों को कम किया जा सके।
इस संबंध में, अनेक स्तरों पर कार्रवाई करते हुए लाइफस्टाइल में बदलाव लाकर, मेडिकल हस्तक्षेप और नीतिगत स्तरों पर कदम उठाकर रिप्रोडक्टिव हेल्थ के मामले में लगातार बढ़ रहे बोझ को कम किया जा सकता है। वायु गुणवत्ता में सुधार करना केवल पर्यावरण की दृष्टि से ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों की हेल्थ और फर्टिलिटी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।