थायराॅइड है तो अलर्ट हो जाएं, महिलाओं में बढ़ सकती है इंफर्टिलिटी की समस्या

थायरॉइड का संबंध इनफर्टिलिटी से भी होता है। इस बीमारी से ग्रसित होने की प्रवृत्ति महिलाओं में पुरुषों से चार गुना अधिक होती है।

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Written By: Anshumala | Published : August 22, 2018 1:54 PM IST

संतान का सुख हर कोई लेना चाहता है। कभी-कभी कुछ कारणों और लापरवाहियों के चलते छोटी सी समस्यां भी बड़ा रूप धारण कर लेती है जैसे कि थायरॉएड होने पर सामान्यतः दिमाग में दो ही बातें आती हैं कि इस बीमारी से ग्रस्त आदमी या तो मोटा होता है या पतला, लेकिन क्या आप जानते हैं कि थायरॉइड का संबंध इनफर्टिलिटी से भी होता है? इस बीमारी से ग्रसित होने की प्रवृत्ति महिलाओं में पुरुषों से चार गुना अधिक होती है। चिकित्सकों का मानना है कि इस बीमारी को नजरअंदाज करना सही नहीं है। समय रहते इसका इलाज होना चाहिए। हालांकि, आज की जीवनशैली में थायरॉइड की बीमारी आम होती जा रही है।

थायरॉइड से इंफर्टिलिटी

29 वर्षीय पायल मेहरा एक कामकाजी महिला है। इस छोटी सी उम्र में जब उन्हें पता चला कि वह गर्भधारण नहीं कर सकतीं, तो उन्हें लगा कि उनकी दुनिया खत्म हो गई है। उन्हें थायरॉइड की शिकायत थी, लेकिन इसे उन्होंने तवज्जो ही नहीं दिया। एक साल के बाद उन्होंने जब टीसीएच ब्लड टेस्ट कराया, तो वह हाइपोथायरॉइडिज्म की बीमारी से ग्रस्त थीं। इससे वह गर्भधारण नहीं कर पा रही थीं। मदर्स लैप आईवीएफ सेंटर की आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. शोभा गुप्ता का कहना है कि पायल की तरह कई मरीज मेरे पास आते हैं जो बाद में लापरहवाही की वजह से पछताते हैं। वह कहती हैं कि 80 फीसदी स्टैंडर्ड थायरॉइड ब्लड टेस्ट भी लो ओवेरियन टिश्यू का स्तर बताने में सफल नहीं होते हैं। ऐसे में महिलाओं और युवतियों को अनुभवी और योग्य फिजिशियन के पास जाना चाहिए, जिसे इस बात की जानकारी हो कि स्टैंडर्ड टेस्ट भी अक्सर लो ओवेरियन थायरॉइड के स्तर को नहीं जांच पाते।

क्या है हाइपोथायरॉइडिज्म

थायरॉइड हॉर्मोन के अंडर एक्टिव होने से पर्याप्त मात्रा में महत्वपूर्ण हार्मोन निकलते हैं। महिलाओं के लिए ये स्थिति हाइपोथायरॉइडिज्म और इंफर्टिलिटी के बीच का लिंक है। इससे ओवल्यूशन प्रकिया में बाधा आती है।

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ये लक्षण दिखें तो हा जाएं अलर्ट

हाइपोथायरॉइडिज्म के कई प्रकार होते हैं। कुछ मरीजों में ऐसा भी होता है कि इसके लक्षण ही समाने नहीं आते हैं। वहीं कुछ मरीजों में कुछ सामान्य लक्षण दिखाई पड़ते हैं। विशेषतः लक्षण मरीज में हार्मोन की कमी के स्तर पर विकसित होते हैं। शुरुआती दौर में लक्षण तीव्र नहीं होते, लेकिन धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं और खतरनाक स्तर तक पहुंच जाते हैं। सामान्य लक्षणों में वजन बढ़ना, थकान, कब्ज, मांसपेशियां और जोड़ों में दर्द, ठंडे मौसम को सहन न कर पाना, मासिक धर्म का अनियमित होना, नींद न आना, सुस्ती आना, त्वचा का शुष्क हो जाना, बालों का पतला हो जाना, खुरदुरा होना शामिल होता है।

देर करना ठीक नहीं

लक्षण दिखाई देने पर तुरंत थायरॉइड स्टिम्यूलेटिंग हार्मोन टेस्ट, चेस्ट एक्सरे, टी-4 और थायरोक्सिन टेस्ट कराना चाहिए। चिकित्सक मरीज की उम्र, थायरॉइड ग्रंथि के लक्षण देखकर इसका उपचार करते हैं। इसके लिए थायरॉइड रिप्लेसमेंट टेस्ट प्रभावकारी हैं। इसमें इस हॉर्मोन के सामान्य होने में एक-दो महीने का समय लगता है। इसमें ताउम्र दवाइयां और प्रत्येक छह महीने में थायरॉइड चेक कराना जरूरी है। डॉ. शोभा गुप्ता कहती हैं कि 18 से 20 फीसदी कपल्स रिप्रोडक्टिव उम्र में भी इंफर्टिलिटी के शिकार होते हैं। थायरॉइड हार्मोन सेल्यूलर फंक्शन को नियमित करता है। इसका अनियमित होना फर्टिलिटी को प्रभवित करता है। थायरॉइड का पता चलना और अनुपचारित रहना इंफर्टिलिटी और गर्भपात को निमंत्रण देता है। भारतीय थायरॉइड सोसायटी के मुताबिक, प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम से पीड़ित 70 फीसदी महिलाओं में थायरॉइड का स्तर कम होता है। इससे ओवरी से होने वाले प्रोजेस्टरोन का स्राव कम होता है। इंडियन थायरॉइड सोसाइटी के अनुसार, भारत की 25 फीसदी जनसंख्या थायरॉइड के सही से काम न करने की समस्या से ग्रस्त है।

थायरॉइड से बचने के उपाय

- वजन कम होना।

- तनाव से बचें व पूरी नींद लें।

- नियमित व्यायाम करें।

- इसके प्रारंभिक लक्षणों को अनदेखा न करें।

चित्रस्रोत : Shutterstock.

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