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In 2018, India had a shortage of supply of 1.9 million units of blood.© Shutterstock.
मॉनसून में डेंगू फीवर फैलने का खतरा होता है। डेंगू फीवरके दौरान सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है, जब ब्लड प्लेटलेट्स डाउन हो जाते हैं। ब्लड प्लेटलेट्स का तय काउंट से कम या ज्यादा होना दोनों ही खतरनाक हैं। ऐसे में मरीज को ब्लड प्लेटलेट्स चढ़ाने पड़ते हैं। पर जागरुकता की कमी के चलते लोग अब भी ब्लड प्लेटलेट्स डोनेशन (Blood platelet donation) से डरते हैं। जबकि जरूरत इससे घबराने की बजाए किसी की जान बचाने के लिए प्लेटलेट्स डोनेशन के लिए आगे आने की है।
मॉनसून में मच्छरों के बढ़ने के कारण डेंगू फैलने की सबसे ज्यादा संभावना होती है। इसलिए इस दौरान मच्छरों को पनपने से रोकने के प्रयास करने चाहिए। डेंगू यूं तो साधारण बुखार है, पर अगर यह दूसरी या तीसरी स्टेज पर पहुंच जाए तो यह मरीज के लिए खतरनाक हो जाता है। इस स्थ्िाति में मरीज के शरीर में मौजूद ब्लड प्लेटलेट्स काउंट एकदम से डाउन हो जाता है।
डेंगू होते ही डॉक्टर लिक्विड डाइट लेने की सलाह देते हैं। इसके साथ ही गिलोय, पपीते के पत्ते और बकरी का दूध पीने की भी सलाह दी जाती है। जिससे प्लेटलेट काउंट बढ़ाया जा सके। पर कई बार ये इतने ज्यादा डाउन हो जाते हैं, कि मरीज खुद रिकवर होने की स्थिति में नहीं रहता। ऐसी हालत में मरीज को ब्लड प्लेटलेट्स चढ़ाने पड़ते हैं।
एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में डेढ़ लाख से चार लाख तक ब्लड प्लेटलेट्स होने बहुत जरूरी हैं। © Shutterstock.
ब्लड प्लेटलेट्स का कार्य मुख्यतौर पर खून में थक्का बनाना है। लाल और श्वेत रक्त कणिकाओं क अलावा रक्त में मौजूद तीसरा तत्व प्लेटलेट्स ही हैं। ये बहुत छोटे आकार 0.002 माइक्रोमीटर से 0.004 माइक्रोमीटर तक के होते हैं। माइक्रोस्कोप से देखने पर ही ये दिखाई देते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में डेढ़ लाख से चार लाख तक ब्लड प्लेटलेट्स होने बहुत जरूरी हैं। यह संख्या प्रति एक घन मिलीलीटर खून में मौजूद प्लेटलेट्स की है। डेंगू में ब्लड लेट्स कम होने लगते हैं। पर अगर ये 20 हजार से नीचे आ जाएं तो मरीज के लिए गंभीर स्थिति हो सकती है। ऐसे में उसे तत्काल प्लेटलेट्स चढ़ाने पड़ते हैं।
प्लेटलेट का बढ़ना और कम होना दोनों ही खतरनाक हैं। कम होने पर ब्लीडिंग होने का डर रहता है तो ज्यादा होने पर खून का थक्का जम जाता है। ये दोनों ही हालत जोखिम भरी हैं। ब्लड प्लेटलेट कम होने पर इन्हें किसी और मरीज से लेकर चढ़ाया जाता है। क्योंकि इन्हें ब्लड की तरह स्टोर नहीं किया जा सकता। इसलिए ऐसे समय में डोनर की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।
इसमें डोनर के ब्लड से प्लेटलेट निकालकर वापस उसे ब्लड चढ़ा दिया जाता है। जिसमें एक से डेढ़ घंटे तक का समय लगता है। जागरुकता की कमी के चलते इस प्रक्रिया से ज्यादातर लोग डरते हैं। जबकि यह एक साधारण प्रक्रिया है। इसमें ठंड लगना, शरीर में ऐंठन होना या केल्शियम की कमी हो जाना सामान्य संकेत हैं। इनसे घबराना नहीं चाहिए। एक स्वस्थ व्यक्ति चौबीस घंटे के भीतर स्वयं ब्लड प्लेटलेट्स का निर्माण कर लेता है।