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वर्ल्ड ऑटिज़्म डे- ऑटिस्टिक बच्चों के सही तरह से देखभाल करने के 6 टिप्स

इन छह टिप्स के मदद से आप अपने ऑटिस्टिक बच्चों की सही तरह से देखभाल कर पायेंगे।

सामान्य बुखार होने पर माता-पिता अपने संतान को लेकर चिंता करने लगते हैं। तो क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिन बच्चों को तंत्रिका संबंधी (neurological) समस्या होती है और वे ऑटिज़्म के शिकार होते हैं उनके माता-पिता के दिल और दिमाग की हालत कैसी होती है। उन्हें अपने बच्चों को उम्र भर ऐसे ही हालत में देखना पड़ता है। वैसे तो इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है लेकिन कुछ ऐसे चिकित्सा या तरीकों के बारे में पता चला है जिसके मदद से आप उन्हें बेहतर जिंदगी दे सकते हैं।

ऑटिज़्म एक ऐसी बीमारी है जिसके कारण शिशु अवस्था से ही सही तरह से मानसिक विकास नहीं हो पाता है। इसका मतलब यह नहीं होता है सभी ऑटिस्टिक बच्चे मंदबुद्धि वाले होते हैं, जैसा कि आम लोग मानते हैं। ऐसे बच्चों को अच्छी तरह से बात करने में, सामाजिक तौर पर सबसे घुलमिलकर बात करने में, खेलने में परेशानी होती है। साइकोलिज्ट यह मानते हैं कि अगर इस बीमारी का पता पहले चरण में ही चल जाए उनके व्यवहार में बदलाव लाया जा सकता हैं। तीन वर्ष के आयु से ही ऑटिस्टिक बच्चों की पहचान की जा सकती है। ऐसे बच्चे साधारणतः चुपचाप रहते हैं, बुलाने पर ध्यान नहीं देते हैं, एक ही काम को या एक ही बात को बार-बार दोहराते रहते हैं, भावनात्मकता की कमी होती है। यहाँ कुछ ऐसे बातों के बारे में चर्चा करेंगे जिसके मदद से माता-पिता उन बच्चों की देखभाल अच्छी तरह से कर पायेंगे-

लक्षणों का जल्दी पहचान- डॉ. प्राधान्य गाडगिल, (कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल की सलाहकार बाल चिकित्सा तंत्रिका विज्ञान और मिरगी में विशेष रुचि रखने वाली) का मानना है कि समय से पहले इसके लक्षणों का पता चल जाने पर मस्तिष्क के कार्य-कलाप को विकसित करने और सामाजिक तौर पर सक्रिय करने में मदद मिलता है। इसके लिए अभिभावक को उन पर ध्यान देना होगा और सही तरह से उनका ख्याल रखना होगा-

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ऑडियो विजुअल उपकरणों (audio visual devices)- अगर आपको पता चल गया है कि बच्चे को ऑटिज़्म है तो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल कम कर दें, जैसे- आईफोन, आईपैड या टेलिविजन आदि। इससे उनके मानसिक विकास में बाधा उत्पन्न होता है। डॉ. गाडगिल का कहना है कि पुश बटन खिलौने, प्रकाश, गाना, राइम्स, मानसिक विकास वाले खिलौनों के साथ खेलने दें, इससे उनके मस्तिष्क को सही तरह से काम करने में मदद मिलता है।

प्रोसेस्ड फूड से दूर रखें- डॉ. गाडगिल का कहना है कि अपने बच्चे को कभी भी ज़्यादा जंक या प्रोसेस्ड फूड न दें। क्योंकि इनमें जो केमिकल होता है वह तंत्रिका तंत्र को बूरी तरह से प्रभावित करता है।

बातचित के व्यवहार को बढ़ावा दें- अपने बच्चे के साथ ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में बात करने की कोशिश करें। उन्हें कहानियाँ, राइम्स (rhymes) आदि सुनाये। डॉ. गाडगिल का कहना है कि इससे बच्चे को सामाजिक तौर पर लोगों से जुड़ने में मदद मिलता है। इससे पूरा बदलाव तो संभव नहीं है लेकिन व्यवहार में उन्नति होती है।

अपने बच्चे को सामाजिक तौर पर ज़्यादा जुड़ने दें- जितना वे सामाजिक तौर पर लोगों से जुड़ेंगे उनमें उतना ही बदलाव आएगा। आप उनको प्ले स्कूल में भर्ती करवायें जहाँ वे विभिन्न तरह से रंगों, आकार वाले खिलौने और सोचने की शक्ति बढ़ाने वाले खिलौनों से खेल पाते हैं। ऑटि्स्टिक बच्चों को व्यक्ति विशेष आवाज, गाना या रंग से परहेज होता है जिसके संपर्क में आते ही उनका व्यवहार हिंसक हो जाता है। इसलिए इन चीजों पर ज़रूर ध्यान दें।

घर पर ही थेरपी का अभ्यास करवायें- डॉ.गाडगिल का कहना है कि ऑटिज़्म का ट्रीटमेंट दवाई से नहीं थेरपी से करना श्रेयकर होता है। एप्लाइड विहेवियरल एनालाइसीस (Applied Behavioural Analysis (ABA) और रिलेशनशीप डेवलॉपमेंट इंटरवेन्शन (Relationship Development Intervention (RDI) यह दो सबसे ज़्यादा प्रभावकारी ऑटिज़्म के थेरापीस हैं। इन थेरापीस का अभ्यास दिन में चार से पाँच बार करना अच्छा होता है।

चित्र स्रोत: Getty images


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