न करें नज़रअंदाज़ बच्चे की हकलाने की समस्या को, जानें क्यों?

क्या तुतलाने के प्रॉबल्म का इलाज संभव हैं?

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Written By: Editorial Team | Updated : January 4, 2017 8:18 PM IST

जब आपका बच्चा पहली बार तुतलाकर आपको माँ या पापा पुकारता है तो आप उसकी तोतली बोली सुनकर खुशी से झूम उठते हैं। लेकिन उसकी वही मीठी तोतली बोली आपको कड़वी लगने लगती है जब वह दस या बीस साल में भी उसी तरह से बात करता है। कोई बात जल्दी-जल्दी कहते वक्त पूरा न कह पाना, एक ही बात बार-बार कहना या रूक-रूक कर बोलना आदि को तुतलाना या हकलाना कहा जाता है।

वैसे तो 4 से 7 साल तक बच्चे भाषा को अच्छी तरह से समझने और उनका प्रयोग करना सिखते है। दूसरों की बात समझने और उन बातो को शब्दों में पिरोकर उनका सही तरह वाक्य के रूप में बनाकर अपनी बात को अभिव्यक्त करने में अक्सर वे थोड़ा हकला या तुतला जाते हैं जो नॉर्मल होता है।

डॉ. नंदिनी जोशी, विख्यात ऑडियोलॉजिस्ट और स्पीच पैथोलॉजिस्ट उन माता-पिता को कुछ टिप्स दे रही हैं जो अपने बच्चे के लिए जुझ रहे हैं।

कारण

बच्चों में ये तुतलाने वाला स्टेज आम तौर पर व्यवहार, शारीरिक, मानसिक या पर्यावरणीय (behavioural, physiological, psychological or environmental) कारणों से जिंदगी भर का साथी बन जाता है। यानि सही तरह से बोलने की क्षमता की सही तरह से विकास नहीं हो पाता है। कभी-कभी बच्चे तनाव या किसी विशेष प्रकार के मनोवैज्ञानिक कारणों से भी तुतलाने लगते हैं।

लक्षण

शायद आप ये सोच रहे होंगे कि कैसे माता-पिता को पता चलेगा कि उनका बच्चा सचमुच तुतलाता है वह तुतलाने के अवस्था से बाहर आ चुका है। इन सब क्षेत्रों में म…. म….मेरा या मुझेमुझेमुझे या तुम कब कब कब जा रहे हो, गुमममराह जैसे बाते करते हैं या बातों को बार-बार दोहराते हैं। पहले पहले तो बच्चे जब बहुत उत्तेजित हो जाते हैं या वे अपनी बातों को जल्दी-से-जल्दी दूसरों तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं तब वे बहुत ज्यादा हकलाने या तुतलाने लगते हैं।

उपचार

इस बीमारी का एक ही उपाय ये है कि जितनी जल्दी इस बात का पता चल जाये उतना ही जल्दी इसका उपचार संभव हो पायेगा। इसलिये जैसे ही आप इस बात को नोटिस करें कि आपका बच्चा बहुत तुतला रहा है तो उस धीरे-धीरे बात करने को न कहे या उसे डांटे या धमकाये नहीं, इससे परिस्थिति और भी बिगड़ सकती है। आप जितनी जल्दी हो सके स्पीच पैथोलॉजिस्ट से संपर्क करें।

लेकिन अपने बच्चे को स्पीच पैथोलॉजिस्ट के पास ले जाने के पहले उन्हें ये न बताये कि आप उन्हें डॉक्टर कर पास ले जा रहे हैं। बच्चे से ये कहे कि आप उन्हें ऐसे इंसान के पास ले जा रहे हैं जो उनके साथ खेलने वाले हैं या नया खेल सिखाने वाले हैं आदि। बिहेव्यर थेरपी सेशन के द्वारा डॉक्टर खेल-खेल में बच्चे के स्पीच को विशेष तकनीक के सुधारते है। इस थेरपी के मदद से बच्चे सात से नौ साल तक अच्छी तरह से बिना तुतलाये बोलने लगते हैं।

इसलिए अगर शुरू में ही इसके इलाज की सही तरह से व्यवस्था की जाए तो पूरी जिंदगी आपके बच्चे को दूसरों के सामने शर्मिंदगी का एहसास नहीं करना पड़ेगा।

मूल स्रोत-  Stammering

अनुवादक: Mousumi Dutta 

चित्र स्रोत:  ShutterStock


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