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आज के समय में लोग कई तरह की मानसिक बीमारियों से पीड़ित रहते हैं लेकिन जब तक वे डॉक्टर के पास ना जायें उन्हें वास्तव में पता भी नहीं चलता कि वे किसी गंभीर मानसिक रोग के शिकार हैं। इन सभी तरह की मानसिक रोगों का इलाज थेरेपी या काउन्सलिंग से संभव है। नारायण स्वास्थ्य सिटी के मनोचिकित्सा विभाग की एसोसिएट सलाहकार- न्यूरोसाइकोलॉजी, डॉ दिव्या सादना थेरेपी शुरू करने से पहले कुछ चीजों को समझने और मन में आ रहे सवालों को निःसंकोच अपने डॉक्टर को बताने के बारे में यहां कुछ सलाह दे रही हैं-
थेरेपी के लिए यह ज़रूरी नहीं कि आप किसी मानसिक बीमारी के शिकार हों : हम सभी अपने जीवन में अलग-अलग दौर से गुजरते हैं जब हम अपने काम पारस्परिक रिश्तों, माता-पिता की जरूरतों और अपनी या दूसरों की अनंत उम्मीदों से उत्पन्न हुई चुनौतियों से परेशान हो जाते हैं। अपनी इन परेशानियों को चिकित्सक से बताने से इन स्थितियों से निपटने, तनाव और संबंधित बीमारियों को कम करने और भविष्य की चुनौतियों का बेहतर मुकाबला करने का हौसला मिलता है। इन उपचारों का उद्देश्य व्यक्तियों को ठीक करने और उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाना है।
किसी भी मानसिक रोग का इलाज जब आप थेरेपी से करवातें हैं तो यह दावा नहीं किया जा सकता है कि उसका असर काफी लम्बे समय तक रहेगा। थेरेपी की अवधि और इसका परिणाम थेरेपिस्ट और क्लाइंट दोनों को भिन्न रूप से प्रभावित करती हैं। कुछ गंभीर मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों से निपटने के लिए थेरेपी के लंबे कोर्स की आवश्यकता हो सकती है जबकि अधिकांश को कम समय में ही समाप्त किया जा सकता है। थेरेपी की शुरूआत में चिकित्सक और क्लाइंट एक दूसरे की जरूरतों को समझते हैं और स्वीकार करते हैं। यह काफी हद तक साइकिल चलाना सीखने के समान है चिकित्सक शुरुआत में एक सक्रिय भूमिका निभाता है और शुरुवात में हर मुश्किल में आपकी मदद करता है और फिर जब आप सब कुछ सीख जाते हैं तो वो खुद को पीछे कर लेता है।
इस बात का फर्क नहीं पड़ता कि आपको कितने डरावने कितने परेशान करने वाले विचार आते हैं। आपको अपनी सभी परेशानियों को डॉक्टर से बताना चाहिए। कुछ विचार बहुत गहरे, तकलीफदेह होते हैं जो कि महत्वपूर्ण रूप से आपके सामाजिक और व्यावसायिक क्रियाकलापों में दखल डालते हैं। उनकी भारी प्रकृति के कारण यह आवश्यक है कि क्लाइंट चिकित्सक के साथ विस्तार से इन पर चर्चा करें। एक बार तर्कहीन या बेकार के विचारों की पहचान हो जाने परउचित संज्ञानात्मक और व्यावहारिक रणनीतियों का इस्तेमाल उनके साथ प्रभावी रूप से निपटने के लिए किया जा सकता है।
डरावने विचार के कारण हमेशा ही आपके साथ कुछ गलत हो ऐसा ज़रूरी नहीं है। यह समस्या आमतौर पर एंग्जायटी से पीड़ित मरीजों में पायी जाती हुई। ऐसे कई थेरेपी हैं जिससे इस समस्या को ठीक करने में मदद मिलती है। इसके लिए कई तरह के एक्सपेरिमेंट किये जाते हैं जैसे कि डिसट्रैक्शन तकनीक जो मरीज के सोचने समझने की क्षमता को प्रभावित करते हैं। कुछ ही समय में इस थेरेपी का असर दिखने लगता है।
चिकित्सक कोई चमत्कार नहीं करते हैं, वे समस्या को हल करने के लिए कई महीने भी ले सकते हैं। मरीज की परेशानी को ठीक ठीक समझने में ही कुछ दिन निकल जाते हैं और फिर उसके बाद धीरे धीरे उसकी सोच को बदलने और मानसिक स्थिति को ठीक करने के लिए थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ मामलों में मरीज काफी लम्बे समय से मानसिक रोग से पीड़ित होता है ऐसे में उसपर ज्यादा गहन अध्ययन करने के बाद थेरेपी का प्रयोग किया जाता है। मरीज को यह समझाने की कोशिश की जाती है कि वो जल्दी ही ठीक हो जायेगा इस थेरेपी की मदद से जिसका सकारात्मक असर उसके मानसिक स्थिति पर पड़ता है।
एक बार उपचार बंद करने के बाद इसका मतलब यह नहीं है कि आप कभी भी उसके पास इलाज के लिए वापस नहीं जा सकते हैं। चिकित्सक का दृष्टिकोण गैर-निष्पक्ष होता है अगर किसी कारण सेइलाज बंद हो गई होतो क्लाइंट को बाद में फिर से उपचार शुरू करने में संकोच नहीं करना चाहिए। अंतराल के कारणों (यदि पारस्परिक रूप से निर्णय नहीं लिया गया है) पर चर्चा की जा सकती है और उसके बाद फिर से थेरेपी स्टार्ट की जा सकती है।
किसी चिकित्सक से निजी तौर पर नहीं खुलना पूरी तरह से ठीक है: ज्यादातर व्यक्ति शुरू में चिकित्सक के साथ अपने अंतरंग मुद्दों पर चर्चा करने से हिचकते हैं। हालांकि जैसे-जैसे थेरेपी आगे बढ़ती है मरीज का चिकित्सक के साथ अच्छा संबंध बन जाता है और मरीज अपने अंतरंग मुद्दों पर बात करने के लिए खुद को सुरक्षित, आरामदायक और प्रेरित महसूस करने लगता है। किसी भी थेरेपी में चिकित्सक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
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अनुवादक: Anoop Singh
चित्र स्रोत: Shutterstock