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कभी न कभी हम सभी को आंखों में तकलीफ होती है। जहां कुछ तकलीफें छोटी-मोटी होती हैं और जो खुद-ब-खुद ठीक हो जाती हैं या उनका इलाज घर पर किया जा सकता है तो वहीं कुछ समस्याएं ऐसी भी हैं जिनका इलाज किसी स्पेशलिस्ट द्वारा कराया जाना ज़रूरी हो जाता है। लेकिन जो बात ध्यान में रखने लायक या सबसे ज़रूरी है वह है नज़र से जुड़ी हुई समस्याओं के शुरुआती लक्षणों को यह सोचकर नज़रअंदाज़ करना कि आपकी आंखें खुद-ब-खुद ठीक हो जाएगीं। डॉ. ई रविंद्र मोहन (सीनियर कंसल्टेंट, ग्लोबल हेल्थ सिटी, चेन्नई) कहते हैं कि जल्द जांच कराने से आंखों से जुड़ी समस्याओं की सही स्थिति का पता लगाया जा सकता है जिसके बाद सही तरीके से उसके ट्रीटमेंट में मदद होती है और आपकी नज़र और कमज़ोर होने से बचाने का यही एकमात्र तरीका भी है। यहां हम बात कर रहे हैं ऐसी ही 8 समस्याओं के बारे में जिनके शुरुआती लक्षणों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
आंखों में दर्द- कन्जंगक्टवाइटिस या आंख के किसी भी भाग में किसी तरह की चोट जैसी स्थितियों या सूजन और जलन से जुड़ी समस्याओं जैसे- यूवाइटिस (Uveitis), श्वेतपटलशोध या स्कलराइटिस (Scleritis), और स्वच्छपटलशोथ या केरटाइटिस (keratitis) की वजह से आंखों में दर्द की समस्या हो सकती हैं।
आंखों में दर्द की समस्या ग्लूकोमा और माइग्रेन होने पर भी हो सकती है। आंखों में अगर एक दिन से अधिक समय तक लगातार दर्द होता रहे तो किसी आई स्पेशलिस्ट से ज़रूर जांच करानी चाहिए ताकि दर्द की वजह का पता लगाया जा सके। समय पर जांच-पड़ताल से आप अपनी नज़र को कमज़ोर होने से बचा सकते हैं।
आंखों में लाली– आंखों में लाली की समस्या कन्जंगक्टवाइटिस, केरटाइटिस, ग्लूकोमा, यूवाइटिस या आंखों में किसी तो इसी तरह की स्थिति में हो सकती है। आंखों में किसी अनजान चीज़ के गिरने या उससे होनेवाली तकलीफ किसी भी उम्र के लोगों को परेशान कर सकती है।
रतौंधी- रातों में न दिखना, रतौंधी या नाइट ब्लाइंडनेस (Night blindness) विटामिन ए की कमी से होनेवाली सबसे आम समस्या है जो रेटिना से जुड़ी एक समस्या है और इसे रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा (Retinitis Pigmentosa) कहा जाता है। आप्थमालजिस्ट द्वारा बताए गए सभी टेस्ट ज़रूर कराएं। रतौंधी से प्रभावित व्यक्तियों को रात में अकेले घर से बाहर जाने से बचना चाहिए और शाम के बाद ड्राइव नहीं करनी चाहिए।
आंख से बहुत अधिक पानी निकलना- कन्जंगक्टवाइटिस, एलर्जी, कार्निया रोग, आंख में किसी अनजानी चीज़ के गिरने या आंसूओं के निकलने की प्रक्रिया में किसी प्रकार की रुकावट जैसी विभिन्न स्थितियों में आपकी आंखों से बहुत अधिक पानी बहने की समस्या हो सकती है। इनके अलावा भी कारण और के कारण हो सकता है। आंखों से अत्यधिक पानी बहने के सही कारण का पता लगाने के लिए एक विस्तृत जांच की आवश्यकता पड़ती है।
आंखों का फड़कना – आंखों का फड़कना आंखों से जुड़ी बीमारियों का एक संकेत है लेकिन मरीज़ को इससे डरने की आवश्यकता नहीं होती। तनाव, नींद की कमी, अत्यधिक मात्रा में कैफीन का सेवन, खराब डायट या कम पानी पीने आदि की वजह आंख फड़कने की समस्या होती है। अगर आंख बहुत अधिक फड़कती है तो आपको बोटुलिनम टॉक्सिन (botulinum toxin) का एक इंजेक्शन लेना पड़ सकता है जो आपकी आंखों की मांसपेशियों को आराम पहुंचाता है।
आंखों का छोटा होना- यह अक्सर आंखों की ऊपरी परत या पलक की त्वचा के लटकने की वजह से होता है। आंखों में किसी प्रकार का फ्रैक्चर या चोट की वजह से आंखें धंसी हुई नज़र आने लगती हैं। इसे एनोफॉल्मोस (enophthalmos) चोट कहा जाता है। थायरॉयड जैसी बीमारियों में जब एक आंख प्रोट्रूड होने लगती है तो दूसरी आंख आकार में छोटी दिखने लगती हैं। किसी कीड़े के काटने, एलर्जी या आंख में इंफेक्शन की स्थिति में भी आंखों के आसपास सूजन हो जाती है और आंखें छोटी दिखने लगती हैं।
नज़र में गड़बड़ी- बच्चों की नज़र में गड़बड़ी या परेशानी की छोटी या बड़ी समस्याओं का चश्मा पहनने से इलाज हो सकता है। इसलिए 3 साल से अधिक उम्र के बच्चों की नज़र की हर साल जांच करानी चाहिए ताकि आंखों में अगर भेंगापन (आंखों के आकार में अंतर) या अपवर्तक गड़बड़ी हो तो उसे सुधारा जा सके। निकट दृष्टि या माइओपीअ (Myopia) एक आम समस्या है जो लगभग पांच में से एक बच्चे को प्रभावित करती ही है।
बुज़ुर्गों की कमज़ोर नज़र- बड़ी उम्र के लोगों में, मोतियाबिंद की वजह से यह एक आम समस्या बन जाती है। मोतियाबिंद में सामान्य क्रिस्टलाइन लेंस पर धब्बे दिखायी देने लगते हैं। इसके इलाज़ के लिए कैटरेक्ट वाले लेंस को हटाकर उसकी जगह कृत्रिम इंट्राओक्यूलर लेंस (intraocular lens) लगाया जाता है। दोषपूर्ण दृष्टि के अन्य कारण डायबिटीक रेटिनोपैथी और बढ़ती उम्र के साथ होनेवाली परेशानियां जैसे आंख की मैक्यूला का व्यपजनन या एआरएमडी (age-related macular degeneration) भी हो सकते हैं जिन्हें लेज़र या इंट्रावायट्रीअल इंजेक्शन (intravitreal injections) की मदद से ठीक किया जा सकता है। दोषपूर्ण दृष्टि से पीड़ित लोगों को अपनी आंखों की जांच करानी चाहिए ताकि आई प्रेशर और रेटिनाइल संबंधी स्थितियों का पता लगाया जा सके और आवश्यक कदम उठाए जा सकें। केवल चश्मे के लिए जांच कराना पर्याप्त नहीं होता क्योंकि हो सकता है कि इस प्रकार की जांच से आप ग्लूकोमा जैसी समस्याओं के बारे में पता लगाने से चूक जाएं जिनकी वजह से आगे चलकर आपकी देखने की शक्ति कम या खत्म हो सकती है।
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अनुवादक -Sadhna Tiwari
चित्र स्रोत- Shutterstock