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क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) एक क्रॉनिक फेफड़ों की बीमारी है। इसमें सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं और उनमें सूजन आ जाती है। यह सूजन निरंतर बढ़ती रहती है जिससे आगे चलकर फेफड़े छलनी हो जाते हैं। इसे एम्फायसेमा कहते हैं। सीओपीडी का मुख्य उपचार रिस्क फैक्टर को रोकना है। रिस्क फैक्टर जैसे चूल्हे का धुआं, धूल और प्रदूषण आदि से बचना जरूरी है। मुंबई स्थित एसआरवी अस्पताल में एमडी पुल्मोनरी मेडिसन डॉक्टर मिताली अग्रवाल आपको इस समस्या के कारण बता रही हैं।
जेनेटिक कारक- अल्फा-1 एंटीट्रिप्सिन या एएटी की कमी वाली एक आनुवंशिक स्थिति से आपको सीओपीडी का खतरा होता है। यह एक कारण है कि आप स्मोकिंग नहीं भी करते हैं, तो आपको इसका खतरा रहता है।
स्मोकिंग- आपको जानकर हैरानी होगी कि स्मोकिंग का हर शॉट आपको इस बीमारी की तरफ लेकर जाता है। इतना ही नहीं स्मोकिंग के धुएं से भी आपको इसका खतरा रहता है।
बचपन का इन्फेक्शन- डॉ अग्रवाल के मुताबिक, बचपन के दौरान संक्रामक की चपेट में आने की वजह से उम्र बढ़ने के बाद सीओपीडी विकसित होने की संभावना बढ़ सकती है। इसमें टीबी, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों के वायरल संक्रमण शामिल हैं। बचपन के निमोनिया से भी भविष्य में इसका खतरा हो सकता है।
बायोमास ईंधन- इस बात पर भी ध्यान देना ज़रूरी है कि आप जहां काम करते हैं वहां आपको प्रदूषण का कितना खतरा है। विशेषकर अगर आप किसी केमिकल या सीमेंट कम्पनी में काम करते हैं और बार-बार आपको केमिकलयुक्त धुएं या धूल के सम्पर्क में आना पड़ता है तो आपको अपनी सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन ध्यान से करना चाहिए।
वायु प्रदूषण- वायु प्रदूषण सीओपीडी की समस्या को गंभीर बना सकता है क्योंकि यह इस स्थिति से जुड़ी विभिन्न तरह की परेशानियां उत्पन्न कर सकती है। इसलिए कोशिश कीजिए कि जब हवा में प्रदूषण का स्तर अधिक हो तो आप बाहर न जाएं। अगर किसी कारणवश जाना ही पड़े तो तब निकलिए जब धूप तेज़ हो क्योंकि सूरज की रोशनी हानिकारक प्रदूषक तत्वों के जोखिम को कम करती है।
सीओ पीडी से बचने के तरीके
धूल-मिट्टी से बचें- अधिकतर धूल-मिट्टी और धुएं से वायुमार्ग में जलन होती है और फेफड़ों खराब होने का खतरा रहता है। इसलिए बाहर जाते समय फेस मास्क लगाएं।
वजन कंट्रोल रखें- सीओपीडी के मरीजों का वजन बहुत कम या ज्यादा नहीं होना चाहिए। क्योंकि रोगी को पहले से ही सांस लेने में परेशानी होती है ऊपर से वजन ज्यादा होने से फेफड़े को रक्त में ऑक्सीजन पंप करने के लिए अतिरिक्त काम करना पड़ता है।
एक्सरसाइज़ है जरूरी- इसके मरीज रोजाना आधा घंटा एक्सरसाइज़ करें। सुबह जल्दी और देर रात को एक्सरसाइज़ ना करें क्योंकि इस समय धूल का स्तर अधिक होता है।
इनहेलर रखें- अस्थमा के मरीजों को अपने पास इनहेलर रखना चाहिए। यानि आपकी किसी भी वातावरण में समस्या से बचने के लिए तैयार रहना चाहिए।
उपचार रोकना न करें- अगर आप बेहतर महसूस कर रहे हैं तो भी आपको अपना पूरा इलाज कराना चाहिए। डॉक्टर की सलाह पर उपचार रोकें
कफ सिरप ना लें- आपको बिना सलाह के कफ सिरप जैसी दवा लेन से बचना चाहिए। खांसी के कई सिरप में डिक्स्रोमैथोर्फ़न होते हैं, जिससे खांसी दब जाती है। सीओपीडी में रोगी को फेफड़ों से सभी बलगम और कफ को निष्कासित करने की आवश्यकता होती है और इसे दबाने की नहीं।
ह्यूमिडिटीफायर लगाएं- ड्राई एयर से ब्रोशियल टिश्यू के सूखने का खतरा रहता है। ह्यूमिडिटीफायर से घर की हवा में नमी बनी रहती है।
ब्रीदिंग एक्सरसाइज़- सीओपीडी के मरीजों को सांस की तकलीफ जैसे लक्षणों को कम करने के लिए 'पर्सेड लिप ब्रीदिंग टेक्निक' की सलाह दी जाती है। इसमें नाक से सांस ली जाती है और होंठ को पीछे करके मुंह से छोड़ी जाती है।
घबराए नहीं- यदि आपको लग रहा है कि आपके दिल की धड़कन सामान्य से अधिक तेजी से चल रही हैं, तो आपको घबराना नहीं चाहिए। इस स्थिति में मरीज गहरी सांस ले और ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ करे।
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अनुवादक – Usman Khan
चित्र स्रोत - Shutterstock