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Written By: Editorial Team | Updated : January 5, 2017 8:41 AM IST
अगर आप हाल ही में स्ट्रोक के शिकार हुए हैं या फिर उसका इलाज चल रहा है तो ऐसे हालत में सबसे ज़रूरी चीज होती है इलाज या सर्जरी के बाद मरीज की देखभाल करना। क्योंकि जितने अच्छे तरीके से आप अपनी देखभाल करेंगे उतना ही जल्दी आपको इससे उबरने में मदद मिलेगी और फिर उतनी ही जल्दी आप फिर से वापस सामान्य ज़िन्दगी जीने लगेंगे। घर पर देखभाल करना तो ज़रूरी है ही साथ ही नियमित रूप से रिहैबिलिटेशन सेंटर जाना भी उतना ही ज़रूरी है। वहां जाकर किये जाने वाले फिजियोथेरेपी एक्सरसाइज और कुछ अन्य थेरेपी आपको जल्दी ठीक करने में मदद करते हैं। पोरटिया मेडिकल (Portea Medical) के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. एम उदय कुमार मैया स्ट्रोक के मरीज की घर पर देखभाल करने से संबंधित कुछ ख़ास टिप्स बता रहे हैं।
वैसे तो रिहैबिलिटेशन सेंटर पर मरीजों का पूरी तरह ध्यान रखा जाता है लेकिन अधिकांश मरीज घर पर अपने परिवार वालों के बीच रहकर ठीक होना ज्यादा पसंद करते हैं। इसलिए अगर आप रिकवरी के लिए रिहैबिलिटेशन सेंटर की बजाय घर का चुनाव करते हैं तो ऐसे कुछ सर्विसेज हैं जो आपके घर को ही बिल्कुल रिहैबिलिटेशन सेंटर जैसा बना देती हैं।
स्किल्ड होम हेल्थ केयर एंड रिहैबिलिटेशन सर्विसेज : इसके अंतर्गत वो सारे ट्रीटमेंट शामिल होते हैं जो रिहैबिलिटेशन सेंटर में कराए जाते हैं। इन्हें आप आसानी से घर पर ही सीख सकते हैं।
होम मॉडिफिकेशन : ये स्ट्रोक के मरीजों के लिए घर में कुछ आवश्यक परिवर्तन कर देते हैं जिससे उन्हें रोजाना के कामों में किसी तरह की कोई दिक्कत न हो। जैसे की सीढ़ियों पर ग्रिप लगाना, घर में हर जगह पर्याप्त लाइटिंग लगाना और ऐसा इंतज़ाम करना जिससे घर में कहीं फिसल कर गिरने की संभावना ही न रहे।
नॉन मेडिकल होम केयर: स्ट्रोक के मरीजों के लिए यह सर्विस बहुत ही लाभदायक है और यह काफी सस्ता भी है। इसके अंतर्गत मरीज को हर तरह की काउंसलिंग दी जाती है जिससे उन्हें जल्दी उबरने में मदद मिलती है। ये न सिर्फ डॉक्टर से आपकी अपॉइंटमेंट का ध्यान रखते हैं बल्कि आप समय पर दवाइयां ले रहे हैं या नहीं और आपमें कितना सुधार हुआ है उसका भी ध्यान रखते हैं। आइये इनकी कार्यप्रणाली के बारे में विस्तार से जानते हैं।
ये मरीज की अपॉइंटमेंट के साथ साथ, डॉक्टर तक मरीज को कैसे पहुँचाया जाये उसका भी पूरा ध्यान रखते हैं और सुविधानुसार मीटिंग फिक्स करते हैं। इससे मरीज को इन सब चीजों को लेकर कोई टेंशन नहीं रहती है और मरीज का पूरा ध्यान सिर्फ ठीक होने पर रहता है। ये बीच बीच में मरीज को प्रोत्साहित भी करते रहते हैं जिससे उनका हौसला बना रहे और वे एंग्जायटी या स्ट्रेस के शिकार न हो। इन सबके अलावा ये रोजाना के कामों में भी मरीज की पूरी मदद करते हैं जैसे कि मरीज को नहलाना उसके कपड़े बदलना उन्हें टॉयलेट लेकर जाना इत्यादि। ऐसे में मरीज का अकेलापन भी दूर हो जाता है और इससे जल्दी ठीक होने में मदद मिलती है।
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अनुवादक: Anoop Singh
चित्र स्रोत: Shutterstock