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Written By: Editorial Team | Updated : January 5, 2017 8:39 AM IST
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अनुवादक – Shabnam Khan
आप सभी को इस बात की जानकारी होगी कि पर्याप्त नींद कितनी ज़रूरी है, और ठीक से नींद न लेने के कारण सेहत पर बुरा असर पड़ता है। लेकिन वहीं कुछ लोगों का सोचना ये भी है कि अगर आप ज़रूरत से ज्यादा नींद ले लेते हैं तो आपको दिनभर सुस्ती रहती है।
एक अंदाज़े के अनुसार साधारण जनसंख्या का 4-6 प्रतिशत हिस्सा हाइपरसोमनिया यानी जरूरत से ज्यादा नींद आने की समस्या से परेशान है, जिसका असर उनका उनकी रोज़ की जिंदगी पर पड़ता है। अगर आप हर रात 10-12 घंटे सोते हैं और फिर भी जब सुबह उठते हैं तो थकान महसूस करते हैं तो आपको अपनी नींद पर थोड़ा ध्यान देने की जरूरत है, साथ ही स्लीप स्पेशलिस्ट से सलाह भी लेनी चाहिए।
ये ज़रूरी है कि आप ज्यादा नींद आने की समस्या को गंभीरता से लें क्योंकि हापरसोमनिया नाम की ये समस्या स्ट्रोक से संबंधित है। इसके अलावा अल्ज़ाइमर और पार्किंसन डिज़ीज़ जैसी बीमारियों से भी इसके तार जुड़े हुए हैं। हाइपरसोमनिया अलग-अलग तरह का हो सकता है। आइये इसके प्रकार को भी जान लें।
नैक्रोलैप्सी हाइपरसोमनिया
ये एक दुर्लभ और गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जो कुल जनसंख्या के सिर्फ 0.026% लोगों को प्रभावित करती है। इसकी वजह से इंसान सामान्य रूप से नींद नहीं लेता, और दिन में ज्यादा नींद महसूस करता है। इसका एक और लक्षण है, कैटाप्लेक्सी (cataplexy) जिसमें इंसान गहरी भावनाओं जैसे हंसी, गुस्सा या उत्तेजना को जाहिर नहीं कर पाता। इसके मरीज सोते जागते हुए हैलुसिनेशन महसूस करते हैं, इन्हें स्लीप पैरालायसिस और खराब नींद की समस्या भी हो सकती है। इस तरह के हाइपरसोमनिया के लक्षण किशोरावस्था से शुरू हो जाते हैं, इसके कारणों का अब तक पता नहीं लगाया जा सकता है। इस बीमारी का पता कई डॉक्टर नहीं लगा पाते, इसका पता स्लीप स्पेशलिस्ट ही लगा पाते हैं जिसके लिए वो कुछ टेस्ट भी करते हैं। नैक्रोलैप्सी का फिलहाल इलाज नहीं है।
इडियोपैथिक हाइपरसोमनिया
ये भी एक दुर्लभ बीमारी है। अध्ययनों में पाया गया है कि इसकी संभावना नैक्रोलैप्सी से 10 गुना कम होती है। दि इंटरनैशनल क्लासीफिकेशन ऑफ स्लीप डिसॉर्डर्स ने इडियोपैथिक हाइपरसोमनिया को इस तरह परिभाषित किया है, ‘एक सामान्य या दीर्घकालीन रात्री नींद और साथ में बहुत ज्यादा नींद।’ इसके मरीज़ रात में अपनी पूरी नींद लेने के बावजूद दिन में एक या दो घंटे नींद लेते हैं, और दिनभर उनींदापन महसूस करते हैं। इससे मरीज़ की प्रोफेशनल लाइफ पर असर पड़ता है। 10 घंटे से ज्यादा सोने वालों की मेमोरी और कॉन्सनट्रेशन ठीक नहीं रहती। इस बीमारी के कारण का अब तक पता नहीं चल पाया है, न ही इसका कोई इलाज है।
रीकरेंट हाइपरसोमनिया
इस तरह के हाइपरसोमनिया को बार-बार ज्यादा नींद आने से जोड़ा जाता है, इसमें कई दिनों या कई हफ्तों तक बहुत नहीं आती है। इसमें मरीज़ 18-18 घंटे सो सकता है। वो सिर्फ खाने-पीने या टॉयलेट जाने के लिए बिस्तर से बाहर निकलता है। ऐसा कुछ हफ्तों या महीनों तक चल सकता है। और जब ऐसा खत्म होता है तो मरीज़ नॉर्मल नींद लेने लगता है। इसके लक्षण, जरूरत से ज्यादा भूख, सेक्स की इच्छा न होना और चिड़चिड़ापन है। इस समस्या का पता लगाना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है।
चित्र स्रोत – Shutterstock
संदर्भ
1. Dauvilliers Y, Buguet A. Hypersomnia. Dialogues in Clinical Neuroscience. 2005;7(4):347-356.