जानिये आख़िर क्यों है ज़रूरी सूर्य ग्रहण के बाद नहाना

सूर्य ग्रहण के बाद नियमों का पालन करना क्या सही है?

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Written By: Editorial Team | Updated : January 5, 2017 8:33 AM IST

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अनुवादक: Mousumi Dutta

भारतीय मान्यता के अनुसार सूर्यग्रहण के बाद बहुत सारे नियमों का पालन किया जाता है।  लेकिन क्या आपने कभी ये सोचा है क्यों ज्योतिषी हो या घर के बड़े ग्रहण के बाद नहाने के लिए कहते हैं या खाना बनाकर रखने से मना करते हैं, पानी के जार में दुर्वा घास डालकर रखने जैसे नियमों को मानने के लिए कहते हैं। लेकिन सच तो ये है कि इस तरह के परंपरा के पीछे स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का भाव छिपा रहता है। क्यों सोच में पड़ गए, न? चलिये इसके पीछे के राज़ के बारे में जानते हैं-

पानी और खाने के बर्तन में दुर्वा घास डालना चाहिए

आम तौर पर दुर्वा घास का इस्तेमाल पूजा के अवसर पर किया जाता है क्योंकि इसको पवित्र माना जाता है। ज्योतिषियों का मानना है कि दुर्वा घास को पानी में डालने से वह पवित्र हो जाता है। बायोनैनोसाइन्स 2015 के आर्टिकल में ये पब्लिश हुआ था कि दुर्वा घास में रोगाणुनाशक गुण होता है जो खाना या पानी को रोगाणुमुक्त रखने में मदद करता है। सूर्य ग्रहण के दौरान सूर्य का प्रकाश कम हो जाने के कारण जीवाणु का पनपना बढ़ जाता है। इसलिए ग्रहण के दौरान दुर्वा घास पका हुआ खाना या पीने के पानी में दुर्वा घास डालने पर वो संदूषित (contamination) नहीं होता है।

ग्रहण के दौरान कोई भी पका हुआ खाना संग्रह करके न रखें- इस मान्यता के पीछे विज्ञान ये है कि ग्रहण के दौरान जीवाणुनाशक पराबैंगनी विकिरण अनुपलब्ध होते हैं जो रोगाणु को पनपने से रोकने में मदद करते हैं। इसलिए ग्रहण के दौरान पका हुआ खाना संग्रह करने पर उनके खराब होने की संभावना तीव्र होती है।

ग्रहण के बाद नहाना चाहिए

ये भारतीय मान्यता है कि ग्रहण के पहले या बाद में राहु का दुष्प्रभाव रहता है जो नहाने के बाद ही जाता है। इस मान्यता के पीछे भी एक विज्ञान है। सूर्य के अपर्याप्त रोशनी के कारण जीवाणु या कीटाणु ज्यादा पनपने लगते हैं जिसके कारण इंफेक्शन होने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है। इसलिए ग्रहण के बाद नहाने से शरीर से अवांछित टॉक्सिन्स निकल जाते हैं और बीमार पड़ने के संभावना को कुछ हद तक दूर किया जा सकता है।

ग्रहण के दौरान उपवास करना चाहिए

ग्रहण प्रेरित गुरुत्वाकर्षण के लहरों के कारण ओजोन के परत पर प्रभाव पड़ने और ब्रह्मांडीय विकिरण दोनों के कारण पृथ्वीवासी पर कुप्रभाव पड़ता है। इसके कारण ग्रहण के समय जैव चुंबकीय प्रभाव बहुत सुदृढ़ होता है जिसके प्रभाव स्वरूप पेट संबंधी गड़बड़ होने की ज्यादा आशंका रहती है। इसलिए शरीर में किसी भी प्रकार के रासायनिक प्रभाव से बचने के लिए उपवास करने की सलाह दी जाती है। इसके साथ मंत्रोच्चारण करने से मन शांत रहता है और व्यक्तिगत कंपन के प्रभाव को भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

अब शायद आपने मान ही लिया होगा कि हर भारतीय मान्यता या रिवाज़ के पीछे वैज्ञानिक कारण होता है।

चित्र स्रोत:Shutterstock

संदर्भ-

Raj, D. S., Sushmetha, A. M., Jayashree, S., Seshadri, S., Balasubramani, S., Pemaiah, B., & Parthasarathy, M. (2015). Hierarchical Nanofeatures Promote Microbial Adhesion in Tropical Grasses: Nanotechnology Behind Traditional Disinfection. BioNanoScience, 5(2), 75-83.

Kumar, S. S., & Rengaiyan, R. (2014). Vedic mythology of solar eclipse and its scientific validation. Indian Journal of Traditional Knowledge, 13(4), 716-724.


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