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अनुवादक: Anoop Singh
आपकी आँखों से जुड़ी समस्याएं इस बात पर निर्भर करती हैं कि आप अपने ब्लड शुगर लेवल को कितना नियंत्रित रखते हैं। जब तक आपका एचबीए1सी (HbA1C)जो कि आपके ब्लड ग्लूकोज लेवल का मापक है, कण्ट्रोल में रहता है तो आपको डायबिटीज़ के कारण होने वाली आखों की बीमारी जैसे कि डायबिटिक रेटिनोपैथी (Diabetic retinopathy) होने का खतरा बिलकुल भी नहीं रहता है। डायबिटिक रेटिनोपैथी तभी होती है जब आपका हाई ब्लड शुगर लेवल, रेटिना में जाने वाले रक्त प्रवाह में बाधा डालने लगता है। रेटिनोपैथी आमतौर पर डायबिटीज के मरीजों को ही होता है। बैंगलोर स्थित अपोलो शुगर क्लिनिक के कंसलटेंट डायबोटोलोजिस्ट डॉ बालाजी जगनमोहन ने हमसे डायबिटिक रेटिनोपैथी के बारे में विस्तार से बात की।
डायबिटीज आँखों को कैसे नुकसान पहुंचाता है : जब आपका ब्लड ग्लूकोज लेवल नियंत्रण में नहीं रहता है तो आपकी इम्युनिटी भी गिरने लगती है जिस कारण आपको डायबिटिक रेटिनोपैथी जैसी बीमारियाँ हो जाती है। बढ़ती उम्र के साथ इसके होने की सम्भावना और बढ़ती जाती है, जिसका मतलब है कि इससे सिर्फ रेटिना को ही नुकसान नहीं है बल्कि आँखों से जुड़ी अन्य बीमारियां जैसे कि कैटरेक्ट और ग्लूकोमा (cataract and glaucoma) होने का खतरा भी बढ़ जाता है। इसलिए हाइपरटेंशन और डायबिटीज के मरीजों में ग्लूकोमा होने का खतरा ज्यादा रहता है। इसलिए अपने ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखना सबसे ज्यादा ज़रूरी है। इसके लक्षण भी तभी दिखते हैं जब नुकसान बहुत ज्यादा हो चुका होता है या आपका ग्लूकोज लेवल 300-400 मिग्रा/डीएल तक हो जाता है। इसीलिए डायबिटीज के मरीज को नियमित अंतराल पर चेकअप कराने की सलाह दी जाती है। डायबिटिक रेटिनोपैथी के मुख्य लक्षण निम्न हैं :
बचाव के तरीके : इससे बचने का सबसे आसान उपाय है कि, हर डायबिटीज के मरीज को साल में एक बार अपने रेटिना का चेकअप ज़रूर करवा लेना चाहिए भले ही आपका ब्लड ग्लूकोज लेवल कंट्रोल में हो। डायबिटीज के मरीजों को मेटाबोलिक मेमोरी होती है जिसका मतलब यह है कि अगर उनका ब्लड लेवल सामान्य भी है फिर भी अगर डायबिटीज के कारण उनके किसी अंग को कोई नुकसान हुआ है तो उसे फिर से ठीक नहीं किया जा सकता है। इसलिये ऐसे कई कई मामले सामने आये हैं जिनमे मरीज का ब्लड ग्लूकोज लेवल सामान्य होने के बावजूद भी उनकी आँखों में कुछ बदलाव देखे गये वैसे ही कुछ लोगों को पैरों में तेज सनसनाहट भी महसूस होने लगती है।
जिन लोगों का डायबिटीज कण्ट्रोल में नहीं रहता है वे अपनी समस्या लेकर डॉक्टर के पास जाते हैं और डॉक्टर उसी हिसाब से उनके रेटिना में बदलाव कर देते हैं। कुछ ख़ास मामलों में आपका ओफ्थाल्मोलॉजिस्ट (ophthalmologist) आपको इंट्रा-विट्रेअस (intra-vitreous) का इंजेक्शन भी लगा सकते हैं जो कि सीधे रेटिना में ही लगाया जाता है। अगर आपको बहुत अधिक मात्रा में ब्लीडिंग हो रही है तो फिर उसका इलाज ऑपरेशन से ही किया जायेगा।
चित्र स्रोत: Shutterstock