थैलेसेमिया मेजर और थैलेसेमिया माइनर में क्या है अंतर, जानें कैसे और कब बन जाती है यह बीमारी गम्भीर

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 7 से 10 हजार ऐसे बच्चों का जन्म होता है जिन्हें अनुवांशिक थैलीसीमिया की बीमारी होती है।

WrittenBy

Written By: Sadhna Tiwari | Updated : May 13, 2024 11:00 AM IST

WrittenBy

Medically Verified By:

World Thalassemia Day 2024: थैलेसीमिया एक प्रकार का ब्लड डिसॉर्डर है जिसमें पीड़ित व्यक्ति की रेड ब्लड सेल्स या लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन का लेवल बहुत कम मात्रा में बन पाता है। थैलेसीमिया एक गम्भीर और घातक बीमारी है। शरीर की रेड ब्लड सेल्स में हीमोग्लोबिन होता है, जिसका काम फेफड़ों से शरीर के अन्य हिस्सों तक ऑक्सीजन की सप्लाई करना बै। लेकिन, थैलेसीमिया के मरीजों में हीमोग्लोबिन का स्तर हमेशा कम ही रहता है। थैलेसीमिया एक अनुवांशिक बीमारी है और भारत में इस बीमारी (Thalassemia in India)से पीड़ित बच्चों की संख्या भी चिंताजनक है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 7 से 10 हजार ऐसे बच्चों का जन्म होता है जिन्हें अनुवांशिक थैलीसीमिया की बीमारी होती है। थैलेसीमिया की इस गम्भीर बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल वर्ल्ड थैलेसीमिया डे (World Thalassemia Day) मनाया जाता है।

क्या है थैलेसीमिया की बीमारी ? (What is Thalassemia)

हीमोग्लोबीन का निर्माण 2 तरह के प्रोटीन से होता है पहला, अल्फा ग्लोबिन और दूसरा, बीटा ग्लोबिन। थैलीसीमिया में मरीज के शरीर में इन प्रोटीन की मदद से हीमोग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में गड़बड़ी ने लगती है। जिससे रेड ब्लड सेल्स (Red blood cells) तेजी से नष्ट होने लगती हैं। इससे मरीज के शरीर में खून की बहुत अधिक कमीहोने लगती है। ऐसे में मरीज के शरीर में जल्दी-जल्दी खून चढ़ाना पड़ सकता है। उम्र बढ़ने के साथ ही रक्त की जरूरत भी अधिक होने लगती है और तब कुछ दिनों के बाद ही खून चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है।

थैलेसीमिया के कारण क्या है? (Causes of Thalassemia)

यह एक अनुवांशिक बीमारी है जो माता-पिता से बच्चों को मिलती है। अगर थैलेसीमिया के मरीजों की आपस में शादी होती है तो उनके बच्चे में इस बीमारी का रिस्क होता है। थैलेसीमिया की बीमारी मुख्यतः दो तरह की होती है जिसे थैलेसीमिया मेजर और थैलेसीमिया माइनर(Thalassemia Minor vs. Thalassemia Major) कहा जाता है।

थैलेसीमिया माइनर (Thalassemia Minor) :

थैलेसीमिया से पीड़ित किसी एक पेरेंट ( माता या पिता) के बच्चों में थैलेसीमिया माइनर का रिस्क होता है।

थैलेसीमिया की बीमारी के बारे में बात करते हुए डॉ. राधेश्याम नायक (Dr. Radheshyam Naik, Consultant Medical Oncologist and Hematologist and Bone Marrow Transplant Physician with Sammprada Hospital, Bengaluru) बताते हैं कि, थैलेसीमिया माइनर (Thalassemia Minor) को थैलेसीमिया ट्रेट (thalassemia trait) भी कहा जाता है। इस तरह के मरीजों को थैलेसीमिया कैरियर भी कहा जाता है। इन लोगों में थैलेसीमिया बीमारी के जीन (thalassemia gene) होते हैं। आमतौर पर इन लोगों में बीमारी का एक साधारण जीन मौजूद होती है और थैलेसीमिया की एक म्यूटेड जीन इन लोगों में पायी जाती है। माइनर में एनिमिया के अलावा अन्य किसी प्रकार के लक्षण भी दिखायी नहीं देते। ऐसे लोगों को हल्की थकान हो सकती है लेकिन ये एसिम्पटोमेटिक (asymptomatic) होते हैं। डॉ. नायक कहते हैं कि थैलेसीमिया माइनर को आमतौर पर डॉक्टरी इलाज की जरूरत नहीं पड़ती।

थैलेसीमिया मेजर:

ऐसे बच्चे जिनके माता और पिता दोनों को थैलेसीमिया बीमारी होती है। ऐसे केस को थैलेसीमिया मेजर (Thalassemia  Major) कहा जाता है।

थोलेसीमिया मेजर (Thalassemia Major) मरीजों को कूलीज़ एनिमिया (Cooley's anaemia) हो सकता है जो बीमारी का गम्भीर लक्षण है। थैलेसीमिया के मेजर पेशेंट्स में माता-पिता दोनों से मिले जीन थेलेसीमिया की बीमारी का कारण बनते हैं। थैलेसीमिया मेजर में ये स्थितियां देखी जाती हैं-

इन लोगों में रेड ब्लड सेल्स (Red Blood cells) की कमी होती है और हीमोग्लोबिन कम बनता है जिससे गम्भीर एनिमिया की स्थिति बन जाती है।

शरीर में खून ना बनने के कारण मरीजों को जिंदा रखने के लिए बार-बार खून चढ़ाना (blood transfusions) पड़ता है।

हिमोलाइसिस (haemolysis) और बार-बार खून चढ़ाने की वजह से मरीज के शरीर में आयरन जमा होने लगता है। इसकी वजह से लिवर सिरोसिस ( liver Cirrhosis), कार्डियक डिजिज (Cardiac disease) और प्लीहा से जुड़ी बीमारी स्प्लेनोमेगाली (splenomegaly) का खतरा बढ़ सकता है.

थैलेसीमिया मेजर पेशेंट्स में एनिमिया, थकान, हड्डियों में टेढ़ापन (bone deformity) और विकास से जुड़ी समस्याएं हो सकता है।

थैलेसीमिया के लक्षण क्या हैं? (Symptoms of Thalassemia )

आमतौर पर बच्चे में 3 महीने की उम्र के बाद थैलेसीमिया के लक्षण(Symptoms of Thalaisimia in babies) दिखायी देने लगते हैं। ये लक्षण हैं-

  • नाखूनों और जीभ का रंग पीला पड़ना
  • बच्चे के जबड़ों और गालों में बदलाव आना
  • बच्चे का ठीक तरीके से विकास ना हो पाना।
  • बच्चे का वजन ना बढ़ना
  • कमजोरी
  • सांस लेने से जुड़ी तकलीफें
  • और चेहरे की स्किन पर ड्राइनेस

थैलेसीमिया की बीमारी से जुड़ी कॉम्प्लिकेशन्स

थैलेसीमिया के मरीजों को उम्र और शारीरिक बनावट के अनुसार महीने में एक से तीन बार रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ जाती है। इससे शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर तो मेंटेन हो जाता है लेकिन बार-बार रक्त चढ़ाने से शरीर में आयरन जमा होने लगता है। यह बढ़ा हुआ आयरन लेवल शरीर के अंदरूनी ऑर्गन्स डैमेज होने लगते हैं। इससे लिवर, किडनी और हार्ट को नुकसानहो सकता है।

अगर इस आयरन ओवरलोड (Iron Overload) को कम ना किया जाए तो यह हानिकारक साबित हो सकता है।

इसी तरह मरीजों को समय पर दवाइयां खिलाने और डाइट पर ध्यान ना देने से मरीज की स्थिति बिगड़ सकती है।

Add The Health Site as a Preferred Source Add The Health Site as a Preferred Source

Disclaimer: The content on TheHealthSite.com is only for informational purposes. It is not at all professional medical advice. Always consult your doctor or a healthcare specialist for any questions regarding your health or a medical condition.