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Diabetic Nephropathy in Hindi: डायबिटीज सिर्फ ब्लड शुगर बढ़ने का नाम नहीं है, इसके अलावा भी यह आपके शरीर के कई अंगों पर धीरे-धीरे असर डालने वाली एक खतरनाक बीमारी है। बहुत ही कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि अगर किसी को लंबे समय से डायबिटीज है और उसे ठीक से मैनेज नहीं किया जा रहा है, तो उसका असर शरीर के कई अंदरूनी अंगों पर पड़ता है और उनमें से एक किडनी भी है। शारदाकेयर-हेल्थसिटी में न्यूरोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. कुणाल राज गांधी ने के अनुसार अगर डायबिटीज के किसी मरीज का ब्लड शुगर लंबे समय से ज्यादा बढ़ा हुआ है, तो इसका असर किडनी जैसे जरूरी ऑर्गन्स पर भी पड़ सकता है। डायबिटीज के मरीजों में होने वाली ऐसी ही एक किडनी डिजीज है, जिसे डायबिटिक नेफ्रोपैथी कहा जाता है। जिसे सरल भाषा में कहें तो यह मधुमेह से होने वाला एक किडनी रोग है, जो धीरे-धीरे विकसित होता है और अगर समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए तो यह किडनी फेलियर का कारण भी बन सकता है।
हमारी किडनी का मुख्य काम खून से अपशिष्ट पदार्थ को फिल्टर करना और शरीर से अतिरिक्त तरल पदार्थों को फिल्टर करके शरीर से बाहर निकालना है। हर किडनी में लाखों छोटे-छोटे फिल्टर होते हैं जिन्हें नेफ्रॉन कहा जाता है और उनके भीतर जो संरचना होती है उन्हें ग्लोमेरुली कहा जाता है। यह फिल्टर खून से गंदगी और पानी अलग करते हैं और उन्हें पेशाब के माध्यम से शरीर से बाहर भेजते हैं। जब ब्लड शुगर लंबे समय तक उच्च स्तर पर रहता है, तो इससे किडनी के अंदर इन छोटी-छोटी संरचनाओं को नुकसान पहुंचने लगता है।
हाई ब्लड शुगर की वजह से ग्लोमेरुली की झिल्ली कमजोर होने लगती है और इस कारण से लीक हो जाती है, जिससे एल्ब्यूमिन जैसे जरूरी ब्लड प्रोटीन गलती से फिल्टर होकर पेशाब में जाने लगता है। यही डायबिटिक नेफ्रोपैथी का शुरुआती संकेत हो सकता है। यह समस्या अगर बढ़ती जाए, तो किडनी की फिल्टर करने की क्षमता लगातार घटने लगती है।
हाई ब्लड शुगर के कारण किडनी की नाजुक रक्त-नलिकाएं व अन्य संरचनाएं समय के साथ सख्त और कठोर हो जाती हैं। इससे वे उतना प्रभावी रूप से काम नहीं कर पाती हैं, जितना उन्हें सामान्य रूप से करना चाहिए।
अगर लंबे समय से ब्लड शुगर लेवल बढ़ा हुआ है और ठीक से मैनेज नहीं किया जा रहा है, तो अक्सर यह ब्लड प्रेशर को भी बढ़ा देता है। उच्च रक्तचाप किडनी पर अतिरिक्त दबाव डालता है और इससे किडनी की फिल्टर करने वाली क्षमताओं को और ज्यादा नुकसान पहुंचता है।
बढ़ा हुआ शुगर किडनी में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन पैदा कर सकता है। इससे किडनी के टिश्यू और फिल्टरिंग सिस्टम में धीरे-धीरे क्षति होती है।
ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि डायबिटिक नेफ्रोपैथी अक्सर धीरे-धीरे शुरू होता है और इसके शुरुआती चरणों में आमतौर पर बहुत ही कम लक्षण देखने को मिलते हैं जो अक्सर जाने-अनजाने में इग्नोर हो जाते हैं। कुछ आम संकेतों में शामिल हो सकते हैं -
अगर किसी डायबिटीज के मरीज में ऊपर बताए गए ये लक्षण दिखते हैं, तो यह उनकी किडनी के स्वास्थ्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। ऐसे में उन्हें तुरंत किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT) कहा लेना चाहिए। साथ ही साथ पेशाब में प्रोटीन की जांच (एल्ब्यूमिन) और खून की ईजीएफआर रिपोर्ट आदि की जांच कराना भी बेहद जरूरी है।
डायबिटिक नेफ्रोपैथी विकसित होने से बचाव करना या फिर उसे और ज्यादा बढ़ने से रोकना संभव है, इसके लिए बस आपको ध्यान रखना होगा कि आप सही समय पर सही कदम उठा पा रहे हैं, जो निम्न हो सकते हैं -
डायबिटिक नेफ्रोपैथी हाई ब्लड शुगर के मरीजों के लिए एक बेहद गंभीर समस्या बन सकती है, लेकिन समय रहते इसकी पहचान और सही मैनेजमेंट से इस स्थिति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। अपनी किडनी की सुरक्षा के लिए नियमित जांच, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर नियंत्रण बेहद महत्वपूर्ण हैं। आज से ही इन आदतों को अपनाकर आप अपनी किडनी और संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर रख सकते हैं।
डॉ. कुणाल राज गांधी
अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।