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अक्सर बच्चों में कैंसर के लक्षणों की पहचान कर पाना मुश्किल होता है, जिसके कारण उन्हें आगे चलकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बच्चों के कैंसर मामलों में रोगमुक्त होने की अधिक संभावना को देखते हुए एक्सपर्ट इस बात पर भी जोर देते हैं कि अभिभावकों को अपने बच्चों में इस खतरे के निशान को लेकर जागरूक रहना होगा और इस तरह के कैंसर के इलाज के लिए उपलब्ध आधुनिक उपचार पद्धतियों की जानकारी रखनी होगी।
फोर्टिस हॉस्पिटल गुरुग्राम में पीडियाट्रिक हीमेटोलॉजी, ऑन्कोलॉजी एंड बीएमटी के निदेशक डॉ. विकास दुआ कहते हैं कि भारत में कैंसर के कुल मामलों में बच्चों के कैंसर के तकरीबन 5 फीसदी मामले पाए गए हैं। बच्चों के कैंसर के ज्यादातर मामले लड़कों में पाए जाते हैं और हाल के सर्वे के मुताबिक बालकों में कैंसर के मामले देश के कुल मामलों के मुकाबले दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में कहीं ज्यादा हैं।
भारत में 5 से 14 साल की उम्र के बच्चों में मृत्यु दर का नौवां सबसे बड़ा कारण कैंसर ही है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत में बच्चों के कैंसर के इलाज में अहम प्रगति देखी गई है और अत्याधुनिक चिकित्सा संस्थानों में इलाज कराने वाले बच्चों के जीवित रहने की दर पांच साल के दौरान 75 से 79 फीसदी देखी गई है जहां पूर्ण प्रशिक्षित और अनुभवी बाल कैंसर विशेषज्ञों से उनका इलाज किया जाता है।
फोर्टिस हॉस्पिटल, गुरुगाम में पीडियाट्रिक हीमैटोलॉजी एंड ऑन्कोलॉजी के निदेशक डॉ. विकास दुआ बताते हैं कि बच्चों में करीब 10 से अधिक प्रकार के कैंसर देखे गए हैं। इनमें से सामान्य कैंसर के कुछ मामले एक्यूट ल्यूकेमिया, ब्रेन ट्यूमर, लिम्फोमा, न्यूरोब्लास्टोमा, विल्म ट्यूमर, रेटिनोब्लास्टोमा और सॉफ्ट टिश्यू सरकोमा शामिल हैं। इनमें से बच्चों में सबसे ज्यादा मामले एक्यूट ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) के पाए गए हैं जो सभी तरह के बाल कैंसर में एक तिहाई से ज्यादा है।
एक्यूट ल्यूकेमिया दो प्रकार के होते हैं: एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (एएलएल) और एक्यूट मायल्यॉड ल्यूकेमिया (एएमएल)। इनमें एएमएल के मुकाबले एएलएल लगभग तीन गुना अधिक होता है।
यह जानना अत्यंत जरूरी है कि इन बच्चों का इलाज किसी पीडियाट्रिक हीमेटो-ऑन्कोलॉजिस्ट से ही कराया जाता है क्योंकि बच्चों की मानसिकता और कीमोथेरापी दवाओं के प्रति उनकी संवदेना वयस्कों से बहुत अलग होती है जिसे कोई शिशु रोग विशेषज्ञ ही समझ सकता है। एएलएल के ज्यादातर मरीजों पर कीमोथेरापी का अच्छा असर होता है। हालांकि इनमें से 5-10 फीसदी मामले अत्यंत जोखिमपूर्ण होते हैं और इनका बोन मैरो ट्रांसप्लांट के जरिये सफल इलाज किया जा सकता है।
उन्होंने कहा, 'बच्चों में खतरे के कुछ निशान ऐसे होते हैं जिन्हें देखते ही फैमिली फिजिशियन या शिशुरोग विशेषज्ञ बच्चे को पीडियाट्रिक हीमेटो-ऑन्कोलॉजिस्ट के पास भेज देते हैं। इनमें हीमोग्लोबिन का कम स्तर, श्वेत रक्तकण की कम या ज्यादा मात्रा और प्लेटलेट की कम मात्रा शामिल हैं और इन निष्कर्षों को हमेशा पोषक तत्वों या संक्रमण से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है। बच्चे में यदि बार-बार बेवजह बुखार,आलस, रक्तस्राव, हड्डी का दर्द और गर्दन में सूजन की शिकायत आए तो अभिभावकों को किसी पीडियाट्रिक हीमेटो-ऑन्कोलॉजिस्ट से भी दिखा लेना चाहिए।'