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कोरोना पेशेंट के लिए उनका टेस्ट नेगेटिव आना किसी जंग को जीतने से कम नहीं है लेकिन जान लें ये सिर्फ आधी लड़ाई है। कोरोना यानी की COVID-19, एक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो शरीर पर एक बहुत बड़ा प्रभाव डालती है और रिकवर होने के बाद भी शरीर में लक्षण छोड़ देती है, भले ही आपको हल्का संक्रमण हुआ हो या फिर कितना ही गंभीर। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ, ब्रिटेन (NIH) द्वारा हाल ही में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, कोरोना से ठीक होने के बाद भी न केवल संक्रमण होने की संभावना बनी रहती है बल्कि ये आपके शरीर के सभी अंगों और मस्तिष्क को प्रभावित करने वाले लक्षण का कारण बन सकता है।
डॉक्टरों का सुझाव है कि कोरोना से पूरी तरह ठीक होने में एक या दो महीने लग सकते हैं और कुछ मामलों में कोरोना शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर लंबे समय तक के लिए प्रभाव छोड़ सकता है और इससे बचने के लिए लंबे समय तक स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता होती है। हृदय संबंधी परेशानियां, थ्रोम्बोसिस से नर्व डिसऑर्डर जैसे कुछ संकेत हैं, जो ये बताते हैं कि कोरोना ने आपको लंबे समय तक के लिए बीमार बना दिया है। तो आइए जानते हैं कौन से संकेत बताते हैं कि आपका कौन सा अंग कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है।
कोरोना से पूरी तरह ठीक होने वाले लोग हृदय संबंधी शिकायतों को लेकर अस्पताल लौट रहे हैं। हैरानी की बात ये है कि उन्हें पहले कभी भी इस प्रकार की समस्याएं नहीं हुई थीं। इन लोगों को बैचेनी, छाती में भारीपन और हृदय संबंधी जटिलताओं की शिकायत हो रही है। कुछ लोगों को लंबे समय तक जांच कराने के लिए भी कहा गया है। वास्तव में, कोरोना से ठीक होने वाले लोगों को मायोकार्डिअल इंजरी और इंफेक्शन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जो कि कोरोना संक्रमितों में आम समस्या के रूप में सामने आया है। इससे बचने के लिए डॉक्टरों ने अपने आहार और जीवन शैली में बदलाव करने की सलाह दी है।
हमारे दिल के अलावा कोरोना ने हमारे फेफड़ों पर हमला कर शरीर की कार्यप्रणाली को बहुत गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ये संक्रमण आपके श्वसन अंगों को नुकसान पहुंचाकर एक खतरनाक स्थिति पैदा कर देते है, जिसे आमतौर पर लंग फाइब्रोसिस कहा जाता है। COVID-19 मुख्य रूप से एक श्वसन संक्रमण है और ये हमारे फेफड़ों की कार्यप्रणाली को कम करने का काम करता है। ये संक्रमण आपके श्वसन तंत्र के कुछ हिस्सों में 'थक्के' बनाने का काम शुरू कर देता है, जिसके कारण सांस लेना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है, जिसके परिणामस्वरूप लोग सांस लेने में तकलीफ, थकान, ऑक्सीजन लेने में तकलीफ का सामना करते हैं। ये सभी लंग फाइब्रोसिस के कुछ शुरुआती लक्षण हैं और इसमें जल्दी देखभाल और सहायता की आवश्यकता होती है। जल्द से जल्द देखभाल करने में विफलता के कारण किसी भी व्यक्ति को अपनी जान गंवानी पड़ सकती है खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसकी उम्र 50 वर्ष से अधिक है, या फिर सांस संबंधी विकारों से ग्रस्त है।
थ्रोम्बोसिस, रक्त वाहिकाओं में रक्त के थक्कों के बनने को कहा जाता है, जो शरीर की संचार प्रणाली के माध्यम से रक्त प्रवाह को रोकने का काम करता है। कुछ मामलों में कम या बाधित रक्त प्रवाह कुछ रोगियों की नसों में रक्त के थक्कों को विकसित करने का खतरा बढ़ा देता है, जिसके कारण संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। यह उन व्यक्तियों के लिए घातक साबित हो सकता है, जो पहले से ही डायबिटीज से पीड़ित हैं। यही कारण है कि डॉक्टर इस प्रकार की जटिलताओं की संभावना को कम करने के लिए एस्पिरिन जैसी रक्त पतला करने वाली दवाएं ले रहे हैं।
न्यूयॉर्क में हुए कुछ अध्ययनों से पता चला है कि कोरोना के गंभीर मामलों में लोगों की किडनी को काफी नुकसान पहुंचा है। अध्ययन के मुताबिक, गंभीर रूप से बीमार कोरोना रोगियों में से 60% से अधिक को लॉन्ग टर्म सपोर्ट की आवश्यकता होती है। शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि यह शरीर को होने वाले नुकसान के सबसे साइलेंट संकेतों में से एक है। क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD), रीनल फेल्योर जैसी समस्याएं भी आमतौर पर उन मरीजों में बताई जा रही हैं, जो कोरोना से ठीक हुए हैं।
ब्रेन फॉग, चिंता, अवसाद, पीटीएसडी और जीवन की गुणवत्ता में कमी, ऐसे कुछ कोरोना के लक्षण हैं जिनके बारे में लंबे समय से चर्चा चल रही हैं। इससे सिर्फ इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैसे एक साधारण सा 'श्वसन' वायरस आपके मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के लिए लंबे समय तक की परेशानी पैदा कर सकता है। हालांकि यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हुआ है कि कोरोना वायरस आपके मस्तिष्क के कामकाज को कैसे और क्यों प्रभावित करता है, लेकिन ये आपके मानसिक स्वास्थ्य पर स्थायी प्रभाव छोड़ सकता है और रिकवरी को धीमा जरूर कर सकता है। कोरोना से ठीक होने वाले रोगियों में याददाश्त की कमी, भूलने की बीमारी के लक्षण भी सामने आ रहे हैं।