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Written By: Kishori Mishra | Updated : May 2, 2020 11:00 AM IST
फेफड़ों को ब्लॉक कर सकता है कोरोना वायरस, आयरलैंड के डॉक्टरों का दावा
Coronavirus and Lung blockages : आयरलैंड के डॉक्टर्स ने कोरोनावायरस को लेकर एक बड़ा खुलासा किया। उन्होंने दावा किया है कि कोरोनावायरस शरीर में खून के थक्के जमा करके फेफड़ों को ब्लॉक कर सकता है। इस स्टडी में कोरोना से गंभीर रूप से पीड़ित 83 मरीजों को शामिल किया गया था, जिसमें कोरोनावायरस का एक और खतरा सामने आया है। इस बारे में डबलिन के सेंट जेम्स हॉस्पिटल के डॉक्टर्स का कहना है कि नया वायरस मरीज के फेफड़ों में करीब 100 छोटे-छोटे ब्लॉकेज (Coronavirus and Lung blockages) बना रहा है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन लेवल कम हो जाता है और मरीज की मौत हो सकती है। शोधकर्ता प्रो. जेम्स ओ-डोनेल का इस बारे में कहना है कि कोविड-19 एक अलग तरह के ब्लड क्लॉटिंग डिसऑर्डर की वजह बनता है, जो सीधे मरीज के फेफड़ों पर हमला करता है।
ब्रिटिश जर्नल ऑफ हिमेटोलॉजी में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, स्टडी में शामिल किए गए 83 गंभीर मरीजों में 81 प्रतिशत यूरोपियन, 12 प्रतिशत एशियाई, 6 प्रतिशत अफ्रीकन और एक प्रतिशत स्पैनिश हैं। मरीजों की औसतन उम्र 64 साल है। इन मरीजों में से करीब 80 फीसदी मरीज पहले से ही किसी ना किसी बीमारी से जूझ रहे थे। इन मरीजों में से 60 फीसदी ठीक हो गए और 15.7 फीसदी मरीजों की मौत हो गई थी।
शोधकर्ताओं ने मरीजों में ब्लड क्लॉटिंग कितनी जल्दी होती है, ये देखने के लिए डी-डाइमर नाम के प्रोटीन के स्तर को चेक किया। डी-डाइमर प्रोटीन एक ऐसा प्रोटीन है, जो शरीर में अधिक होने से ब्लड क्लॉटिंग का खतरा बढ़ाता है। इस रिसर्च में मरीजों में डी-डाइमर प्रोटीन की सामन्य से अधिक मात्रा पाई गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, मरीजों के फेफड़ों में असामान्य ब्लड क्लॉटिंग के दिखे, जो छोटे-छोटे थक्के जमने की वजह से बने थे। इन मरीजों को सीधे आईसीयू में भर्ती किया गया।
शोधकर्ता प्रो. जेम्स ओ-डोनेल के अनुसार, निमोनिया की वजह से भी हमारे फेफड़े प्रभावित होते हैं, लेकिन कोरोना के मरीजों के फेफड़ों में जिस तरह का संक्रमण देखा जा रहा था, वैसा कही नहीं देखा गया। मरीजों के फेफड़ों में जमने वाले इन छोटे-छोटे थक्कों को डॉक्टर्स समझने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि मरीजों का सही से इलाज किया जा सके। इसके मामले उन मरीजों में ज्यादा दिखे हैं, जो पहले से हाई-रिस्क जोन में हैं यानी जिनकी उम्र अधिक है और जिन्हें पहले से कोई गंभीर बीमारी है।
बता दें कि यह रिसर्च अमेरिकी विशेषज्ञों की एक हेल्थ रिपोर्ट के बाद आई है। इस हेल्थ रिपोर्ट में कहा गया था कि कोरोना पीड़ितों की सबसे अधिक मौत ब्लड क्लॉटिंग की वजह से हुआ है। हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने वाले मरीजों में ब्लड क्लॉटिंग दिखा था। एक अन्य रिसर्च में बताया जा रहा है कि ब्लड क्लॉटिंग की वजह से मरीजों में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि चीनी लोगों में अनुवांशिक भिन्नताओं की वजह से ब्लड क्लॉटिंग के मामले बहुत ही कम देखे गए हैं। इसी वजह से चीन के मुकाबले अमेरिका और यूरोप में कोरोनावायरस के काफी गंभीर मामले सामने आए हैं।
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