सीओपीडी (क्रोनिक ओब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) एक ऐसी बीमारी है, जो हमारे फेफड़ों तक जाने वाले वायु के प्रवाह के सीमित हो जाने के कारण होती है। इसके पीछे की वजह विषाक्त तत्वों के संपर्क में आने के परिणामस्वरूप होता है। सीओपीडी विषाक्त तत्व व धुएं या फिर सिगरेट के धुएं जैसे हानिकारक तत्वों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से जुड़ी हुई बीमारी है। इस तरह की चीजों के संपर्क में आने से क्रोनिक इंफ्लेमेशन होती है, जिसकी वजह से वायुमार्ग की ट्यूब संकुचित हो जाती है। ये जलन व सूजन हमारे ब्रोंकाइल ट्यूब की लाइनिंग के समीप होती है, जो कि हमारे फेफड़ों तक हवा को पहुंचाने के लिए एक वायुमार्ग की तरह काम करता है।
सीओपीडी अक्सर सांस लेने में कमी, थूक उत्पादन और खांसी के साथ जुड़ा हुआ होता है। सीओपीडी बीमारी और स्थितियों का एक समूह है, जो हमारे फेफड़ों में इंफ्लेमेटरी रिस्पॉन्स का उत्पादन करता है। हालांकि ये बीमारी हमारे वायुमार्ग को स्थायी नुकसान पहुंचाती है, जिसके लिए उचित उपचार और बचाव रणीनितयों की जरूरत होती है ताकि फेफड़ों को होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सके।
सीओपीडी रोग के दो मुख्य प्रकार हैं, जिसमें से एक है क्रोनिक ब्रोंकाइटिस और एंफीसीमा।
क्रोनिक ब्रोंकाइटिसः हेल्थ एक्सपर्ट की मानें तो कुछ दिनों तक थूक या बलगम के साथ लगाार खांसी रहने को क्रोनिक ब्रोंकाइटिस के रूप में जाना जाता है, जो की बीते तीन महीने से हो रही हो।
एंफीसीमाः इस रोग में हमारे फेफड़े के टिश्यू समय के साथ-साथ क्षतिग्रस्त होते जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सांस लेने में कमी या फिर घरघराहट रहती है।
सीओपीडी के ये दो प्रकार बहुत ज्यादा दिखाई देते हैं और अक्सर लोग इससे परेशान होते हैं।
सीओपीडी की स्टेज
सीओपीडी की कुल चार स्टेज हैंः
स्टेज 0- इस मरीज को जोखिम होता है लेकिन सब कुछ सही चल रहा होता है।
स्टेज1- ये सीओपीडी के हल्के लक्षण वाली स्टेज है। इस स्थिति में FEV1/FVC रेशो 70 फीसदी से अधिक होता है। FEV1 कम से कम 80 फीसदी होने पर मरीज को लक्षण महसूस होना शुरू हो जाते हैं।
स्टेज2- ये स्थिति औसत लक्षणों के रूप में वर्गीकृत की जाती है, जिसमें FEV1/FVC रेशो 70 फीसदी से कम होता है, FEV1 के 80 फीसदी से कम होने के स्टैंडर्ड वैल्यू के रूप में जाना जाता है। इस स्थिति में मरीज क्रोनिक लक्षण महसूस करता है।
स्टेज3- इस स्थिति को गंभीर चरण के रूप में देखा जाता है। इस स्थिति में समें FEV1/FVC रेशो 70 फीसदी से कम होता है। FEV1 के 30 फीसदी तक कम हो जाता है। इस स्थिति में मरीज को क्रोनिक लक्षण महसूस होते हैं।
स्टेज4- इस स्थिति को सबसे गंभीर चरण के रूप में देखा जाता है। इस स्थिति में FEV1/FVC रेशो 70 फीसदी से अधिक होता है। FEV1 का 30 फीसदी से ज्यादा होना सामान्य माना जाता है। इस स्थिति में मरीज को बहुत ज्यादा गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं।
सीओपीडी के लक्षण
शुरुआत में सीओपीडी के दौरान हल्के या फिर लक्षण न के बराबर ही दिखाई देते हैं। हालांकि जैसे-जैसे ये बीमारी बढ़ती है आपको गंभीर लक्षण दिखाई देना शुरू हो जाते हैं जैसेः
1-बहुत दिनों से खांसी रहना या फिर लगातार खांसी (कफ के साथ)
2-सांस लेने में तकलीफ, खासकर एक्सरसाइज और चलते समय
3-सांस लेने पर घरघराहट
4-सीने में जकड़न
5-सांस लेने में दिक्कत
6-वजन का कम होना
7-कमजोरी
8-बार-बार फेफड़ों में संक्रमण
कुछ मामलों में आपको तुरंत लक्षणों के बढ़ने जैसा महसूस हो सकता है, जो कि आपके लिए प्राण घातक सिद्ध हो सकता है। कोई मरीज बीमारी के धीरे-धीरे बढ़ने के बजाए तेजी से लक्षण महसूस होने वाली समस्या से पीड़ित हो सकता है। सीओपीडी की अंतिम स्टेज के दौरान मरीज के फेफड़ों तक जाने वाला वायु का प्रवाह बहुत ज्यादा बाधित होने लगता है, जिसकी वजह से मरीज को सांस लेने में बहुत ज्यादा परेशानी होती है। पल्मोनरी रेस्पिरेटरी फेल्योर आमतौर पर मरीजों को गंभीरता की ओर ले जाता है। कुछ प्रकार की स्थितियों में पोषण की कमी, मांसपेशियों में परेशानी और वजन का कम होना जैसी समस्याएं भी सीओपीडी से जुड़ी हुई है।
सीओपीडी के कारण
1-धूम्रपानः सीओपीडी का सबसे आम कारण है लंबे अरसे तक तंबाकू का धूम्रपान के रूप में इस्तेमाल, जो कि आपके फेफड़ों के ऊत्तकों को नष्ट कर देता है और आपके वायुमार्ग को बाधित करता है।
2-प्रदूषणः अगर आप किसी कारण से कैमिकल धुएं, धूल या फिर वायु प्रदूषण के संपर्क में आते हैं या फिर आप लंबे अरसे से किसी दूसरे व्यक्ति की सिगरेट की धुआं अपने अंदर ले रहे हैं तो आपके फेफड़ों को नुकसान पहुंच सकता है।
3-कमजोर इम्यूनिटीः अगर आपकी इम्यूनिटी प्राकृतिक तौर पर कमजोर है या फिर आप अक्सर वायरल या फिर बैक्टीरियल इंफेक्शन का शिकार हो जाते हैं तो आपके सीओपीडी से ग्रस्त होने की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।
4-फेफड़ों की बीमारीः अगर आप अपने बचपन में किसी गंभीर फेफड़ों के संक्रमण से पीड़ित हो जाते हैं तो संभावना है कि आप सीओपीडी का शिकार हो सकते हैं।
जोखिम कारक
सीओपीडी के सबसे प्रमुख जोखिम कारक में से एक है धूम्रपान करना। लंबे वक्त पर्यावरणीय और धूल-मिट्टी, रसायनिक धुएं या फिर जहरीले पदार्थों के संपर्क में रहने से भी सीओपीडी के बढ़ने से जोड़कर देखा जाता है। सीओपीडी के दूसरे कारक हैं अल्फा-1 एंटीट्रिप्सिन की कमी। ये सीओपीडी का दुर्लभ कारण है, जो 40 साल से कम उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है।
सीओपीडी का निदान
इस बीमारी को बढ़ने से रोकने सबसे प्रभावी तरीका है लक्षणों की शुरुआत में पहचान करना। मरीज की शारीरिक जांच कुछ लक्षणों का खुलासा कर सकती है जैसे अत्याधिक थूक का उत्पादन, सांस लेने में तकलीफ और खांसी का पता लगाया जा सकता है। जब ये लक्षण पर्यावरणीय व प्रदूषक या फिर सिगरेट के इतिहास से जुड़े हुए होते हैं तो ये सीओपीडी की ओर ले जाते हैं। खांसी का इतिहास और लक्षण, दमा, धूम्रपान और खांसी की जांच आगे का पता लगाने के लिए भी की जाती है।
अगर आपमें सीओपीडी के लक्षण दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर इन टेस्ट की सलाह दे सकता है। इसके अलावा कुछ बॉडी टेस्ट और आपके स्वास्थ्य व जीवनशैली के इतिहास के बारे में सवाल पूछ सकता है, जिसमें ये चीजें प्रमुख रूप से शामिल है:
1-स्पाइरोमेट्री: यह आपके फेफड़ों के कार्य करने की क्षमता की जांच करने के लिए एक सरल टेस्ट है। इस टेस्ट के लिए आपको एक मशीन से जुड़ी ट्यूब में सांस लेने की आवश्यकता होती है, जो उस हवा की मात्रा को मापने का काम करती है जिसमें आप सांस ले सकते हैं और जिस बल से आप फूंकते हैं।
2-छाती का एक्स-रे: यह फेफड़ों की बीमारी (क्रोनिक ब्रोंकाइटिस और श्वसन समस्याओं) का जल्दी निदान कर सकता है और सटीक कारण और लक्षणों की पुष्टि करने में मदद करता है।
3-आर्टिरियल ब्लड गैस एनालिसिस: यह टेस्ट रक्त में ऑक्सीजन की कमी को दर्शाता है, जिससे सीओपीडी का पता लगाने में सहायता मिलती है।
सीओपीडी की रोकथाम
मरीजों में लक्षणों के तेज होने की स्थिति या फिर सीओपीडी की रोकथाम के लिए ब्रोंकोडिलेटर्स का नियमित प्रयोग किया जा सकता है। ये तरीका ओब्सट्रक्टिव पल्मोनरी रोग के लक्षणों में आराम पहुंचाने और रोकथाम का बेस्ट तरीका है।
सीओपीडी के लिए लाइफस्टाइल प्रबंधन
लाइफस्टाइल में बदलावः सीओपीडी के लक्षणों को खराब होने से बचाने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है धूम्रपान छोड़ना। इसके अलावा सीओपीडी से जूझ रहे लोगों को कुछ चीजों करने की जरूरत हैं, जो ये हैंः
1-नियमित रूप से एक्सरसाइज करना।
2-हेल्दी और पोषण युक्त डाइट लेना
3-प्रदूषक तत्वों से दूर रहना, जो आपके फेफड़ों को सीधा प्रभावित करते हैं।
सीओपीडी में फेफड़ों की क्षमता एवं फेफड़ों का कार्य प्रभावित होता है। इसका निदान फेफड़ों के फंक्शन टेस्ट द्वारा होता है। फेफड़ों के फंक्शन टेस्ट का सबसे आम तरीका स्पाईरोमीट्री है।
सीओपीडी को क्राॅनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (Chronic obstructive pulmonary disease) कहते हैं, जो अस्थमा से कहीं ज्यादा गंभीर बीमारी है। सीओपीडी दुनियाभर में बड़ी ही तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है, इसलिए सीओपीडी के कारण और लक्षणों के बारे में जानना बहुत जरूरी है।
हर साल 20 नवंबर को World COPD Day मनाया जाता है. दिल्ली जैसे शहर में बढ़ते प्रदूषण नें COPD का खतरा बढ़ा दिया है. सीओपीडी का खतरा उन शहरों में ज्यादा होता है जहां वायु प्रदूषण खतरे से ऊपर हैं. सर्दी-खांसी और जुकाम की बीमारी कब COPD में बदल जाये कहा नहीं जा सकता है.
20 नवंबर को ''वर्ल्ड सीओपीडी डे'' (World COPD Day 2019) सेलिब्रेट किया जाता है। इस बार ''सीओपीडी डे'' का थीम है, ''ऑल टुगेदर टू एंड सीओपीडी'' (All Together to End COPD)। सीओपीडी को आप योग के जरिए भी कम कर सकते हैं।
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