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ब्‍लैक फंगस से बचना है तो अपना ब्लड शुगर करें कंट्रोल, एक्सपर्ट ने कहा- डायबिटीज है म्‍युकरमाइकोसिस का सबसे बड़ा जोखिम कारक

यदि ब्‍लड शुगर पर सही ढंग से नियंत्रण नहीं रखा जाता है तो ऐसे लोगों में ब्‍लैक फंगस का जोखिम काफी बढ़ जाता है।

Written By Atul Modi
Published : July 30, 2021 5:12 PM IST

कोविड-19 के मामलों में लगातार बढ़ोतरी जारी है। ऐसे में, कोविड-19 से ठीक हो चुके रोगियों के सामने म्‍युक‍रमाइकोसिस का गंभीर खतरा है। म्‍युकरमाइकोसिस को आमतौर पर ब्‍लैक फंगस के नाम से जाना जाता है। देखने में आया है कि इसने खराब इम्‍युन सिस्‍टम वाले या फिर डैमेज्‍ड टिश्‍यू वाले लोगों को अपना निशाना बनाया है। कोविड महामारी के आने से पहले भी, अन्‍य देशों की तुलना में भारत में म्‍युकरमाइकोसिस के मामले 70 गुना ज्‍यादा थे। लेकिन महामारी के दौरान तो यह आंकड़ा कई गुना बढ़ गया।

पोस्‍ट-कोविड मामलों में म्‍युकरमाइकोसिस की बढ़ती घटनाओं के पीछे कुछ सबसे आम जोखिम कारक मौजूद हैं। जैसे कि डायबिटीज (पुराना या नया) जैसे विभिन्‍न घटकों के कारण होने वाला हाइपरग्‍लाइसेमिया या स्‍टेरॉयड के कारण होने वाला हाइपरग्‍लाइसेमिया। कोविड के रोगियों में खराब इम्‍युनिटी और स्‍टेरॉयड्स के बेतहाशा इस्‍तेमाल ने भी म्‍युकरमाइकोसिस के मामलों में अचानक हुई बढ़ोतरी में योगदान दिया है। वहीं, मेकैनिकल वेंटिलैटर्स के साथ या बिना, लंबे समय तक अस्‍पताल में भर्ती रहना भी एक प्रमुख कारक हो सकता है।

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डायबिटीज है म्‍युकरमाइकोसिस का सबसे बड़ा जोखिम कारक

हाल ही में एक अध्‍ययन हुआ है, जिसका शीर्षक था कोविड-19 में म्‍युकरमाइकोसिस: पूरी दुनिया और भारत में हुए मामलों की एक व्‍यवस्थित समीक्षा’। इस अध्‍ययन के अनुसार, डायबिटीज मेलिटस, कोविड के रोगियों में म्‍युकरमाइकोसिस के विकसित होने के जोखिम का अकेला सबसे महत्‍वपूर्ण कारक है। इसलिये डायबिटीज पर नियंत्रण रखना बहुत महत्‍वपूर्ण है।

डॉ. रबिंदर नाथ मेहरोत्रा के अनुसार, ठीक तरीके से काबू नहीं किया गया डायबिटीज, लोगों में कुछ प्रकार के फंगल इंफेक्‍शंस का जोखिम बढ़ा देता है। यह समस्‍या इस तथ्‍य से जुड़ी है कि डायबिटीज के अधिकांश मामलों का पता स्‍वास्‍थ्‍य की अन्‍य समस्‍याओं की जांच में चलता है। और इसलिये यह इलाज से बच जाता है।

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डायबिटीज को नियंत्रित कैसे करें

डॉ. मेहरोत्रा के अनुसार, डायबिटीज को नियंत्रित करने का सबसे अच्‍छा तरीका है इंसुलिन। इंसुलिन ब्‍लड ग्‍लूकोज लेवल को संतुलित रखने में सहायक होता है। अगर खून में ग्‍लूकोज बहुत ज्‍यादा हो, तो इंसुलिन ग्‍लूकोज को लिवर में रखने में शरीर की सहायता करता है। लिवर से यह स्‍टोर किया गया ग्‍लूकोज तभी निकलता है, जब ब्‍लड ग्‍लूकोज लेवल कम होता है।

इंसुलिन टाइप 1 और टाइप 2, दोनों तरह के डायबिटीज के इलाज में मददगार है। इंजेक्‍शन से दिया जाने वाला इंसुलिन शरीर के इंसुलिन के विकल्‍प के रूप में काम करता है। टाइप 1 डायबिटीज के रोगियों के शरीर को इंसुलिन बनाने में कठिनाई होती है। इसलिये वे ब्‍लड ग्‍लूकोज लेवल को कंट्रोल करने के लिये इंसुलिन पर निर्भर रहते हैं। क्‍लोजर इंसुलिन थेरैपी को शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रिया मिलती है और यह ब्‍लड ग्‍लूकोज लेवल्‍स को संतुलित रखने के लिये बेहतर है।

टाइप 2 डायबिटीज के रोगी ओरल दवाइयों और लाइफस्‍टाइल में बदलाव करके अपने ब्‍लड ग्‍लूकोज लेवल को मैनेज कर सकते हैं। हालांकि, अगर इलाज से काम नहीं चले, तो इसके रोगियों को अपना ब्‍लड ग्‍लूकोज लेवल कंट्रोल करने के लिये इंसुलिन पर निर्भर रहना होगा। इंसुलिन से होने वाला इलाज महत्‍वपूर्ण ढंग से विकसित हुआ है। और हर प्रगति के साथ, हम इंसुलिन की प्राकृतिक प्रतिक्रिया पाने के करीब आए हैं। सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि इन एडवांसमेंट ने टाइप 1 डायबीटीज के रोगियों को कुछ ऐसी असुविधाओं से उभरने में मदद दी है, जो इस रोग के इलाज से और इसके साथ रहने पर आती हैं।

कोविड-19 के कुछ ऐसे रोगियों को ब्‍लैक फंगस हो सकता है, जिनके ब्‍लड ग्‍लूकोज लेवल्‍स अनियंत्रित और काफी बढ़ा हुआ है। विश्‍व में कोविड-19 से जुड़े म्‍युकरमाइकोसिस (ब्‍लैक फंगस) की समीक्षा करने वाला एक शोध-पत्र हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस शोध-पत्र के अनुसार, कोविड-19 से ठीक हो चुके रोगियों में से 94% ऐसे थे, जिन्‍हें ब्‍लैक फंगस था, और वे डायबीटीज के रोगी भी थे। उच्‍च स्‍तर की चिकित्‍सकीय शंका पर जल्‍दी से रोग का पता लगाने और कल्‍चर से पुष्टि करने के बाद सर्जिकल डिब्रीडमेंट (क्षतशोधन), रोगियों के लिये उपचार के सर्वश्रेष्‍ठ परिणाम देता है।

खराब इम्‍युन सिस्‍टम और डायबिटीज से पीड़ित रोगी विशेष रूप से ब्‍लैक फंगस को लेकर संवेदनशील होते हैं। उच्‍च जोखिम वाले ऐसे लोगों के शुगर लेवल्‍स को काबू में रखना सबसे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है। इसके अलावा, कोविड-19 से ठीक होने के बाद अच्‍छी इम्‍युनिटी बनाये रखना भी बहुत जरूरी है क्‍योंकि इम्‍युनिटी कम होने से ऐसे फंगल और अन्‍य इंफेक्‍शंस होने का जोखिम बढ़ सकता है।

इनपुट्स- डॉ. रबिंदर नाथ मेहरोत्रा, एंडोक्राइनोलॉजिस्‍ट, अपोलो हॉस्पिटल्‍स, जुबिली हिल्‍स, हैदराबाद

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