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कंजंक्टिवाइटिस से बचना है, तो करने होंगे ये काम

कंजंक्टिवाइटिस होने पर उबाली गई रुई से धीरे-धीरे अपनी आंखों को साफ करें।

गर्मी हो या बरसात, सबसे अधिक प्रभावित हमारी आंखें ही होती हैं। इससे पहले की बारिश का मौसम शुरू हो, आपको अपनी आंखों का ख्याल अभी से ही रखना होगा। जून से सितम्बर तक की गर्मी में काफी उमस एवं धूप कड़ी होती है। इन महीनों में दोहरा मौसम होता है यानी कभी बारिश, कभी उमस तो कभी गर्मी, जिसके कारण सबसे संवेदनशील अंग आंखें जल्दी बाहरी वातावरण के उतार-चढ़ाव से प्रभावित होती हैं। इन महीनों के बीच सबसे ज्यादा लोग आंखों की समस्या कंजंक्टिवाइटिस यानी आई फ्लू से परेशान रहते हैं। कंजंक्टिवाइटिस में लापरवाही बरतने से आंखों की कॉर्निया क्षतिग्रस्त हो सकती है। इससे आप अंधेपन का शिकार हो सकते है। आई फ्लू में आंखें लाल हो जाती हैं। पढ़ने में समस्या होती है।

कैसे होता है आई फ्लू?

नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइट के निदेशक डॉ. महिपाल सचदेव का कहना है कि आई फ्लू आंख के बाहरी पर्दे यानी आंखों में सफेद दिखने वाले भाग पर चढ़ी झिल्ली जिसे कंजंक्टिवा कहते हैं, पर वायरस का संक्रमण होता है। इसमें कंजंक्टिवा प्रभावित होती है, इसलिए इस रोग को चिकित्सकीय भाषा में कंजंक्टिवाइटिस कहते हैं। लोगों में यह समस्या आमतौर पर 35 फीसदी वायरस, 65 फीसदी बैक्टीरिया एवं अन्य कारण से होते हैं, लेकिन वायरस के कारण यह तीव्र रूप से फैलता है।

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डॉ. सचदेव कहते हैं कि आई फ्लू का वायरस गंदी उंगुलियों, धूल-कण, तालाबों एवं गड्ढों में भरे गंदे पानी में नहाने एवं मक्खियों के जरिए फैलता है। दूषित पानी पीने से इस रोग के संक्रमण के फैलने में सहायक होता है। आई फ्लू संक्रमित व्यक्ति के कपड़ों को इस्तेमाल करने, उत्सर्जित हवा (Emitted air), पीड़ित व्यक्ति को छूने आदि के कारण भी होता है। यह इतना तीव्र संक्रामक रोग है कि मात्र रोगी व्यक्ति की आंखों की ओर देखने से यह रोग देखने वाले की आंखों में हो सकता है। इसके जीवाणु (वायरस) हवा के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति की आंखों में पहुंचते हैं। ऐसे में एक ही परिवार के दूसरे सदस्यों को भी यह हो सकता है।

कैसे पहचानें कि यह आई फ्लू ही है

जब आंखों में किर-किराहट और जलन हो, तो समझें कि आपको आई फ्लू हो सकता है। आंखों को धूप तथा तेज रोशनी चुभती है। इसे फोटो फोबिया कहते हैं। इससे आंखों को पूरी तरह खोलने में परेशानी होती है। आंखों में थकान तथा दर्द भी महसूस होता है। कभी-कभी आंखों की पुतलियों पर दाने हो जाते हैं। उपयुक्त उपचार न होने की स्थिति में दूसरे बैक्टीरिया भी आंखों को प्रभावित कर देते हैं, जिससे सफेद गाढ़ा पदार्थ आंखों के कोने तथा पलकों के किनारों पर एकत्र हो जाता है।

conjunctivitis and eye care

इलाज और रोकथाम

आंखें लाल नजर आएं या जलन हों, तो तुरंत ही नेत्र रोग विशेषज्ञ की राय लें। बिना डॉक्टरी सलाह लिए कोई दवा न लें। आंखों का तेज रोशनी से बचाएं। गहरे रंग के शीशे वाले धूप का चश्मा पहनें। कभी भी आंखों पर पट्टी बांधकर बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे आंखों से निकलने वाले पानी की स्वतंत्र निकासी रुक जाती है। पट्टी बांधने से हुई गर्मी आंखों में इन्फेक्शन को और बढ़ावा देती है। इस रोग की चिकित्सा केवल दो बातों पर निर्भर करती है, पहली किसी उचित विसंक्रामक द्रव से आंखों की बार-बार सफाई एवं दूसरी आंखों में सेकेंडरी इन्फेक्शन को रोकने के लिए एंटीबायोटिक का प्रयोग।

रुई से करें साफ-सफाई

कंजंक्टिवाइटिस होने पर आंखों की सफाई करने के लिए पानी में साफ रुई डालें और उसे उबालकर इतना ठंडा करें कि वह सिर्फ हल्का गुनगुना या सामान्य तापक्रम (Temperature) का हो जाए। अब उसमें थोड़ा सा बोरिक पाउर घोलकर उस पानी और उबाली गई रुई से धीरे-धीरे अपनी आंखों को साफ करें। जब आंखों की कीचड़ से पलकें चिपक जाएं, तो आंखों की सूखी कीचड़ को साफ करने के लिए इसी विधि का उपयोग करें। तब पानी गुनगुना होना चाहिए। बोरिक पाउडर न हो, तो ठंडे किए गए पानी में बहुत थोड़ी सी मात्रा में खाने वाला सादा नमक या फिटकरी डालकर आंखों को धोने से फायदा होता है। आप आंखों की साफ-सफाई के लिए गुलाब जल का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

चित्रस्रोत: Shutterstock.

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