
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Medically Verified By: Dr. Anukalp Prakash
हेपेटाइटिस से जुड़े मिथक
कई ऐसी बीमारियां हैं जिनके बारे में या तो लोगों को पता नहीं होता है, या फिर वे कुछ गलतफहमियों को दिमाग में बैठा लेते हैं और डॉक्टर के पास जाने से डरते हैं। हेपेटाइटिस उन्हीं में से एक बीमारी है। हेपेटाइटिस का नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में सबसे पहले यही आता है कि "यह तो शराबियों की बीमारी है" या "इससे तो दूर ही रहना चाहिए, छूने से फैल जाएगी।" लेकिन ऐसा नहीं है।
सीके बिड़ला, गुरुग्राम के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉक्टर अनुकल्प प्रकाश का कहना है कि “सच कहूं तो, इनमें से कोई बात सही नहीं है। और यही अधूरी, गलत जानकारी असली मुश्किल की जड़ है।” सही क्या है और क्या नहीं, इसके लिए हमने डॉक्टर से हेपेटाइटिस से जुड़ी आम गलतफहमियों के बारे में पूछा जो लोगों को खतरे में डाल सकती हैं। आइए जानते हैं डॉक्टर ने क्या जवाब दिया।
डॉक्टर कहते हैं कि पहला मिथक है- शराब वाला मिथक। हेपेटाइटिस पांच तरह का होता है, ए से लेकर ई तक, और इनमें ज्यादातर वायरस की वजह से होते हैं। दूषित पानी पी लेना, अस्पताल में लापरवाही से लगी सुई, संक्रमित खून चढ़ना, असुरक्षित यौन संबंध। ये सब भी उतने ही बड़े कारण हैं जितनी शराब, बल्कि कई मामलों में तो शराब का इससे कोई लेना-देना ही नहीं होता।
डॉक्टर कहते हैं, "एक और मिथक यह है कि छूने या साथ बैठकर खाना खाने से बीमारी फैल जाएगी- यह भी बेबुनियाद है। हेपेटाइटिस बी और सी हाथ मिलाने या गले लगने से नहीं फैलते। इनके फैलने की असली वजहें हैं संक्रमित खून, गंदी सुइयां, या डिलीवरी के दौरान मां से बच्चे तक संक्रमण पहुंचना। हां, हेपेटाइटिस ए और ई की कहानी थोड़ी अलग है - ये गंदे पानी और खाने से फैलते हैं, इसलिए सफाई का ख्याल रखना यहां जरूरी हो जाता है।”
एक और बात जो अक्सर डॉक्टरों को अक्सर सुनने को मिलती है वह यह कि "जब तक लक्षण न दिखें, जांच की क्या जरूरत?" यहीं सबसे बड़ी गलती हो जाती है। हेपेटाइटिस बी और सी को डॉक्टर यूं ही "साइलेंट किलर" नहीं कहते। शुरुआती सालों में शरीर कोई संकेत ही नहीं देता, और जब तक पता चलता है, लिवर पहले से काफी कुछ झेल चुका होता है। जो लोग जोखिम में हैं, उनके लिए बिना लक्षण का इंतजार किए जांच कराना ही समझदारी है।
डॉक्टर अनुकल्प कहते हैं कि "एक बार हो गया तो अब कुछ नहीं हो सकता" - यह सोच भी पुरानी और गलत है। हेपेटाइटिस ए और ई तो अपने आप ठीक हो जाते हैं। बी को दवाओं से काबू में रखा जा सकता है। और हेपेटाइटिस सी का तो पूरा इलाज उपलब्ध है। समय पर सही डॉक्टर से इलाज शुरू हो जाए तो मरीज बिल्कुल सामान्य जीवन जी सकते हैं।”
एक और गलतफहमी यह है कि टीका सिर्फ बच्चों के लिए होता है। असल में, स्वास्थ्यकर्मियों, बार-बार खून चढ़वाने वाले मरीजों और जिन परिवारों में पहले कोई मामला रहा हो, उनके लिए भी हेपेटाइटिस बी का टीका उतना ही जरूरी है, चाहे उम्र कुछ भी हो। बात सीधी-सी है कि जानकारी सही हो तो आधी लड़ाई वहीं जीत ली जाती है।
ये गलतफहमियां दूर करना, समय पर जांच कराना और टीका लगवाना, बस इतना ही काफी है इस बीमारी को मात देने के लिए। और यह जागरूकता फैलाने की जिम्मेदारी किसी एक की नहीं, हम सबकी है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सिर्फ सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी विशेषज्ञ की राय पर आधारित है और इसे चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। अगर आपको हेपेटाइटिस से जुड़े कोई लक्षण हैं, संक्रमण का जोखिम है या आप जांच एवं टीकाकरण के बारे में जानना चाहते हैं, तो स्वयं इलाज करने या किसी भी तरह की गलतफहमी पर भरोसा करने के बजाय गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या योग्य डॉक्टर से परामर्श लें।