hamburger icon
A
Read in English

पराग के मौसम में जन्‍मे बच्‍चों में बढ़ जाता है अस्‍थमा का जोखिम

एक अध्ययन के मुताबिक घास पराग के मौसम में पैदा हुए शिशुओं को अस्थमा जैसी श्वसन रोगों के जोखिम की संभावना अधिक होती है।

WrittenBy

Written By: Yogita Yadav | Updated : September 17, 2018 10:47 AM IST

अस्‍थमा पर लगातार हो रही रिसर्च ने एक नया खुलासा किया है , कि जो बच्‍चे प्रकृति में पराग के निषेचन के समय जन्‍मतेे हैं उनमें अस्‍थमा जैसी श्‍वसन संबंधी एलर्जी की संभावना अधिक होती है।  एक अध्ययन के मुताबिक घास पराग के मौसम में पैदा हुए शिशुओं को अस्थमा जैसी श्वसन रोगों के विकास के जोखिम में अधिक जोखिम होता है।

येे है कारण 

यूरोप और ऑस्ट्रेलिया दोनों में किए गए अध्ययन से पता चला है कि जब प्रकृति में पराग कणों के निशेचन का समय होता है, तो उस वक्‍त अस्‍थमा जैसे रोगों के संक्रमण का खतरा कही अधिक बढ़ जाता है। इन देशों में मई मध्‍य से जुलाई अंत तक का मौसम पोलन सीजन यानी फूलों पर पराग आने का समय होता है। इस मौसम में रक्‍त में एंटीबॉडीज का स्‍तर बढ़ जाता है।

इन्‍हें इम्यूनोग्लोबुलिन ई (आईजीई) के कहा जाता है,जो शरीर को बैक्टीरिया, वायरस और एलर्जेंस से बचाने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा उत्पादित होते हैं और एलर्जी रोगों के विकास की भविष्यवाणी करने के लिए उपयोग किए जाने वाले मार्कर होते हैं।

क्‍या कहता है शोध 

मेलबर्न में ला ट्रोब यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ साइकोलॉजी एंड पब्लिक हेल्थ के एसोसिएट प्रोफेसर बर्कन एर्बास ने कहा कि अध्ययन का उद्देश्य गर्भावस्था के दौरान पोलन सीजन के इफैक्‍ट का आकलन करना था। वे आगे कहती हैं, "हम जानते हैं कि जन्म के पहले कुछ महीनों के दौरान आउटडोर पराग एक्सपोजर एलर्जी श्वसन रोगों का कारण बन सकता है और हमें संदेह है कि गर्भावस्था के आखिरी महीनों में एक्सपोजर भी महत्वपूर्ण हो सकता है।"

"कई अध्ययनों से पता चला है कि कॉर्ड रक्त में आईजीई के उच्च स्तर वाले बच्‍चों में बाद में एलर्जी विकसित होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। पर गर्भाशय में पराग के संपर्क में इन स्तरों को कैसे प्रभावित किया जाता है, इस बारे में अभी बहुत ज्‍यादा लोगों को पता नहीं था।"

अध्ययन ने इंट्रायूटरिन अवधि के दौरान घास पराग के बाहरी स्तर का मूल्यांकन किया और ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और डेनमार्क में पीक पराग सीजन के दौरान जन्‍मे बच्‍चों के समूहों को शामिल किया।

अंतरराष्ट्रीय टीम ने तीन देशों में 2,597 बच्चों से एकत्रित कॉर्ड रक्त का विश्लेषण किया।

उन्होंने पाया कि पराग के मौसम में पैदा हुए बच्‍चों में की नाड़ी के रक्त में उच्च स्‍तर का इम्यूनोग्लोबुलिन ई (आईजीई) था – यह भविष्य में होने वाले श्‍वसन संबंधी रोगों के होने के संकेत हैं।

यह भी पढ़ें - सेहत के लिए खतरनाक है ‘ले‍डी लाइक सिटिंग

बढ़़ जाती है संभावना 

यूरोप के पोलन सीजन में मेलबोर्न में अक्टूबर और दिसंबर में पैदा हुए बच्चों के बीच उच्च आईजीई स्तर पाए गए, जबकि अप्रैल के आसपास पैदा हुए जर्मन और डेनिश शिशुओं के लिए स्तर सबसे अधिक थे।

यह भी पढ़ें - दिल रखना है दुरुस्‍त, तो कान को रखें साफ

हालांकि,  इसके कुछ और भी प्रभाव हो सकते हैं। जिन पर अभी और अध्‍ययन करने की आवश्‍यकता है। पर यह तय है कि इस मौसम में जन्‍मे बच्‍चों में श्‍वसन संबंधी एलर्जी की सर्वाधिक संभावना है।

यह भी पढ़ें – अगर करते हैं बच्चों से प्यार, तो छोड़ दें ये बुरी आदतें

वे आगे कहती हैं: "अध्ययन एक नई अंतर्दृष्टि प्रदान करता है जो हमें अस्थमा जैसी बीमारियों की भविष्यवाणी और प्रबंधन में मदद कर सकता है। अभी तक यह स्‍वास्‍थ्‍य का एक बड़ा जोखिम माना जाता रहा है।

Read it in EnglishDid you know? Maternal exposure to pollen ups risk of asthma in babies