
आशु कुमार दास
आशु कुमार दास एक अनुभवी हेल्थ कंटेंट स्पेशलिस्ट हैं। इन्हें हेल्थ कंटेंट राइटर के तौर पर काम करते हुए 6 ... Read More
Written By: Ashu Kumar Das | Updated : April 25, 2026 11:28 AM IST
Medically Verified By: Dr. Sumit Aggarwal
मलेरिया वैक्सीन को लेकर भारत के सामने कई चुनौतियां हैं।
मलेरिया आज भी भारत के लिए एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बना हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मलेरिया मुख्य रूप से Plasmodium के कारण होने वाली बीमारी है, जो संक्रमित मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से फैलती है। मलेरिया के लक्षणों पर गौर करके इसका इलाज समय पर न किया जाए, तो यह गंभीर मामलों में जानलेवा भी हो सकती है। हमारे देश में जब बात आती है मलेरिया की, तो कई बार यह सवाल उठता है कि इससे राहत दिलाने वाली वैक्सीन भारत में कब मौजूद होगी? दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में वैक्सीन के क्षेत्र में बड़ी उन्नति देखने को मिली है। कोरोना जैसी महामारी से सुरक्षा दिलाने वाली वैक्सीन भी बाजार में आज उपलब्ध है।
लेकिन जब बात मलेरिया की वैक्सीन की आती है, तो आज भी भारत के सामने कई सवाल हैं। वैश्विक स्तर पर RTS,S malaria vaccine (Mosquirix) और R21 malaria vaccine के आने से उम्मीद जगी है कि इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। हालांकि, भारत जैसे विविध और विशाल देश में मलेरिया वैक्सीन को बड़े पैमाने पर लॉन्च करना आसान नहीं है। आज वैश्विक स्तर पर वर्ल्ड मलेरिया डे मनाया जा रहा है तब हम डॉ. सुमित अग्रवाल से जानेंगे भारत में मलेरिया वैक्सीन को लॉन्च करने के लिए कौन- कौन सी चुनौतियां है।
World Health Organization (WHO) के डेटा के अनुसार, वर्तमान में मलेरिया वैक्सीन का सबसे ज्यादा इस्तेमाल अफ्रीका के देशों में हो रहा है, क्योंकि वहां Falciparum मलेरिया बहुत ज्यादा पाया जाता है। इसके अलावा कई देशों में अभी मलेरिया वैक्सीन को लेकर कई प्रकार की रिसर्च की जा रही है। मलेरिया जैसी बीमारी से बचाव के लिए RTS,S/AS01 (Mosquirix) और R21/Matrix-M को मंजूरी दी गई है।
मलेरिया एक गंभीर बीमारी है।
भारत में मलेरिया की बात करें, तो पिछले कुछ सालों में इस बीमारी के मामलों में कमी बेशक से आई है, लेकिन देश में यह बीमारी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। गर्मी और बारिश के दिनों में आज भी तेजी से मलेरिया के मामले बढ़ते हैं। खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में मलेरिया के मरीजों की संख्या ज्यादा दर्ज की जाती है। ऐसे में भारत में मलेरिया के खिलाफ वैक्सीन को एक लॉन्ग-टर्म प्रिवेंशन टूल माना जा रहा है, लेकिन इसे लागू करने से पहले कई पहलुओं पर गौर व काम करने की जरूरत है।
1. वैक्सीन और स्ट्रेन का फर्क- डॉ. सुमित अग्रवाल बताते हैं कि अभी तक जो मलेरिया वैक्सीन उपलब्ध हैं, वे मुख्य रूप से Falciparum स्ट्रेन के खिलाफ बनाई गई हैं। लेकिन भारत में मलेरिया के ज्यादातर मामलों में Vivax स्ट्रेन पाया जाता है। ऐसे में यह चिंता रहती है कि वैक्सीन हमारे देश में उतनी प्रभावी नहीं होगी, जितनी उम्मीद की जाती है। यानी, बड़े स्तर पर इसे लगाने के बाद भी इसका फायदा सीमित रह सकता है।
2. भौगोलिक चुनौतियां- भारत में मलेरिया का असर ज्यादातर ग्रामीण, जंगल और दूरदराज इलाकों में ज्यादा होता है। इन क्षेत्रों तक वैक्सीन पहुंचाना, उसे सही तापमान (कोल्ड चेन) में सुरक्षित रखना और समय पर लोगों को लगाना काफी मुश्किल काम है। इसके अलावा, मलेरिया वैक्सीन की 4 डोज का कोर्स पूरा करवाना भी एक बड़ी चुनौती है।
3. सीमित प्रभावशीलता- मलेरिया की मौजूदा वैक्सीन 100% सुरक्षा नहीं देती है। कुछ वैक्सीन लगभग 30 से 40% तक असरदार हैं, जबकि कुछ 60 से 70% तक सुरक्षा देती हैं। इसका मतलब है कि वैक्सीन लेने के बाद भी पूरी तरह से मलेरिया से बचाव की गारंटी नहीं होती है। इसलिए सीमित प्रभावशीलता भी मलेरिया वैक्सीन की राह में बड़ी चुनौती बन सकता है।
4. लोगों में जागरूकता और भ्रांतियां- मलेरिया वैक्सीन को लेकर हमारे साथ की गई खास बातचीत में डॉ. सुमित अग्रवाल बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में वैक्सीन को लेकर कई तरह की गलतफहमियां (misconceptions) होती हैं। लोग कई बार डर या गलत जानकारी के कारण वैक्सीन लगवाने से बचते हैं। इसके अलावा, चार डोज होने के कारण कई लोग बीच में ही वैक्सीनेशन छोड़ देते हैं, जिससे इसका पूरा फायदा नहीं मिलना काफी मुश्किल हो सकता है।
5. रिसर्च और डेटा की कमी- भारत में मलेरिया वैक्सीन पर अभी सीमित डेटा उपलब्ध है। इसलिए भारत में वैक्सीन को लॉन्च करने से पहले अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभाव का अध्ययन, लॉन्ग-टर्म सेफ्टी डेटा पर काम करना बहुत जरूरी है। बिना पर्याप्त डेटा के बड़े स्तर पर लॉन्च करना लोगों के स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
डॉ. सुमित अग्रवाल का कहना है कि मलेरिया वैक्सीन भारत के लिए एक बड़ी उम्मीद है, लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं है। सीमित प्रभावशीलता, लॉजिस्टिक्स और जागरूकता की कमी जैसी चुनौतियों का समाधान बहुत जरूरी है।
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