
... Read More
Written By: Anshumala | Updated : August 16, 2020 12:56 AM IST
Back pain can not only affects your work but also peace of mind.
Spinal Stenosis: पीठ का निचला हिस्सा यानी कि लंबर स्पाइन 5 बड़ी हड्डियों से मिलकर बनती है। इन हड्डियों के बीच डिस्क के नाम से जाने वाली मुलायम गद्दियां मौजूद होती हैं। हर हड्डी में एक छेद होता है, जो हड्डियों को एक पाइप यानी कि नलिका का रूप देता है। हड्डियों के बीच का यह छेद रीढ़ की नसों के लिए रास्ते का काम करता है। जब यह छेद पतला होने लगता है, तो इसे लंबर केनल स्टेनोसिस (lumbar canal stenosis) कहते हैं। परिणामस्वरूप, पीठ के निचले हिस्से से पैरों तक जाने वाली नसों पर दबाव पड़ता है।
डॉ. एस के राजन, हेड, स्पाइन सर्जरी, अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज, आर्टमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम का कहना है कि स्पाइनल स्टेनोसिस (spinal stenosis) की समस्या युवा आबादी को जन्म संबंधी कारणों से प्रभावित करती है, लेकिन विशेषकर 50 या उससे अधिक उम्र के लोगों को यह समस्या ज्यादा होती है। बढ़ती उम्र के साथ डिस्क का गुदगुदापन कम होता जाता है, जिसके कारण डिस्क छोटी और सख्त होने लगती है। वर्तमान में, अनुमानित तौर पर 60 वर्ष से अधिक उम्र के लगभग 4 लाख भारतीय लंबर स्पाइनल स्टेनोसिस के लक्षणों से ग्रस्त हैं और लगभग 12-15 लाख भारतीय स्पाइनल स्टेनोसिस की किसी न किसी प्रकार की समस्या से ग्रस्त हैं।
लंबर स्पाइनल स्टेनोसिस के लक्षण स्थिति की गंभीरता पर निर्भर करते हैं। हालांकि, इसके लक्षण अपने आप नहीं बल्कि नसों पर पड़े दबाव की वजह से आई सूजन के कारण नजर आते हैं। इसके लक्षण हर व्यक्ति में भिन्न हो सकते हैं-
· पैर, नितंबो और पिंडली में दर्द, कमजोरी या सुन्नपन होना।
· दर्द एक या दोनों पैरों में हो सकता है (इस समस्या को साइटिका कहते हैं)
· कुछ मामलों में इसमें पैर काम करना बंद कर देते हैं और मरीज के मल स्त्राव पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता है।
· चलते समय भयानक दर्द जो पैर मोड़ने पर, बैठने पर या लेटने पर बढ़ जाता है।
लंबर स्पाइनल स्टेनोसिस से संबंधित दो और स्थितियां हैं, जिन्हें डिजेनरेटिव स्पॉन्डिलोलिस्थीसिस और डिजेनरेटिव स्कोलियोसिस के नाम से जाना जाता है। डिजेनरेटिव स्पॉन्डिलोलिस्थीसिस रीढ़ की हड्डियों के जोड़ों में अर्थराइटिस के कारण होता है। इसका इलाज भी लंबर स्पाइनल स्टेनोसिस की तरह पुराने या सर्जिकल विकल्प के साथ किया जाता है।
इस बीमारी की पुष्टि के लिए मेडिकल हिस्ट्री, लक्षणों और अनुवांशिक जोखिम के आधार पर फिजिकल एग्जामिनेशन और लैब टेस्ट की आवश्यकता पड़ती है। एक्स-रे, सीटी स्कैन और एमआरआई आदि रेडियोलॉजी टेस्ट जोड़ों की रूपरेखा की पहचान करने में सहायक हैं। इन इमेजिंग तकनीकों की मदद से सर्जन को स्पाइनल केनल की पूरी रूपरेखा को अच्छे से देखने में सहायता मिलती है।
एमआरआई के जरिए निकलने वाली 3डी इमेजिंग नसों की जड़ों, आस-पास के स्थानों, कोई सूजन, डिजेनरेशन या ट्यूमर आदि का विशलेषण करने में भी सहायक है। कुछ मामलों में मायलोग्राम की आवश्यकता पड़ सकती है, जो रीढ़ के लिए एक खास प्रकार का एक्स-रे होता है। यह एक्स-रे आसपास के सेरीब्रोस्पाइनल फ्लुइड (सीएसएफ) में कॉन्ट्रास्ट सामग्री इंजेक्ट करने के बाद किया जाता है। यह रीढ़ की हड्डी या संबंधित नसों में दबाव, स्लिप्ड डिस्क, हड्डी में रगड़ या ट्यूमर की निगरानी करने में सहायक होता है।
इस बीमारी के इलाज के लिए सबसे पहला विकल्प मेडिकेशन और फिजिकल थेरेपी होता है। यदि इसके बाद भी मरीज में कोई सुधार नहीं नज़र आता है तो सर्जरी करना आवश्यक हो जाता है।
शुरुआती चरणों में दर्द को कम करने के लिए एंटी इंफ्लेमेटरी मेडिकेशन और दर्दनाशक दवाएं सहायक साबित होते हैं। लेकिन यदि समय के साथ दर्द ठीक नहीं हो रहा है या गंभीर होता जा रहा है तो डॉक्टर मरीज को अन्य मेडिकेशन या इंजेक्शन की सलाह दे सकता है। एपिड्यूरल इंजेक्शन भी दर्द और सूजन को कम करने में सहायक होते हैं लेकिन यह केवल कुछ ही समय के लिए प्रभावी होता है।
कुछ विशेष एक्सरसाइज के साथ फिजिकल थेरेपी आपकी रीढ़ को स्थिर करने के साथ उसे लचीला और मजबूत बनाने में मदद करती है। थेरेपी आपकी जीवनशैली और शारीरिक गतिविधियों को फिर से सामान्य करने में सहायक होती है।
इस बीमारी के इलाज के लिए कई प्रकार की सर्जिकल प्रक्रियाएं उपलब्ध हैं। इसका चयन मरीज की स्थिति की गंभीरता के आधार पर किया जाता है। बहुत ही कम मरीजों में, स्पाइन फ्यूजन की जरूरत पड़ सकती है और इसका फैसला आमतौर पर सर्जरी से पहले लिया जाता है। स्पाइनल फ्यूजन एक ऑपरेशन है, जो दो या अधिक कशेरुकाओं (Vertebrae) को पास लाता है। यह प्रक्रिया रीढ़ को स्थिर और मजबूत बनाने में सहायक होती है, इसलिए यह गंभीर या पुराने दर्द को भी ठीक कर सकती है।
लंबर स्पाइनल स्टेनोसिस और संबंधित समस्याओं के इलाज के लिए स्पाइनल फ्यूजन सहित कई अन्य प्रकार की सर्जरी भी शामिल हैं जैसे कि
एंटीरियर लंबर इंटरबॉडी फ्यूजन (एएलआईएफ): इसमें पेट के निचले हिस्से के जरिए डिजेनरेटिव डिस्क को बाहर निकाल दिया जाता है। हड्डियों वाली सामग्री या हड्डी से भरा मेटल का उपकरण डिस्क के पेस में स्थगित कर दिया जाता है।
फोरामिनोटॉमी: यह सर्जरी हड्डी के द्वार को बड़ा करने में सहायक होती है। यह सर्जरी लेमिनेक्टॉमी के बिना या साथ में की जा सकती है।
लेमिनोटॉमी: नसों की जड़ों के दबाव को कम करने के लिए लामिना में ओपनिंग बनाई जाती है।
लेप्रोस्कोपिक स्पाइनल फ्यूज़न: यह एक मिनिमली इनवेसिव प्रक्रिया है, जिसमें पेट के निचले हिस्से में एक छोटा कट लगाया जाता है। इस कट के जरिए डिस्क में ग्राफ्ट को स्थगित किया जाता है।
मेडियल फेसेक्टॉमी: इस प्रक्रिया के जरिए जगह को बढ़ाने के लिए फेसेट (रीढ़ के केनल में हड्डी वाली संरचना) को निकाल दिया जाता है।