
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Updated : February 4, 2026 1:09 PM IST
Medically Verified By: Dr. Uma Dangi
Cancer Se Jude Myth: कैंसर हमारे बॉडी सेल्स का एक समूह होता है तो बढ़ने लगता है और नॉर्मल सेल डिवीजन के प्रोसेस को बाधित करता है। यह सेल्स ट्यूमर या हिंदी में कहें तो गांठ बना सकती हैं और पूरे शरीर में फैल सकती हैं। कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका नाम सुनते ही लोग चौंक भी जाते हैं और घबरा भी जाते हैं। अगर किसी को कैंसर होने का पता चलें तो लोग मान लेते हैं कि इसमें डेथ होने के चांस ज्यादा हो जाते हैं। आज कैंसर का इलाज संभव है और कई लोगों ने कैंसर के तीसरे स्टेज में भी खुद को रिकवर किया है। लेकिन फिर भी ऐसा क्यों है कि लोगों के बीच अभी भी पूरी और सही जानकारी न होने के कारण वह इससे डरते हैं।
कई महिलाएं अपने ब्रेस्ट पेन या बम्बी फील होने पर भी स्क्रीनिंग टेस्ट नहीं करवाती हैं, क्योंकि उन्हें यह डर होता है कि 'अगर कैंसर टेस्ट पॉजिटिव आ गया तो क्या होगा!' वहीं पुरुषों में होने वाले प्रोस्टेट कैंसर के बारे में भी लोग सही तरीके से जागरूक नहीं हैं। यही कारण है कि हर साल 4 फरवरी को वर्ल्ड कैंसर डे माना जाता है ताकि पूरे विश्व भर में लोगों को कैंसर के प्रति जागरूक किया जा सके। इसलिए आज विश्व कैंसर दिवस के मौके पर हमने कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल की मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर उमा डांगी से बात की। हमने उनसे लोगों द्वारा और लोगों के मन में आने वाले ऐसे 10 मिथक पूछे जो आम जनता के बीच फैले हुए हैं।
जवाब- हां, अपनी प्रैक्टिस में हम लगभग हर दिन इस डर का सामना करते हैं। बहुत से लोगों के लिए कैंसर का नाम आज भी वही पुराना खौफ पैदा करता है जो दशकों पहले था। जब बचने की उम्मीद कम थी और इलाज के तरीके भी बहुत कम थे। लेकिन आज की सच्चाई काफी बदल चुकी है। स्क्रीनिंग और जांच की नई तकनीकों की वजह से अब कैंसर का इलाज मुमकिन है। अगर सही समय पर, शुरुआती चरण में पता चल जाए, तो कई तरह के कैंसर को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है या उन्हें किसी भी दूसरी लंबी बीमारी की तरह कंट्रोल में रखा जा सकता है।
नीचे ग्राफिक में ग्लोबल कैंसर स्टैटिक्स के कुछ आंकेड़ दिए गए हैं। दिए गए आंकड़ें AACR Cancer Progress Report और WHO Cancer Fact Sheet से लिए गए हैं।

हम रोजाना ऐसे मरीज देखते हैं जिन्हें शुरुआती चरण का ब्रेस्ट, सर्वाइकल, थायराइड या ब्लड कैंसर था और इलाज के बाद वे अब एक सामान्य और खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। इन बीमारियों में ठीक होने की संभावना 80-90% से भी ज्यादा है। दुर्भाग्य की बात है कि, जांच में देरी, "कैंसर" शब्द का खौफ और पुरानी सुनी-सुनाई बातें ही इस गलत धारणा को बढ़ावा देती हैं।
जवाब- आजकल यह डॉक्टरों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई है। हमारे पास अक्सर ऐसे मरीज आते हैं जिन्होंने सिर्फ इसलिए डॉक्टर को दिखाने में देरी कर दी क्योंकि उन्होंने सोशल मीडिया पर कुछ पढ़ा था या कोई मैसेज देखा था। कई लोग तो तभी अस्पताल पहुंचते हैं जब बीमारी बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि गलत जानकारी के डर से उन्होंने पहले जरूरी जांच या बायोप्सी नहीं करवाई होती।
खासकर भारत में, कैंसर का पता सही समय पर न चल पाने की एक बड़ी वजह वह बातें हैं जो मरीज या उनके परिवार ने इंटरनेट पर पढ़ी होती हैं या किसी रिश्तेदार से सुनी होती हैं। हम ऐसे मरीज भी देखते हैं जो इंटरनेट पर बताए गए बिना किसी ठोस आधार वाले "प्राकृतिक नुस्खों" के चक्कर में अपना सही इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं। अफसोस की बात यह है कि जब तक वे वापस डॉक्टर के पास आते हैं, तब तक बहुत कीमती समय हाथ से निकल चुका होता है।
जवाब- यह एक ऐसा सवाल है जो मरीज और उनके परिवार अक्सर हमसे पूछते हैं। अगर मेडिकल साइंस की बात करें, तो इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि तनाव या नकारात्मक सोच की वजह से सीधे तौर पर कैंसर होता है। कैंसर होने की असली वजह शरीर की कोशिकाओं में होने वाले जेनेटिक बदलाव हैं, जिन पर उम्र, तंबाकू, शराब, संक्रमण, प्रदूषण और हमारी जीवनशैली का असर पड़ता है।
हां, यह जरूर है कि बहुत ज्यादा तनाव आपकी नींद, रोग प्रतिरोधक क्षमता और सेहत को बिगाड़ सकता है। लेकिन एक डॉक्टर के तौर पर हमें सबसे ज्यादा दुख तब होता है, जब मरीज अपनी बीमारी के लिए खुद को ही जिम्मेदार ठहराने लगते हैं। इस बात का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, लेकिन इससे मरीज का मानसिक बोझ और दुख बेवजह बढ़ जाता है।
बच्चों में कैंसर के मामले से जुड़े आंकड़ें (ग्राफिक में देखें)। नीचे दिए गए आंकड़ें WHO Cancer in Children fact sheet, ACS data और AACR Cancer Progress Report 2025 से लिए गए हैं।

जवाब- लोगों का ऐसा सोचना स्वाभाविक है, लेकिन इस डर का कोई ठोस आधार नहीं है। मोबाइल फोन, वाई-फाई राउटर और माइक्रोवेव जैसी रोजाना इस्तेमाल होने वाली चीजों से जो किरणें ('नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन') निकलती हैं, वे इतनी शक्तिशाली नहीं होतीं कि हमारे डीएनए को नुकसान पहुंचा सकें या कैंसर पैदा करें। दुनिया भर में हुई बड़ी रिसर्च में इन चीज़ों के इस्तेमाल और कैंसर के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया है।
इसी तरह, डियोडरेंट, एंटीपेर्स्पिरेंट या खास तरह के कपड़ों (जैसे अंडरवायर ब्रा) से भी कैंसर होने का कोई सबूत नहीं मिला है। इसकी जगह हमें उन चीज़ों पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए जिनसे वाकई कैंसर का खतरा बढ़ता है, जैसे कि तंबाकू, शराब और बहुत ज़्यादा प्रदूषण।
बड़े दुख की बात है कि आज भी हमें ऐसे मरीज मिलते हैं जो खुद को अकेला महसूस करते हैं, क्योंकि उनके आसपास के लोग छुआछूत के डर से उनसे दूरी बना लेते हैं। कैंसर कोई संक्रामक बीमारी नहीं है। यह साथ खाना खाने, छूने या साथ रहने से बिल्कुल नहीं फैलता। फिर भी, इस गलत सोच की वजह से मरीज लोगों से अलग रहना शुरू कर देते हैं, बहुत दुखी रहते हैं और कई बार उन्हें भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है।
मेडिकल नजरिए से देखें, तो कैंसर के इलाज में अपनों का साथ और प्यार बहुत जरूरी होता है। जब गलत जानकारी की वजह से मरीज खुद को अकेला महसूस करता है, तो इसका बुरा असर न केवल उसकी मानसिक हालत पर पड़ता है, बल्कि उसकी सेहत पर भी पड़ता है।

क्लीनिक में मरीज हमसे अक्सर यह सवाल पूछते हैं। सच तो यह है कि हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं को, चाहे वो स्वस्थ हों या कैंसर वाली, काम करने के लिए ग्लूकोज (चीनी का एक रूप) की जरूरत होती है। ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है कि चीनी खाने से कैंसर सीधे तौर पर तेजी से फैलता है।

मरीजों को कई बार जो "कैंसर का फैलना" लगता है, वह असल में बीमारी का अपना बढ़ना होता है जो जांच कराने से पहले ही शरीर में हो चुका होता है। डर के कारण इन जांचों या ऑपरेशन में देरी करने से बीमारी और भी गंभीर हो जाती है, जिससे आगे चलकर उसे ठीक करना मुश्किल हो जाता है।
बहुत से मरीजों को लगता है कि अगर उनके परिवार में किसी को कैंसर रहा है, तो उन्हें भी यह होना तय है। लेकिन सच तो यह है कि केवल 5 से 10% कैंसर ही आनुवंशिक होते हैं, जो माता-पिता से मिले दोषपूर्ण जींस की वजह से होते हैं। ज्यादातर कैंसर गलत जीवनशैली, प्रदूषण, इन्फेक्शन और बढ़ती उम्र के कारण होते हैं।
इस बात को समझने से मरीजों को उन चीजों पर ध्यान देने में मदद मिलती है जिन्हें वे खुद बदल सकते हैं, जैसे तंबाकू और शराब से दूर रहना, वजन कंट्रोल में रखना और समय-समय पर जरूरी चेकअप करवाते रहना आदि। ये आदतें कैंसर के खतरे को बहुत कम कर देती हैं।
भारत में पुरुषों और महिलाओं, दोनों के कैंसर से जुड़े आंकड़ें बहुत ही हैरान करने वाले हैं। आप इन आंकड़ों को इस टेबल में देख सकेत हैं-
| नए और कुल कैंसर के अनुमान | 2024 के लिए भारत में अनुमानित नए कैंसर के मामले लगभग 1.56 मिलियन हैं। ट्रेंड्स बताते हैं कि मामलों में बढ़ोतरी हो रही है और 2045 तक ~2.46 मिलियन नए मामले होने का अनुमान है। |
| भारत में जानलेवा कैंसर के मुख्य प्रकार | पुरुष: मुंह का कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, पाचन तंत्र का कैंसर महिलाएं: स्तन कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, ओवेरियन कैंसर भारतीय महिलाओं में स्तन कैंसर कैंसर से होने वाली मौतों का मुख्य कारण है। |
| भारत में कैंसर से मरने वाले लोगों की संख्या | नवीनतम रजिस्ट्री विश्लेषण (Latest registry analysis estimates) के अनुसार 2024 में भारत में लगभग 874,404 कैंसर से मौतें हुईं। जिसमें पुरुष- 460,191 मौतें |
(यह आंकड़ें JAMA से लिए गए हैं।)
इंटरनेट पर कई ऐसे मिथ फैलते हैं जो कैंसर को चमत्कारी इलाज से ठीक करने का दावा करते हैं। इसे लेकर डॉक्टर कहते हैं कि हम डॉक्टर अक्सर ऐसे मरीज देखते हैं जो इंटरनेट पर प्रचारित किए जाने वाले बिना किसी प्रमाण के इलाजों के चक्कर में अपना कीमती समय बर्बाद कर देते हैं। इन तथाकथित ‘चमत्कारी इलाजों’ का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता और कई बार ये शरीर को नुकसान पहुंचा सकते हैं या आपके असली मेडिकल इलाज में रुकावट डाल सकते हैं।
माना कि योग या ध्यान जैसी चीजें मानसिक शांति और मन को मज़बूत बनाने में मदद कर सकती हैं और ये कैंसर के डॉक्टरी इलाज (जैसे कीमोथेरेपी या सर्जरी) का हिस्सा भी बन सकती हैं, लेकिन ये डॉक्टर द्वारा बताए गए कैंसर के इलाज की जगह नहीं ले सकतीं। इलाज के साथ अगर आप ऐसी कोई भी चीज अपनाना चाहते हैं, तो पहले ऑन्कोलॉजिस्ट से सलाह रूर लें।
मेडिकल साइंस के हिसाब से कैंसर से बचने के सबसे पक्के तरीके ये हैं: तंबाकू से पूरी तरह दूरी, शराब से परहे, वज़न कंट्रोल में रखना, रोजाना कसरत करना और पौष्टिक खाना खाना आदि। इसके अलावा, सही समय पर एचपीवी और हेपेटाइटिस-बी के टीके लगवाना और डॉक्टर से रूटीन चेकअप करवाते रहना बहुत जरूरी है।
लोगों को रोजमर्रा की चीजों को लेकर बेवजह डरने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय, उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वे अपनी आदतों को कैसे सुधारें और बीमारी का जल्दी पता लगाने के लिए टेस्ट कैसे करवाएं। यही चीजें असल में कैंसर से बचने में सबसे ज्यादा मददगार साबित होती हैं।
हम उम्मीद करते हैं कि आपके मन में आने वाले ज्यादातर सवालों के उत्तर आपको मिल गए होंगे। अगर आपका कोई और सवाल है तो आप हमसे कमेंट कर सकते हैं। हम आपके सवालों का जवाब देने की पूरी कोशिश करेंगे।