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क्या सोशल मीडिया पर होनेवाली गतिविधियां हमारी मानसिक सेहत पर असर कर रही हैं?

क्या आए दिन होनेवाली ऑनलाइन ट्रोलिंग बीमार मानसिकता का संकेत है?

आप क्या सोचते हैं और किस हद तक सोचते हैं यह बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप कैसे समाज में रहते हैं। हमारे आचार और विचार बहुत कुछ हमारे आस-पास हो रही चर्चा और घटना पर भी निर्भर करता है। वर्तमान समय में चल रही घटनाओं के मद्देनजर एक बात की ओर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है और वह है बीमार होती सामाजिक चर्चा जिसमें हम आसानी से देख सकते हैं कि सोच के स्तर पर लोग बीमार हो रहे हैं।

कठुआ की 8 साल की जिस बच्ची के साथ गैंगरेप हुआ और हत्या हुई, उसे इंसाफ मिले इसको लेकर तमाम राजनैतिक दल से लेकर बॉलीवुड सेलेब्स अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। शनिवार को बॉलीवुड एक्ट्रेस करीना कपूर खान की एक तस्वीर सामने आई, जिसमें एक्ट्रेस प्लेकार्ड पकड़े 8 साल की बच्ची के लिए न्याय की मांग कर रही हैं। तस्वीर को वायरल होने में ज़रा भी वक़्त नहीं लगा।

एक सोशल मीडिया यूज़र ने ट्वीट कर कहा, "उन्हें (करीना) शर्म आनी चाहिए कि एक हिंदू होते हुए उन्होंने एक मुसलमान से शादी की, जिससे उनका एक बच्चा है जिसका नाम खूंखार इस्लामिक कट्टरवादी के नाम पर तैमूर रखा।" तो वहीं एक यूज़र ने लिखा हैं कि "स्वरा-फरा को तो ख़ैर पूछता कौन है लेकिन, समाज की जितनी बद्दुआ करीना खान नाम की मगरूर लड़की ने ली हैं ना... निश्चय ही उसे आज न कल उसका नैसर्गिक भुगतान करना होगा। ऐसी लड़की किसी ख़ानदान में होने से अच्छा है, ख़ानदान का निर्वंश ही रह जाना, क्या नही दिया इस बेहूदा पेशेवर को देश ने और इसने हमेशा लौटाया क्या, सोचियेगा कभी"

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इस मामले को लेकर उसी प्लेकार्ड के साथ स्वरा भास्कर, सोनम कपूर, काल्की कोचलिन के भी फोटोग्राफ आये थे लेकिन ट्रोल के शिकार सिर्फ करीना कपूर हुयीं और उनके समर्थन में आयी स्वरा भास्कर। इससे साफ होता है कि हम किस कदर बीमार हैं। प्लेकार्ड में लिखी हुई बात से सहमत-असहमत होना अलग बात है लेकिन उसका इस स्तर का विरोध हमें एक बीमार समाज बना रहा है। इस बीमारी का इलाज भी अभी तक नहीं आया है क्योंकि यह एक स्वस्थ्य व्यक्ति के वैचारिकता और धार्मिकता की आड़ में मानसिक रूप से बीमार होने के लक्षण हैं। तो क्या समाज बिमार हो चुका है या समाज को जानबूझकर बीमार किया जा रहा है । यूं ये सवाल कभी भी उठाया जा सकता था । लेकिन मौजूदा वक्त में ये सवाल इसलिये क्योंकि आज के दौर में सोशल मीडिया के माध्याम से ही मानसिक बीमारी को प्रचार और प्रसार मिल रहा है। और भारत के दिृष्टीकोण से सबसे बडा असामाजिक प्लेटफार्म भी बनकर सामने आया है।

अगर हम 8 साल की बच्ची के साथ हुए रेप के विरोध को धर्म के चश्में से देखने वाले लोग बन रहे हैं तो हम बिमार हो रहे हैं यह मानवता के साथ बलात्कार के लक्षण हैं। सवाल ये नहीं है कि बलात्कार की पीड़िता हिन्दू है या मुसलमान मूल सवाल यह है कि मासूम का बलात्कार होता है और उसके समर्थन में  भी लोग बोलते हैं। क्या यह मानसिक बीमारी नहीं है ? इस पर हमें सोचना होगा। आप जिस समय इस तरह की बात कर रहे हैं ठीक उसी वक्त आपके घर में बड़े हो रहे बच्चों पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा होगा कभी इस पर भी सोचिएगा। आपकी बच्ची, हमारी बहन जो अभी बचपन में ही इस तरह की चर्चा और टी0वी0 की खबरों को देख रही होंगी वो क्या सोचती होंगी कभी उनसे भी इस बारे में बात कर के देखिएगा तब समझ पाएगें की आपके बच्चे भी आपको बीमार समझने लगे हैं।

क्या इस मामले को समझने के लिए उसे आपकी बेटी होना जरूरी है? वह मेरी बेटी भी हो सकती थी। एक आदमी होने के नाते, एक पिता होने के नाते और एक नागरिक होने के नाते आपको इस पर गुस्सा आना ही चाहिए। बलात्कार की समस्या को समग्रता से समझें तो मानना होगा हमारी बहुत सी समस्याएं लगती तो शारीरिक हैं, लेकिन होती मानसिक हैं। बलात्कार भी एक तरह से तन से पहले मन की बीमारी है। और इसकी जड़ में समाज के अनेक अवयव काम करते हैं-शिक्षा, लिंग, सामाजिक-आर्थिक असमानता जैसे अनेक विषय हैं जो इस पर प्रभाव ड़ालते हैं। कानून, पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया तो बहुत बाद के विषय हैं।

एक आंकलन के अनुसार हमारे देश में केवल चार प्रतिशत बलात्कार के मामले ही अनजान लोगों द्वारा किए जाते हैं, तथा 96 प्रतिशत बलात्कार जानने-पहचानने वालों द्वारा किए जाते हैं। बलात्कार तथा उस पर हमारे समाज की भूमिका पर सतही चर्चा करने के बजाए गहन मंथन करने की भी जरूरत है। बच्ची से बलात्कार जिसकी उम्र यौन सम्बन्ध के लायक ही नहीं है उससे लोग बलात्कार क्यों करते हैं ?  यही समय है जब माता-पिता और समाज के लोग इस पर बात करें और अपने आस-पास के लोगों से बात करें अच्छे-बुरे की जानकारी दें, साथ ही स्कूलों में नैतिक, संस्कारवान शिक्षा दी जाए। जरूरी समझी जाए तो यौन शिक्षा भी दी जाए।

इस मामले का पूरा सच बाहर जब आएगा तब आएगा लेकिन दुख की बात ये है कि हमारे समाज का सच सामने आ चुका है। हकीकत तो यह है कि हम बलात्कार का विरोध कर ही नहीं पाए हैं, हम लोग सिर्फ खानापूर्ति और सुविधाजनक प्रदर्शन वाले लोग हैं। देश में जब समाज ही बीमार हो जायेगा तो सच बहुत धुंधला हो जायेगा। सच की फिक्र किसी को नहीं है सबको अपने एजेंडे की फिक्र है और इस एजेंडे की चपेट में हमारा समाज आ रहा है और वह बहुत बीमार नजर आ रहा। यह आ रहे बदलावों का दौर है, इसलिए विशेष सतर्क रहने की जरूरत है। कहीं एेसा न हो कि हम संक्रमण वाली बदलाव की ड़गर पर चलने लगे।

चित्रस्रोत: Shutterstock, Twitter.

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