
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Medically Verified By: Dr. Manish Mannan
एयर पॉल्यूशन
जब भी दिल्ली और नेशनल कैपिटल रीजन में एयर पॉल्यूशन की चर्चा होती है, तो ध्यान आमतौर पर अस्थमा, सांस संबंधी बीमारियों, लगातार खांसी और हार्ट से जुड़ी बीमारियों जैसे स्वास्थ्य जोखिमों पर ही रहता है। हालांकि इनके लिए चिंता करना पूरी तरह जायज हैं, लेकिन प्रदूषित हवा का एक और गंभीर प्रभाव है, जिस पर या तो कोई बात नहीं करता और अगर होती भी है तो बहुत कम। हम बात कर रहे हैं दिल्ली की खराब होती हवा से बच्चों के दिमाग पर पड़ने वाले असर की।
इस गंभीर विषय पर जानकारी पाने क लिए हमने पारस हेल्थ, गुरुग्राम के हेड ऑफ डिपार्टमेंट, पीडियाट्रिक्स और न्यूनेटोलॉजिस्ट डॉक्टर मनीष मन्नान से बात की। उन्होंने बताया कि “वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा खतरा बच्चों को होता है क्योंकि उनके फेफड़े, इम्यून सिस्टम और मस्तिष्क का विकास हो रहा होता है। इस वजह से वे बड़ों के मुकाबले एनवायरनमेंटल टॉक्सिन के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं। वे अपने शरीर के वजन के मुकाबले ज्यादा तेजी से सांस लेते हैं और ज्यादा हवा अंदर लेते हैं, जिससे PM2.5, PM10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और दूसरे टॉक्सिक पार्टिकल्स जैसे नुकसानदायक पॉल्यूटेंट्स के संपर्क में आने की संभावना बढ़ जाती है।” आइए हम इसके बारे में थोड़ा विस्तार से जानते हैं।
डॉकटर ने कुछ नए वैज्ञानिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए बताया कि एयर पॉल्यूशन में ज्यादा देर तक रहने से बच्चे के दिमाग के विकास और काम करने के तरीके पर असर पड़ सकता है। छोटे पार्टिकुलेट मैटर, खासकर PM2.5, इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों के जरिए ब्लडस्ट्रीम में जा सकते हैं और शायद दिमाग तक पहुंच सकते हैं। रिसर्चर्स का मानना है कि ये पॉल्यूटेंट सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ा सकते हैं। ये दोनों ही दिमाग के सामान्य विकास में रुकावट डाल सकते हैं।
रिसर्च गेट की एक रिसर्च का हवाला देते हुए कहते हैं कि बच्चों में लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से ध्यान कम लगने, याददाश्त कमजोर होने, सीखने में परेशानी होने, पढ़ाई में कमजोरी और व्यवहार से जुड़ी समस्याएं होती हैं। कुछ रिसर्च में वायु प्रदूषण और न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर के बीच संभावित संबंधों का भी पता चला है। हालांकि इन संबंधों को पूरी तरह समझने के लिए और अध्ययन की जरूरत है।
माता पिता को बच्चों में ये प्रभाव अचानक नहीं दिखते हैं क्योंकि वे धीरे धीरे अपना असर दिखाते हैं। अगर किसी बच्चे को ध्यान लगाने में परेशानी हो रही हो, वह बार-बार सिरदर्द की शिकायत करता हो या उसके व्यवहार में बदलाव दिखाई दे रहा हो, तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें पर्यावरण से जुड़े कारक भी शामिल हैं। एयर पॉल्यूशन आमतौर पर अकेला कारण नहीं होता, लेकिन यह बच्चे के विकसित हो रहे दिमाग पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है और उसकी सीखने व ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
यह खतरा बच्चे के जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है। गर्भवती महिलाओं के ज्यादा वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से गर्भावस्था से जुड़े बुरे नतीजों का खतरा बढ़ सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि गर्भावस्था के दौरान प्रदूषक तत्वों के संपर्क में आने से भ्रूण के मस्तिष्क के विकास पर असर पड़ सकता है, जिससे बाद में जीवन में सोचने-समझने की क्षमता और व्यवहार पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
लगातार प्रदूषण से जूझ रहे दिल्ली शहर में प्रदूषण के संपर्क को पूरी तरह खत्म करना शायद मुमकिन न हो, लेकिन परिवार खतरा कम करने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठा सकते हैं। रोजाना हवा की गुणवत्ता पर नजर रखना, हवा की खराब गुणवत्ता के समय घर से बाहर की गतिविधियां कम करना, घर के अंदर सर्टिफाइड एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करना, एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर सही खान-पान सुनिश्चित करना और नियमित रूप से हेल्थ चेक-अप करवाना आदि ये सभी उपाय बच्चों को प्रदूषण के कुछ हानिकारक प्रभावों से बचाने में मदद कर सकते हैं।
डिस्क्लेमर: वायु प्रदूषण से निपटने के लिए हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स, स्कूलों, समुदायों और नागरिकों द्वारा सामूहिक कार्रवाई की जरूरत है। साथ ही अगर किसी बच्चे को ध्यान लगाने में परेशानी हो रही हो, वह बार-बार सिरदर्द की शिकायत करता हो या उसके व्यवहार में बदलाव दिखाई दे रहा हो, तो एक बार डॉक्टर से कंसल्ट करें।