
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
heart attack
WHO के मुताबिक विश्व स्तर पर हर साल लगभग 2 करोड़ लोगों की मौत दिल से जुड़ी बीमारियों के कारण होते हैं। साथ ही कुछ आंकड़े बताते हैं कि भारत में हार्ट डिजीज से सालाना मरने वालों की संख्या 28 लाख है। एक ओर जहां मेडिकल फील्ड में डॉक्टर मरीज को बचाने की पूरी कोशिश करते हैं। वहीं आज की टेक्नोलॉजी वाली दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी लोगों के इलाज और बीमारी का पता लगाने में आगे आ रहा है।
हाल ही में नेशनल इंस्टीट्यूड ऑफ हेल्थ में प्रकाशित दो अध्ययन बताते हैं कि AI भविष्य में डॉक्टरों को यह अनुमान लगाने में मदद कर सकता है कि किसी व्यक्ति को हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा कितना है। लेकिन ऐसा बिल्कुल न समझें कि इस एक तकनीक के आने से डॉक्टरों की जगह छिन जाएगी। लेकिन यह तकनीक जोखिम की पहचान को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकती है। आइए हम थोड़ा विस्तार से जानें कि स्टडी क्या कहती है।
अगर हम डॉक्टरों की बात करें तो वह हार्ट अटैक के जोखिम का पता लगाने के लिए आमतौर पर ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, वजन और अन्य मेडिकल जानकारी का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन नेशनल इंस्टीट्यूड ऑफ हेल्थ से जुड़े रिसर्चर्स ने स्टडी में पाया कि अगर CT स्कैन से मिलने वाली अतिरिक्त जानकारियों का विश्लेषण AI की मदद से किया जाए, तो भविष्य में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और मृत्यु के जोखिम का अधिक सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन अभी कई अस्पतालों तक AI नहीं पहुंचा है।
इस स्टडी में NIH के बायोवुल्फ सुपरकंप्यूटर का इस्तेमाल किया गया। रिसर्चर्स ने पांच ऑटोमेटेड AI टूल्स की मदद से 9,000 से ज्यादा कंप्यूटेड टोमोग्राफी स्कैन का एनालिसिस किया। इन टूल्स ने सीटी स्कैन का इस्तेमाल करके मरीजों की मांसपेशियों के साइज, बोन मिनरल डेंसिटी, आर्टरीज के सख्त होने और उनके लिवर व अंदरूनी अंगों के आस-पास जमा फैट की मात्रा का पता लगाया।
इन पांच CT बायोमार्कर ने मरीजों में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और मौत के भविष्य के जोखिम का ज्यादा सटीक अनुमान लगाया, जबकि हेल्थ से जुड़े नतीजों का अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बॉडी मास इंडेक्स और फ्रैमिंगम रिस्क स्कोर उतने सटीक नहीं थे।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक स्टडी की। टीम ने एक AI प्रोग्राम बनाया जिसे सूजन वाली धमनियों के आस-पास की चर्बी में होने वाले बदलावों की जानकारी का इस्तेमाल करके ट्रेन किया गया था। ये बदलाव हार्ट अटैक के जोखिम का संकेत हो सकते हैं। BHF के मेडिकल डायरेक्टर प्रोफेसर सर नीलेश समानी ने कहा कि यह रिसर्च दिखाती है कि भविष्य में हार्ट अटैक के सबसे ज्यादा जोखिम वाले लोगों की पहचान करने में AI-बेस्ड टेक्नोलॉजी कितनी अहम भूमिका निभा सकती है।
रिसर्चर्स ने UK के आठ अस्पतालों में रूटीन स्कैन करवा रहे 40,000 से ज्यादा मरीजों के डेटा का एनालिसिस किया। AI टूल को लगभग आठ सालों तक 3,393 और मरीजों पर टेस्ट किया गया और पाया गया कि यह उनके हार्ट अटैक के जोखिम का सही-सही अनुमान लगा सकता है।
इसी स्टडी में एक दिलचस्प बात और हुई और वह यह कि इसमें कुछ ऐसे लोग भी बाद में हार्ट अटैक का शिकार हुए जिनकी नियमित जांच में धमनियों में कोई गंभीर रुकावट नहीं दिखी थी। अब आप सोच रहे होंगे कि भला जब कोई चांस नहीं दिख रहे थे तो बाद में हार्ट अटैक की संभावना कैसे हो सकती है। दरअसल AI ने धमनियों के आसपास मौजूद फैट में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों का विश्लेषण करके जोखिम का आकलन किया। पाए गए बदलावों से शरीर में सूजन का संकेत मिल सकता है, जो भविष्य में हार्ट अटैक के खतरे से जुड़ी हो सकती है।
इस विषय पर भले ही स्टडी हुई है और उनमें भी संभावना जताई गई है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एआई हार्ट अटैक की भविष्यवाणी को पूरी तरह से सही-सही बता सकता है। यह तकनीक सिर्फ जोखिम का बेहतर अनुमान लगाने में मदद करती है। बाकी आखिरी फैसला और इलाज की योजना अभी भी डॉक्टर ही तय करेंगे।
AI के आने से यह होगा कि वे लोग जिन्हें भविष्य में हार्ट से जुड़ी समस्या होने का जोखिम या डर है, वे पहले ही अपने जोखिम का पता लगा सकते हैं। साथ ही ऐसा होने पर डॉक्टर समय रहते लाइफस्टाइल में होने वाले बदलाव, दवाओं या अन्य उपचारों की सलाह दे सकते हैं। इससे भविष्य में हार्ट अटैक या स्ट्रोक की संभावना को कम करने में मदद मिल सकती है। NIH के अनुसार, AI की मदद से मेडिकल इमेजिंग से ऐसी जानकारी निकाली जा सकती है जो सामान्य जांच में नजर नहीं आती।
डिस्क्लेमर: शोध बताते हैं कि AI फ्यूचर में हार्ट अटैक और स्ट्रोक के जोखिम का आकलन करने का एक महत्वपूर्ण उपकरण बन सकता है। CT स्कैन जैसी सामान्य जांचों से मिली जानकारी का गहराई से विश्लेषण करके यह उन लोगों की पहचान करने में मदद कर सकता है।