
प्रिया मिश्रा
प्रिया को पिछले 4 सालों से हेल्थ और लाइफस्टाइल विषयों पर लिखने का अनुभव है। इन्हें हेल्थ और ... Read More
Written By: priya mishra | Published : December 3, 2024 4:14 PM IST
Medically Verified By: Dr. Vikas Mittal
Black Asthma In Hindi: पिछले कुछ महीनों से दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ा है। इसके कारण लोगों को कई तरह की सांस से जुड़ी बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। प्रदूषण और ठंड के कारण दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में ब्लैक अस्थमा के मामले तेजी से बढ़े हैं। ब्लैक अस्थमा को काला दमा के नाम से भी जाना जाता है। यह फेफड़ों से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है, जो सर्दियों में कम तापमान की वजह से होती है। इसके अलावा, यह बीमारी हवा में मौजूद प्रदूषण और धूल के कणों से भी हो सकती है। ब्लैक अस्थमा क्या है? इसके लक्षण और बचाव के उपाय क्या हैं? इसके बारे में हमने दिल्ली के सीके बिरला अस्पताल के डायरेक्टर-पल्मोनोलॉजी डॉ विकास मित्तल से बातचीत की। आइए, जानते हैं ब्लैक अस्थमा से जुड़ी सभी जानकारी के बारे में विस्तार से –
ब्लैक अस्थमा को मेडिकल भाषा में क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के नाम से जाना जाता है। 'ब्लैक अस्थमा' शब्द को चिकित्सा शब्दावली में आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं दी गई है। हालांकि, आम बोलचाल की भाषा में लोगों द्वारा इसका उपयोग किया जाता है। क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज एक ऐसी स्थिति है, जिसमें फेफड़ों में सूजन और सांस की नली में संकुचन होता है। इसके कारण वायु का प्रवाह कम हो सकता है और व्यक्ति को सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। यह बीमारी धीरे-धीरे गंभीर होती है और क्रॉनिक डिजीज का रूप ले लेती है। यदि समय पर इसका इलाज न किया जाए, तो इस बीमारी के कारण व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।
आमतौर पर, सीओपीडी हानिकारक गैसों और प्रदूषकों के लंबे समय तक संपर्क से जुड़ा होता है। इसमें सिगरेट का धुआं, बायोमास ईंधन और वायु प्रदूषण जैसे हानिकारक पदार्थों के लंबे समय तक संपर्क में रहना शामिल है, जो श्वसन स्थितियों के विकास और बिगाड़ने में योगदान करते हैं। इसके अलावा, आनुवंशिकी भी एक अहम भूमिका निभाती है। इसका मतलब यह हुआ कि जिन व्यक्तियों के परिवार में श्वसन संबंधी समस्याओं का इतिहास रहा है, उनमें सीओपीडी या अस्थमा जैसे लक्षण विकसित होने की अधिक संभावना होती है।
ब्लैक अस्थमा के बढ़ते प्रसार के लिए कई कारकों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। पर्यावरण प्रदूषण, विशेष रूप से वायु प्रदूषकों जैसे पार्टिकुलेट मैटर और एलर्जी के संपर्क में आने से श्वसन संबंधी समस्याएं काफी बढ़ जाती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण परागण के लंबे मौसम और उच्च एलर्जीन स्तर में योगदान मिला है। इसके अलावा, जीवनशैली के कारक जैसे, असक्रिय जीवनशैली, खराब खानपान और मोटापा भी जिम्मेदार हैं। निदान में देरी, एडवांस ट्रीटमेंट तक सीमित पहुंच और रोगाणुरोधी प्रतिरोध सीओपीडी के प्रबंधन को और अधिक जटिल बना देते हैं।
ब्लैक अस्थमा के इलाज के लिए कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स, बायोलॉजिक्स और ब्रोन्कोडायलेटर्स जैसी दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा, वजन प्रबंधन, नियमित व्यायाम, एलर्जी और प्रदूषकों के संपर्क को कम करके भी आप सीओपीडी से बच सकते हैं। कुछ गंभीर मामलों में ऑक्सीजन थेरेपी या मैकेनिकल वेंटिलेशन जैसी आपातकालीन देखभाल आवश्यक हो सकती है। तेत्सुया यामादा, एमडी, ओमरॉन हेल्थकेयर इंडिया के मुताबिक, नेब्युलाइजर थेरेपी, सीओपीडी जैसी श्वसन संबंधी बीमारियों के प्रबंधन के लिए एक सुरक्षित और कुशल समाधान प्रदान कर सकती है। नेब्युलाइजर से वाष्प खींचकर दवा को ऊपरी और निचले श्वसन तंत्र में पहुंचाया जाता है, जिससे सांस लेने में होने वाली कठिनाइयों से राहत मिलती है। यह अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) जैसी स्थितियों के लिए प्रभावी परिणाम देती है। यह बुजुर्गों और बच्चों जैसे कमजोर समूहों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।