बाइपोलर डिसऑर्डर को कितना जानते हैं आप?
बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति असामान्य रूप से तीव्र भावना, सोने के तरीके में बदलाव, सक्रियता का स्तर एवं असामान्य व्यवहार अनुभव करता है।
बाइपोलर डिसऑर्डर एक मानसिक बीमारी है। इस बीमारी में मरीज के मस्तिष्क का नियंत्रण बिगड़ जाता है। इसे मिजाज एवं व्यवहार में बदलाव, कभी अवसाद, कभी उन्माद, तो कभी मानसिक एवं मस्तिष्क विकार भी कहा जाता है। यह एक ऐसा मानसिक विकार है, जिसमें व्यक्ति कुछ समय के लिए अवसाद एवं कुछ समय के लिए उन्माद वाली अवस्था में रहता है। व्यक्ति की मनोदशा, ऊर्जा, गतिविधियों का स्तर हर दिन बदलता रहता है। यह समस्या महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा होता है।
क्या है उन्माद एवं अवसाद की अवस्थाएं
उन्माद की अवस्था में व्यक्ति असामान्य रूप से ऊर्जावान, खुश या चिड़चिड़ा महसूस करता है। नतीजों की परवाह किए बिना गलत निर्णय लेता है। उन्माद की स्थिति में नींद की जरूरत काफी कम हो जाती है। अवसाद की स्थिति में व्यक्ति बिना कारण रोने लगता है। जीवन के प्रति उसका नजरिया नकारात्मक हो जाता है। ऐसा व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से आंख कम ही मिलाता है।
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क्या हैं लक्षण
बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति असामान्य रूप से तीव्र भावना, सोने के तरीके में बदलाव, सक्रियता का स्तर एवं असामान्य व्यवहार अनुभव करता है। इस स्थिति में मनोदशा में बार-बार बदलाव देखा जा सकता है। व्यक्ति के ऊर्जा के स्तर, कार्यशैली एवं निद्रा में भारी बदलाव, मनोदशा की स्थिति पर निर्भर करता है। जब व्यक्ति अवसाद की स्थिति में होता है, तब वह दुखी, असहाय, खालीपन, नाउम्मीद, ऊर्जाहीन, कार्यशैली का स्तर कम होना, निंद न आना या फिर बहुत नींद आना, चिंतित रहना, एकाग्रता में परेशानी, चीजों को भूलना, बहुत ज्यादा या बहुत कम खाना, थकान, सुस्ती, आत्महत्या का ख्याल मन में आना आदि लक्षण देखने को मिलते हैं। उन्माद की स्थिति में व्यक्ति असामान्य रूप से अतिउत्साहित एवं अतिसक्रियता की स्थिति में पीड़ित रहता है। अत्यअधिक खुश, जोर से बोलना, एक विचार से दूसरे विचार पर पहुंच जाना, दूसरे को चिढ़ाना, आसपास के वातावरण पर बहुत कम ध्यान देना आदि की स्थिति में रहता है। प्रोबायोटिक्स का संभलकर करें इस्तेमाल, हो सकते हैं मानसिक रोग के शिकार
कौन-कौन सी हैं वजहें
बाइपोलर डिसऑर्डर कई कारणों से हो सकता है। विभिन्न शोध के अनुसार, यह वंशानुगत भी होता है। वातावरण जनित, व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक एवं अनुवांशिक कारण इस बीमारी के होने की सम्भावनाओं को काफी बढ़ा देते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि जीवन की कुछ अप्रिय घटनाएं, खराब व्यक्तिगत रिश्ते, बचपन में हुए बुरे व्यवहार या कोई दुर्घटना भी इसके कम उम्र में होने की संभावनाओं को बढ़ा देता है। इसके साथ ही मस्तिष्क में लगी चोट, एड्स का संक्रमण, मिर्गी, मस्तिष्क एवं नसों की बीमारी भी कभी-कभी इसके होने का कारण बनता है। बीमारी की सही समय पर पहचान और उपचार, इससे पीड़ित व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं निर्णयात्मक जीवन जीने में मदद करता है। मन-मस्तिष्क को शांति देता है संगीत, इसके अन्य फायदों को जानकर हो जाएंगे हैरान
कुछ फैक्ट्स
- बीमारी की पहचान आमतौर पर लक्षणों एवं रोगी से बात करके ही, पता लगाना संभव होता है।
- इसके उपचार में दवाओं, मनोचिकित्सा, इलेक्ट्रोकन्वल्सिप थेरेपी एवं निंद्रा की दवाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। लंबे समय तक लगातार उपचार, इस बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित करने में मददगार होता है।
- 25-29 वर्ष की उम्र में भारत में बाइपोलर डिसऑर्डर से सबसे ज्यादा महिलाओं के ग्रस्त होने की संभावना रहती है।