घर पर डिलीवरी कराने के चक्कर में वेंटिलेटर पर पहुंचा बच्चा, NIIMS डॉक्टरों की 48 घंटे की मेहनत से बची जान
घर पर बच्चे की डिलीवरी होना कई बार मां और बच्चे दोनों के लिए ही बेहद खतरनाक हो सकता है। नोएडा में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जिसमें बच्चे की घर पर डिलीवरी के बाद उसे बच्चे को सांस की दिक्कत होने लगी और बाद में उसे अस्पताल लाया गया।
भारत में अगर 90 के दशक की बात करें तो ज्यादातर बच्चों को जन्म घर पर ही हुआ करता था और लेकिन उस समय लोगों की मजबूरी हुआ करती थी। जागरूकता और अस्पतालों में सुविधाओं की कमी के कारण प्रसव घर पर ही होते थे और यह सामान्य हो चुका था। लेकिन आज के समय में सारी सुविधाएं होने के बावजूद भी घर पर प्रसव कराना बेहद खतरनाक हो सकता है। हाल ही में एक ऐसा ही मामला सामने आया है। नोएडा इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (NIIMS) में एक दिन के नवजात शिशु को समय रहते बेहतर इलाज देकर नई जिंदगी दी गई। 31 मई 2026 के दिन बच्चे को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि सांस की समस्या के कारण बच्चे की छाती अंदर की तरफ धंसने लगी थी जिसे चेस्ट इन्ड्रॉइन्ग कहा जाता है और इस कंडीशन के दौरान उसे नोएडा इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल (NIIMS) इमरजेंसी लाया गया।
घर पर हुई थी बच्चे की डिलीवरी
बच्चे के पेरेंट्स से मिली जानकारी के मुताबिक बच्चे का जन्म घर पर नॉर्मल डिलीवरी से हुआ था। जन्म के बाद बच्चे को तेज सांस चलने की प्रॉब्लम होने लगी, जिसके बाद उसे ग्रेटर नोएडा के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालांकि, हालत बिगड़ने पर डॉक्टरों ने बताया कि बच्चे को नवजात शिशु की स्पेशल केयर यूनिट (Level-3 NICU) और वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत है। इसके बाद वो बच्चे को तुरंत NIIMS लेकर पहुंचे।
NIIMS में पीडियाट्रिक टीम ने तुरंत बच्चे को इमरजेंसी में रिसीव कर NICU में भर्ती किया। शुरुआत में बच्चे को CPAP सपोर्ट दिया गया, लेकिन सांस की तकलीफ बढ़ने के संकेत मिलने पर पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अविनाश झा और उनकी टीम ने बच्चे को वेंटिलेटर पर रखने का फैसला लिया।
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रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम से पीड़ित था बच्चा
जब बच्चे का एक्सरे व अन्य जरूरी टेस्ट किए गए तो पाया कि बच्चे में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (Respiratory Distress Syndrome - RDS) के लक्षण पाए गए। इसके बाद उसे जरूरी दवाइयों के साथ सर्फेक्टेंट थेरेपी दी गई और साथ ही IV फ्लूड्स व एंटीबायोटिक शुरू किए गए। इलाज के दौरान बच्चे में गंभीर कैल्शियम की कमी (Hypocalcemia) भी पाई गई, जिसका सफल इलाज किया गया।
48 घंटे की मेहनत से सफल इलाज
डॉक्टरों की समय पर देखभाल और इलाज की वजह से 48 घंटे बाद, यानी 2 जून की सुबह बच्चे को वेंटिलेटर से हटाकर दोबारा CPAP सपोर्ट पर रखा गया। धीरे-धीरे बच्चे की ऑक्सीजन कम की गई और दूध पिलाना शुरू कराया गया। अब बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है, नॉर्मली सांस ले रहा है और मां का दूध पी रहा है। डॉक्टरों ने बच्चे की न्यूरोलॉजिकल और सांस संबंधी जांच नॉर्मल पाई है और उसे डिस्चार्ज के लिए फिट बताया है। बच्चे के माता-पिता ने NIIMS की पूरी मेडिकल टीम का आभार जताते हुए इलाज से पूरी तरह से संतुष्ट हैं।
डॉ. अविनाश झा ने कहा कि “सरकार लगातार कोशिश कर रही है कि घर पर होने वाली डिलीवरी कम हो और ज्यादा से ज्यादा डिलीवरी हॉस्पिटल में एक्सपर्ट्स की देखरेख में ही हो। डायरेक्टर डॉ. एस. एन. गुप्ता, एमएस डॉ. (ब्रिगेडियर) रंजीत घुलियानी और एचओडी पीडियाट्रिक्स डॉ. अमित मोदी के मार्गदर्शन में पीडियाट्रिक्स और नियोनेटोलॉजी विभाग लगातार बेहतर काम कर रहा है। हमारी NICU में आधुनिक सुविधाएं और समर्पित डॉक्टरों की टीम 24 घंटे नवजात बच्चों की देखभाल करती है।”
आयुष्मान भारत योजना से हुआ इलाज
इस तरह के इलाज आमतौर पर बहुत महंगे होते हैं, लेकिन डॉक्टर अविनाश ने बताया कि बच्चे का इलाज आयुष्मान भारत योजना के तहत हुआ तहत NIIMS में हुआ है। इससे परिवार पर वित्तीय दबाव भी नहीं पड़ा है और बच्चे को अच्छा, बेहतर व समय पर इलाज मिल सका है जिससे बच्चे की जान बच पाई है।
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डिसक्लेमर: इस लेख डॉक्टर व अस्पताल से मिली जानकारी के आधार पर लिखा गया है। इस लेख में इस्तेमाल की गई सभी तस्वीरें और जानकारियां नोएडा इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल (NIIMS) से ली गई हैं और उनकी सहमति के अनुसार ही साझा किया गया है। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।