
मुकेश शर्मा
मुकेश शर्मा दिल्ली यूनिर्विसिटी से जर्नलिज्म डिग्री होल्डर हैं और पिछले 8 साल से Health Journalism से जुड़े हुए ... Read More
autism pride day (AI generated image)
कुछ बीमारियां होती हैं, जो शरीर को दर्द देती हैं तो कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं जो शारीरिक रूप से दर्द देने के साथ-साथ मानसिक रूप से भी दर्द देती हैं और यहां तक कि मरीज के अपनों को भी भावनात्मक रूप से दर्द महसूस होता है। ऑटिज्म भी ऐसी ही एक बीमारी है और आज ऑटिस्टिक प्राइड डे है, जो हमें एक अहम बात याद दिलाता है कि ऑटिज्म किसी की सहानुभूति का नहीं, बल्कि समझ, सम्मान और सही समय पर मिलने वाले सहयोग का विषय है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) कोई एक बीमारी नहीं है, जिसके लक्षण या परिणाम सभी में एक जैसे हों। यह एक न्यूरोडेवलपमेंटल कंडीशन है, जिसमें हर व्यक्ति के सीखने, बोलने, चीजों को समझने व दुनिया से जुड़ने का तरीका अलग हो सकता है। अगर हम अब तक भी ऑटिज्म को सिर्फ एक बीमारी समझ कर बैठे हैं, तो यह सही नहीं है और आज के इस खास दिन में हमें इसके बारे में कुछ ऐसी बातें जाननी चाहिए जो जरूरी हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, साल 2021 में दुनिया में लगभग हर 127 लोगों में से एक व्यक्ति ऑटिस्टिक यानी उसे ऑटिज्म था। वहीं, अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि वहां आठ साल की उम्र के करीब हर 31 बच्चों में से एक बच्चे में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर की पहचान की गई है।
यह स्वास्थ्य से जुड़े एक बहुत बड़े और चिंताजनक बदलाव का संकेत है, जिससे साफ होता है कि स्वास्थ्य व्यवस्था, स्कूलों और समाज को बच्चों में विकास संबंधी अंतर को जल्दी पहचानने की जरूरत है। डॉ. गीतिका जस्सल, मेडिकल स्पोकपर्सन, क्रायोवीवा लाइफ साइंसेज के अनुसार परिवारों को बेहतर सहयोग देना होगा और इस सोच से बाहर निकलना होगा कि ऑटिज्म केवल बोलने में देरी या फिर सोशल बिहेवियर से जुड़ी समस्या है।
अगर हम ऑटिज्म के मरीज की देखभाल करना चाहते हैं, तो उसके लिए सबसे जरूरी है कि समय रहते उसकी कंडीशन की पहचान करना और जरूरी इलाज शुरू कराना। ऑटिज्म से जूझ रहे बच्चे की जरूरत के अनुसार स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, बिहेवियरल थेरेपी, सेंसरी इंटीग्रेशन प्रोग्राम, विशेष शिक्षण पद्धतियां और माता-पिता की सक्रिय भागीदारी जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। ये सभी बच्चे की संवाद क्षमता बढ़ाने, आत्मनिर्भर बनाने और सामाजिक रूप से बेहतर जुड़ने में मदद करते हैं।
हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे की देखभाल जितनी जल्दी होती है, उसकी हेल्थ कंडीशन को मैनेज करने में उतनी ही ज्यादा मदद मिलती है। ऐसे में वह बेहद तरीके से बोल पाता है, पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन कर पाता है और समय-के साथ-साथ खुद की देखभाल करना भी सीख जाता है।
मेडिकल साइंस लगातार इस समस्या पर रिसर्च कर रहा है और ऑटिज्म के इलाज के लिए कुछ एडवांस ट्रीटमेंट हैं जो नई उम्मीद भी लेकर आ रहे हैं। स्टेम सेल रिसर्च भी उसका एक अच्छा उदाहरण है, पिछले कुछ वर्षों में ऑटिज्म से जुड़ी रिसर्च में रीजेनरेटिव मेडिसिन और स्टेम सेल थेरेपी को लेकर काफी रुचि बढ़ी है। वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि स्टेम सेल और इससे जुड़ी तकनीकें मस्तिष्क में होने वाली सूजन, प्रतिरक्षा तंत्र की दिक्कतों, न्यूरॉन्स की रिपेयर और ब्रेन डेवलपमेंट के पहलुओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी है कि वैज्ञानिक शोध और प्रैक्टिकल ट्रीटमेंट में बहुत अंतर होता है और स्टेम सेल थेरेपी अभी तक ऑटिज्म का कोई प्रमाणित इलाज नहीं बन पाया है। अगर हम भारत की बात करें तो ऑटिज्म के लिए इलाज सिर्फ क्लिनिकल प्रैक्टिस के रूप में ही किया जाना चाहिए, मरीज की सहमति भी होती है।
डिसक्लेमर: इस लेख का उद्देश्य केवल ऑटिज्म की समस्या और उसकी देखभाल से जुड़ी कुछ जरूरी जानकारी देना है और इसमें दी गई जानकारी का इस्तेमाल ऑटिज्म या किसी भी बीमारी के इलाज के लिए नहीं है और उसके लिए आपको डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।