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ऑटिज्म के मामले लड़कियों से ज्यादा पुरुषों में क्यों देखे जाते हैं, क्या इसके खतरे को कम किया जा सकता है

Autism awareness day: हर साल 2 अप्रैल को ऑटिज्म अवेयरनेस डे के रूप में मनाया जाता है। इस मौके पर हम आपको बताएंगे लड़कियों से ज्यादा लड़कों में इसके मामले क्यों पाए जाते हैं।

ऑटिज्म के मामले लड़कियों से ज्यादा पुरुषों में क्यों देखे जाते हैं, क्या इसके खतरे को कम किया जा सकता है

Written by Mukesh Sharma |Updated : April 2, 2024 4:40 PM IST

Risk of Autism: ऑटिज्म एक प्रकार का गंभीर रोग है, जो शरीर को तंत्रिका प्रणाली को प्रभावित करता है। इससे शरीर की कई क्रियाएं प्रभावित हो जाती हैं। ऑटिज्म रोग का पूरा नाम ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) जिसके मामलों की संख्या काफी तेजी से बढ़ते जाने के कारण यह एक चुनौती बनता जा रहा है। भारत में भी ऑटिज्म के मामलों की संख्या काफी तेजी से बढ़ती जा रही है, जिससे आने वाले समय के लिए यह एक काफी बड़ी चुनौती बन सकती है। ऑटिज्म के लक्षण ज्यादातर मामलों में बचपन में ही दिखाई देने लगते हैं और इस कारण से कई बार इसके खतरे का पता नहीं लग पाता है। जेनेटिक स्थितियों के अलावा ऑटिज्म के खतरे का अंदाजा लगाना काफी मुश्किल हो सकता है। लेकिन यह भी देखा गया है कि लड़कियों की तुलना में लड़कों में ऑटिज्म के मामले ज्यादा देखे जाते हैं

लड़के या लड़कियों में किसे ज्यादा खतरा

ऑटिज्म एक जेनेटिक डिसऑर्डर है, जिसका मतलब है कि अगर माता या पिता में से कोई ऑटिज्म से ग्रस्त है या फिर सगे भाई या बहन में से किसी को यह डिसऑर्डर है, तो यह विकार होने का खतरा ज्यादा देखा जाता है। इसके अलावा कुछ स्टडी में यह भी देखा गया है कि लड़कियों की तुलना में लड़कों में ऑटिज्म होने का खतरा ज्यादा रहता है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा (UMN) की वेबसाइट पर पब्लिश की गई रिपोर्ट के अनुसार लड़कियों से ज्यादा लड़कों में ऑटिज्म के मामले इसलिए पाए जाते हैं, क्योंकि लड़कों में ऐसे खास तरह के जेनेटिक होते हैं, जिनमें इस विकार के होने का खतरा ज्यादा बढ़ता है।

लक्षणों की पहचान

ऑटिज्म के लक्षणों की अगर सही तरीके से पहचान की जाए तो बचपन में ही इसके लक्षणों को पता लगाया जा सकता है। इसके लक्षणों में निम्न शामिल हो सकेत हैं

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  • नाम से बुलाने पर भी जवाब न देना
  • आंखें चुराना या आंखों से आंखें न मिलाना
  • आपके मुस्कुराने पर भी न मुस्कुराना यह असहज महसूस करना
  • किसी स्वाद, गंध या ध्वनि जो उन्हें पसंद न हो उससे ज्यादा परेशान होना
  • कोई भी शारीरिक क्रिया बार-बार करना जैसे ताली बजाना आदि
  • दूसरे बच्चों के जितनी बातें न करना और चुपचाप सुनते रहना
  • खेल कूद में रुचि कम दिखाना और प्रेरणा की कमी होना

ऑटिज्म के खतरे को कम करना

ऑटिज्म एक जेनेटिक विकार है और इसलिए पूरी तरह से इसकी रोकथाम करना संभव नहीं है। लेकिन लाइफस्टाइल में कुछ जरूरी बदलाव लाकर इस जेनेटिक बीमारी के खतरे को भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है, जिनमें निम्न शामिल हैं -

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  • हेल्दी लाइफस्टाइल की आदतें अपनाना
  • शराब व धूम्रपान जैसी आदतें छोड़ना
  • समय पर वैक्सीन लेते रहना
  • समय-समय पर डॉक्टर से जांच कराते रहना
  • बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दवा न लेना