
रश्मि उपाध्याय
रश्मि उपाध्याय साल 2014 से मीडिया क्षेत्र से जुड़ी हैं और TheHealthSite.Com में बतौर एडिटर काम कर रही हैं। इन्हें ... Read More
Written By: Rashmi Upadhyay | Updated : November 11, 2020 4:40 PM IST
नवजात को प्रभावित कर सकता है अर्नाल्ड कियारी मालफॉर्मेशन, जानें क्या है ये न्यूरोलॉजिकल बीमारी
कारण चाहे जो हो, जन्मजात विकार या जन्म दोष न सिर्फ बच्चों के शरीर में विकृति पैदा करता है बल्कि उनके शारीरिक और बौद्धिक विकास को भी धीमा करता है। वैसे तो ये समस्याएं बच्चे के जीवन की गुणवत्ता को हमेशा के लिए खराब कर सकती हैं लेकिन समय पर हस्तक्षेप के साथ लक्षणों की रोकथाम संभव है।
डॉक्टर एस. के. राजन, हेड, स्पाइन सर्जरी, अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेस, आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुरूग्राम का कहना है कि कियारी मालफॉर्मेशन इसी प्रकार की एक विकृति है। इस जन्मजात विकार के लक्षण शुरुआती किशोरावस्था में दिखाई दे भी सकते हैं और नहीं भी। यह सेरिबैलम भाग (जो शरीर के संतुलन को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार है) में एक संरचनात्मक दोष है, जहां मस्तिष्क के टिशू रीढ़ की कैनल में असामान्य तरीके से बढ़ जाते हैं। यह विकार आमतौर पर, भ्रूण के विकास के दौरान शुरू हो जाता है।
हालांकि, कियारी मालफॉर्मेशन के अधिकतर मामले भ्रूण विकास के दौरान होते हैं, केवल कुछ ही मामलों में यह विकार जीवन के बाद के चरणों में विकसित हो सकता है। ऐसा तब होता है जब सेरिब्रोस्पाइनल तरल किसी कारण (चोट, संक्रमण आदि) से बहुत ज्यादा मात्रा में बह जाता है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि आनुवंशिकी, प्रेग्नेंसी के दौरान मां के शरीर में पोषण की कमी, प्रेग्नेंसी के दौरान कोई हादसा, संक्रमण या जहरीले पदार्थों का एक्सपोज़र आदि। ऐसे में बच्चे की खोपड़ी के नीचे मौजूद हड्डियों जी जगह असामान्य रूप से छोटी रह जाती है। परिणामस्वरूप, सेरिबैलम में दबाव पड़ता है जो सीएफएस के बहाव को रोकता है। दरअसल, सीएफएस मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड की सुरक्षा में मदद करता है।
इस स्थिति को दुर्लभ जन्म दोषों में गिना जाता है। कई अध्ध्यनों के अनुसार, पिछले दशक में इस बीमारी ने हज़ार बच्चों पर एक बच्चे को अपना शिकार बनाया। लेकिन टेक्रनोलॉजी और नैदानिक इमेजिंग दिखाई देना शुरू होते हैं। इसके तकनीकों में प्रगति के साथ, बीमारी की पहचान संभव है। कई मामलों में, लक्षण या तो नवजात शिशुओं में दिखाई दे सकते हैं या तो टीनएज में कारण समस्या बहुत मुश्किल हो सकती है। तथ्यों के अनुसार, ये बीमारी पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज्यादा होती है।
टाइप1- इस प्रकार की विकृति बच्चों में सबसे ज्यादा देखने को मिलती है, जहां सेरिबैलम का केवल निचला हिस्सा बढ़ता है। यह विकृति रीढ़ को प्रभावित करती है। यह एकमात्र प्रकार है जो किसी भी बच्चे में हो सकता है।
टाइप2- इस प्रकार की विकृति उन बच्चों में होती है, जो स्पाइना बिफिडा (स्प्लिट स्पाइन डिफेक्ट) के साथ पैदा होते हैं। इसे क्लासिक कियारी मालफॉर्मेशन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें, सेरिबैलम और ब्रेन स्टेम, दोनों ही बढ़ जाते हैं।
टाइप3- यह एक दुर्लभ लेकिन सबसे खतरनाक प्रकार की विकृति है। इसमें सेरिबैलम और ब्रेन स्टेम बढ़ जाता है जिसमें हर्निया हो जाता है। इससे गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याएं हो सकती हैं।
टाइप4- ये सभी प्रकारों की तुलना में सबसे ज्यादा दुर्लभ है। इसमें सेरिबैलम का विकास अधूरा रह जाता है।
हालांकि, नवजात शिशुओं में स्पाइना बिफिडा विकार इसका एक आम कारण है, लेकिन इसके अलावा कई अन्य कारण भी इससे जुड़े हुए हैं। सेरिब्रोस्पाइनल तरल बहुत ज्यादा होना, रीढ़ के बीचों-बीच सिस्ट का विकास, रीढ़ में विकार आदि इसके कारण हो सकते हैं।
मालफॉर्मेशन के प्रकार और गंभीरता पर आधारित, इसके लक्षण हर व्यक्ति में भिन्न हो सकते हैं। एक व्यक्ति में इसके कोई लक्षण नहीं दिखाई दे सकते हैं तो दूसरे में जीवन के बाद के चरणों में नज़र आ सकते हैं। जबकी कुछ में ये लक्षण बचपन में ही नज़र आ सकते हैं। आम लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हैं-
कमज़ोर दृष्टि
हल्के से गंभीर स्तर का सिरदर्द
मांसपेशियों का कमज़ोर और सुन्न पड़ना
टाइप1 के हल्के मामलों में, लोगों को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं होता कि वे ऐसी किसी विकृति का शिकार हैं। उन्हें इस बात का पता तब चलता है जब वे किसी अन्य बीमारी या समस्या का निदान कराने जाते हैं और गलती से इसकी भी पहचान हो जाती है। लेकिन इसके गंभीर मामलों में, मरीज को कमर से लेकर गर्दन तक तेज दर्द का अनुभव होता है। यह दर्द किसी भी कारण (छींकना या खांसना आदि) से शुरू हो सकता है, जो मस्तिष्क पर दबाव बनाता है।
टाइप1 के विपरीत, टाइप2 से ग्रस्त मरीजों में सीएसएफ बहुत ज्यादा मात्रा में इकठ्ठा हो जाता है। इससे झुकने, खांसने, छींकने, कब्ज़ या शीरीरिक गतिविधियों के दौरान दर्द होता है।
मालफॉर्मेशन की शंका होने पर डॉक्टर इसकी पुष्टि के लिए शारीरिक परीक्षण करता है। इसके लिए रीढ़ और सेरिबैलम की कार्यक्षमता का परीक्षण किया जाता है। यदि व्यक्ति का शारीरिक संतुलन, मोटर स्किल्स, प्रतिक्रियाएं, स्पर्शानुभूति सामान्य है तो आगे निदान की आवश्यकता नहीं पड़ती है। ऐसा नहीं होने पर मरीज को सीटी स्कैन और एमआरआई की सलाह दी जाती है।
यदि लक्षण लगातार नहीं दिखाई देते हैं और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित नहीं कर रहे हैं तो ऐसे में इलाज की आवश्यकता नहीं पड़ सकती है। जबकी गंभीर मामलों में, जहां मरीज पर मेडिकेशन का कोई असर नहीं पड़ रहा है तो ऐसे में उसे सर्जरी की सलाह दी जाएगी।
सर्जरी इस विकृति को सही करने का आखरी विकल्प होता है। सर्जरी का उद्देश्य मस्तिष्क और रीढ़ पर पड़ रहे दबाव को कम करना है और तरल के बहाव को सामान्य बनाना है।
ब्रेन स्टेम ओपनिंग की डिकम्प्रेशन सर्जरी- इसमें खोपड़ी या रीढ़ के नीचे से एक छोटा हिस्सा हटाया जा सकता है, जिससे सीएसएफ के सही बहाव के लिए अतिरिक्त जगह बनाई जा सके।
स्पाइनल लेमिनेक्टॉमी- इस प्रक्रिया में, मुड़ी हुई हड्डी के एक हिस्से को निकाल दिया जाता है। कैनल के आकार को बढ़ाकर मस्तिष्क और रीढ़ पर पड़ रहे दबाव को कम किया जाता है।
हालांकि, हाइड्रोसेफलस के मामले में अतिरिक्त प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन अधिकतर मामलों में, सर्जरी लक्षणों की रोकथाम करती है और समस्या से राहत देने में कामयाब रहती है