पहली बार दुर्लभ ब्लड डिसऑर्डर के साथ 79 वर्षीय व्यक्ति का एओर्टिक वॉल्व रिप्लेसमेंट सफलतापूर्वक संपन्न

दुर्लभ रक्त विकार से पीड़ित एक 79 वर्षीय शख्स का ट्रांसकेथेटर एओर्टिक वॉल्व रिप्लेसमेंट सफलतापूर्वक किया गया। ये एक ऐसी बीमारी होती है, जिसमें बिना किसी चोट के भी ब्लीडिंग होती है।

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Written By: Anshumala | Updated : November 20, 2021 9:22 AM IST

एक 79 वर्षीय व्यक्ति काफी दिनों से एक दुर्लभ ब्लड डिसरऑर्डर से पीड़ित था, जिसका ट्रांसकेथेटर एओर्टिक वॉल्व रिप्लेसमेंट (Aortic valve replacement) के जरिए सफलतापूर्वक इलाज किया गया। इस ब्लड डिसऑर्डर में बिना कोई चोट लगे भी व्यक्ति को ब्लीडिंग (rare blood disorder) होने लगती है। यह व्यक्ति देश का पहला मरीज बन गया है, जिसका ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वॉल्व रिप्लेसमेंट के जरिए इलाज किया गया है।

हीमोफिलिया से मरीज था ग्रस्त

यह मरीज हीमोफिलिया से ग्रस्त था। हैदराबाद के मेडिकवर हॉस्टिपल में डॉक्टरों ने उसकी जांच की। मरीज में खून में जमने वाले कारकों की कमी थी, जिससे वह गंभीर ब्लीडिंग डिसऑर्डर का शिकार हो गया था। उसे गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस हृदय वॉल्व का संकुचन भी था। इससे दिल से प्रवाह को नियंत्रित करने वाला वॉल्व जाम हो जाता है। साथ ही रोगी को सांस लेने में भी तकलीफ थी। मेडिकवर इंडिया के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक डॉ. अनिल कृष्णा ने कहा, "सर्जरी के दौरान ब्लीडिंग के जोखिम के साथ-साथ फेफड़ों की एक गंभीर बीमारी ने मरीज का वॉल्व बदलने के लिए सर्जरी की जरूरत पड़ी थी। इस कारण से डॉक्टरों ने ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वॉल्व रिप्लेसमेंट का विकल्प चुना।

क्या है ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वॉल्व रिप्लेसमेंट

ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वॉल्व रिप्लेसमेंट का मतलब है कि महाधमनी वॉल्व को छाती पर बिना किसी चीरे के बदला जा सकता है। यह कमर के जरिए से किया जाता है। ट्रांसकेथेटर एओर्टिक वॉल्व रिप्लेसमेंट एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें वॉल्व का प्रतिस्थापन उसी तरह किया जाता है, जैसे कार्डिक स्टेंट लगाया जाता है। इस प्रक्रिया में हार्ट या चेस्ट कैविटी को खोलने की जरूरत नहीं होती। इस प्रक्रिया में एक रोगग्रस्त एओर्टिक वॉल्व को मानव निर्मित वॉल्व से बदल दिया जाता है। हालांकि, मरीज की एओर्टिक गुर्दे की रक्त वाहिकाओं के नीचे और कमर में धमनी के नीचे दाएं ओर संकुचन था। जिस वजह से बाएं कमर से वॉल्व को बदलने का फैसला किया।

इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. एम.एस.एस. मुखर्जी ने कहा, "चूंकि उसके पास वॉल्व में अधिक कैल्शियम नहीं था, उसे वॉल्व के पहले गुब्बारे के फैलाव की आवश्यकता नहीं थी। हम वॉल्व के सीधे आरोपण के साथ आगे बढ़ सकते थे। पेसमेकर की आवश्यकता को कम करते हुए उसकी वॉल्व की स्थिति सही थी। जैसे ही वाल्व प्रत्यारोपित किया गया, एओर्टिक वॉल्व में दबाव प्रवणता सामान्य हो गई और यह प्रक्रिया की तत्काल सफलता का एक उपाय है। फिलहाल, मरीज स्वस्थ होकर घर जा चुका है। इसे आधुनिक चिकित्सा का चमत्कार कहा जा सकता है। टीएवीआर एक ऐसी प्रक्रिया है, जो एक बड़ी सर्जरी से बचाती है और अत्यधिक सह-मोर्बिडिटीज वाले रोगियों में भी सुरक्षित रूप से की जा सकती है।"

स्रोत: (IANS Hindi)

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