जन्म के 48 घंटे के अंदर शिशु की जरूर कराएं स्क्रीनिंग, समय रहते गंभीर बीमारियों से कर सकते हैं बचाव 

Newborn Screening  : जन्म के बाद शिशु को स्क्रीनिंग की जरूरत होती है। इससे गंभीर बीमारियों का समय पर इलाज करना संभव हो जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं इस बारे में-

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Written By: Kishori Mishra | Published : September 6, 2023 4:05 PM IST

Newborn Screening  : घर में शिशु का जन्म लेना चारों ओर एक नई खुशियां लाता है। जन्म के बाद से ही परिवार का लगभग हर सदस्य शिशु की हर छोटी से छोटी बातों का विशेष ध्यान रखता है, ताकि नवजात को किसी तरह की परेशानी न हो। लेकिन अगर आप एक नए पेरेंट्स बने हैं, तो आपको इस बात पर भी जोर देने की जरूरत है कि बड़ों की तरह नवजात को भी समय-समय पर जांच की जरूरत होती है। इससे बच्चों को होने वाली किसी भी तरह की गंभीर परेशानी को रोका जा सकता है। इस लेख में हम न्यूबर्ग डायग्नोस्टिक सेंटर के डॉक्टर विज्ञान मिश्रा से नवजात शिशु की जांच के महत्व और इसके द्वारा पहचानी जाने वाली स्थितियों, स्क्रीनिंग प्रक्रिया और शिशुओं के स्वास्थ्य पर होने वाले प्रभाव के बारे में विस्तार से जानेंगे। आइए जानते हैं इस बार में-

नवजात शिशु की जांच का क्या है महत्व? - Importance of Newborn Screening

नवजात शिशु की जांच उन स्थितियों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है जो जन्म के समय स्पष्ट नहीं हो सकते हैं। अगर आप समय पर शिशु की जांच कराते हैं, तो इससे समस्याओं को जल्द से जल्द स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है। साथ ही इससे गंभीर जटिलताओं या यहां तक कि मृत्यु का जोखिम भी कम किया जा सकता है। 

जांच के द्वारा गंभीर स्थितियों की जल्द पहचान करके, शिशु का ट्रीटमेंट समय पर शुरू किया जा सकता है। इससे सही उपचार और प्रबंधन योजनाएं लागू करने में मदद मिल सकती है। 

नवजात शिशु की स्क्रीनिंग में किन बीमारियों की होती है जांच

नवजात शिशु की जांच आनुवंशिक, मेटाबॉलिज्म और हार्मोनल डिजीज को पहचानने के लिए एक विशेष श्रृंखला में जांच की जाती है, जिसमें कुछ डिजीज के लिस्ट निम्न निम्न हैं,

फेनिलकेटोनुरिया (पीकेयू) : पीकेयू एक वंशानुगत डिजीज है, जो फेनिलएलनिन नामक अमीनो एसिड को संसाधित करने की शरीर की क्षमता को प्रभावित करता है। अगर इसका समय पर इलाज न किया जाए, तो बच्चे में बौद्धिक विकलांगता और अन्य तंत्रिका संबंधी समस्याओं को जन्म दे सकता है।

जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म: यह स्थिति तब होती है जब थायरॉयड ग्रंथि पर्याप्त थायराइड हार्मोन का उत्पादन नहीं करती है। सामान्य वृद्धि और विकास के लिए प्रारंभिक पहचान और उपचार महत्वपूर्ण हैं

सिकल सेल डिजीज : सिकल सेल रोग एक वंशानुगत ब्लड डिअऑर्डर है जो लाल रक्त कोशिकाओं के आकार और कार्य को प्रभावित करता है। इसका समय पर निदान करके सही इलाज शुरू करना बहुत ही जरूरी है।

सिस्टिक फाइब्रोसिस : सिस्टिक फाइब्रोसिस फेफड़ों और पाचन तंत्र को प्रभावित करता है। टेस्ट के माध्यम से  नवजात शिशु की इस स्थिति की शीघ्र पहचान करने में मदद मिल सकती है, जिससे जल्द से जल्द इलाज शुरू किया जा सकता है।

कैसे होती है नवजात शिशु की समस्याओं की जांच?

नवजात शिशु की जांच में आमतौर पर जन्म के पहले 48 घंटों के भीतर बच्चे की एड़ी से ब्लड की कुछ बूंदें एकत्र की जाती हैं। इस ब्लड के सैंपल को  प्रयोगशाला में भेजा जाता है, जहां संभावित स्वास्थ्य स्थितियों के विभिन्न मार्करों और संकेतकों के लिए इसका विश्लेषण किया जाता है।

नवजात शिशु की जांच बेहद जरूरी है। इसलिए नए पैरेंट्स को बच्चों के इन जांचों का बारे में पता होना बहुत ही जरूरी है। 

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