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Written By: Anshumala | Published : June 1, 2018 11:39 AM IST
अक्सर लोग सांस लेने में तकलीफ, थकान, उल्टी, टखनों में सूजन की शिकायतों को नजरअंदाज कर देते हैं, मगर ये दिल की बीमारी के भी लक्षण हो सकते हैं। यह कहना है अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली के हृदयरोग विभाग के प्रोफेसर और हृदय-प्रत्यारोपण विंग के प्रमुख हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर संदीप सेठ का। उनका कहना है कि हृदय रोग के बढ़ते खतरों से बचाव के लिए जागरूकता जरूरी है।
लाइलाज नहीं है दिल का रोग
दिल के मरीज और उनके इलाज के मसले पर डॉ. सेठ ने कहा कि दिल की बीमारी कोई लाइलाज बीमारी नहीं है। देश में आज हर तरह के दिल के मरीजों का इलाज संभव है, मगर एहतियात सबसे ज्यादा जरूरी है। ऐहतियात नहीं बरतने और वक्त पर इलाज नहीं होने पर दिल की बीमारी से पीड़ित मरीजों को बचाना मुश्किल हो जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक, भारत में दिल की बीमारी की पहचान होने के एक साल के भीतर करीब 23 फीसदी मरीजों की मौत हो जाती है।
अन्य बीमारियों पर पाना होगा काबू
दिल की बीमारी के खतरों को कम करने के लिए मरीजों को डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, सांस व फेफड़े संबंधी अन्य तकलीफों को नियंत्रण में रखना जरूरी होता है। डॉ. सेठ ने कहा, "सांस लेने में तकलीफ, थकान, उल्टी, टखनों में सूजन की शिकायतों को लोग अक्सर नजरंदाज कर देते हैं, लेकिन ये दिल की बीमारी के भी लक्षण हो सकते हैं। दिल संबंधी बीमारी की जांच करवानी चाहिए।"
शुरू होगा लंग ट्रांसप्लांटेशन
डॉ. सेठ ने बताया कि एम्स में इस साल फेफड़े का प्रत्यारोपण (Lung transplantation) भी शुरू हो जाएगा। इसके लिए फेफड़ा रोग विभाग की तैयारी तकरीबन पूरी हो चुकी है और साल के अंत तक मरीजों में फेफड़े का प्रत्यारोपण किया जाएगा। फेफड़ा व हृदय के प्रत्यारोपण के लिए डोनर मिलना चुनौतीपूर्ण कार्य है, क्योंकि ऐसे अंग दुर्घटना के शिकार हुए लोगों के ब्रेन डेड होने पर ही दान किए जाते हैं। लिहाजा, उनके परिजनों द्वारा तत्काल अंगदान के लिए फैसला लेना काफी महत्वपूर्ण होता है।
खर्च कम नहीं
हृदय प्रत्यारोपण में करीब 10 लाख रुपये खर्च होते हैं, जिसमें सर्जरी पर 1.5 लाख से दो लाख रुपये खर्च होते हैं। उससे पहले जांच में 20,000-30,000 रुपये खर्च होते हैं। सर्जरी के बाद दो साल तक दवाई और मरीज की देखभाल, पोषण पर खर्च है। उन्होंने बताया कि गरीबों के इलाज के लिए सरकार पैसे देती है। हृदय प्रत्यारोपण की तुलना में फेफड़े के प्रत्यारोपण पर तकरीबन तीन गुना ज्यादा खर्च होता है।
बच्चों में दिल की बीमारी
आमतौर पर दिल की बीमारी 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखी जाती है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बच्चों को दिल की बीमारी नहीं होती है। कई बच्चों को जन्म से भी दिल की बीमारी होती है। दिल्ली के डाबरी इलाके के सूर्य प्रकाश का डॉ. सेठ ने 11 साल की उम्र में ही हृदय-प्रत्यारोपण किया था। सूर्य प्रकाश के माता-पिता ने बताया कि उन्हें अपने बेटे को लेकर साल भर कई अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े, मगर कहीं इलाज नहीं हो पाया। अंत में जब उसे एम्स रेफर किया गया तब डॉ. सेठ ने उन्हें तसल्ली दिलाई और आज सूर्य प्रकाश सामान्य बच्चों की तरह अपनी पढ़ाई कर रहा है। सूर्य प्रकाश डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी का मरीज था। इलाज कठिन था, मगर उसमें हृदय प्रत्यारोपण किया गया, जोकि कामयाब रहा। अब वह स्वस्थ है।
इलाज में योग भी है कारगर
डॉ. सेठ ने बताया कि हृदय रोगियों के इलाज के लिए योग भी कारगर साबित हुआ है। योगाचार्य द्वारा बताई गई योग की विभिन्न विधियों में जो हृदयरोगी को नुकसान देने वाली है, उनको हटाकर हमने एक विशेष योग पद्धति बनाई है, जिसे 'क्रयोग' नाम दिया गया है। क्रयोग यानी ''कार्डियेक रिहैब''। योग से दिल की बीमारी पर नियंत्रण पाने वाली सुनीता का इलाज डॉ. सेठ की निगरानी में ही चल रहा है। सुनीता ने बताया कि क्रयोग से उन्हें लाभ मिला है।
स्रोत:IANS Hindi.
चित्रस्रोत: Shutterstock.