2 घंटों के बाद, स्क्रीन पर बिताया गया हर घंटा 20% तक बढ़ाता है स्ट्रोक का खतरा, इस तरह बचाएं खुद को

जबसे दुनिया कोविड महामारी के घेरे में फंसी है, कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसी के साथ लोगों के बीच स्क्रीन का इस्तेमाल बहुत ज्यादा बढ़ गया है, जो खुद में एक नई महामारी की तरह है। पहले, स्ट्रोक 60 से अधिक उम्र के लोगों की बीमारी हुआ करती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में युवा आबादी में स्ट्रोक अटैक के कई मामले देखने को मिले हैं।

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Written By: Rashmi Upadhyay | Updated : October 26, 2020 8:10 PM IST

जबसे दुनिया कोविड महामारी के घेरे में फंसी है, कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसी के साथ लोगों के बीच स्क्रीन का इस्तेमाल बहुत ज्यादा बढ़ गया है, जो खुद में एक नई महामारी की तरह है। पहले, स्ट्रोक 60 से अधिक उम्र के लोगों की बीमारी हुआ करती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में युवा आबादी में स्ट्रोक अटैक के कई मामले देखने को मिले हैं। एक हालिया अध्ययन के अनुसार, हालांकि, पिछले कुछ सालों में स्ट्रोक के मामले कम हुए हैं, लेकिन कम उम्र (25-45 साल) के लोगों में स्ट्रोक के मामले बढ़ते नज़र आए हैं। अमेरिका व अन्य विकसित देशों की तुलना में, भारत में स्ट्रोक से ग्रस्त युवा आबादी की संख्या दोगुनी है।

अनुमान के अनुसार, विश्व स्तर पर प्रति 40 सेकेंड में एक व्यक्ति स्ट्रोक से ग्रस्त पाया जाता है और प्रति 4 मिनट में एक व्यक्ति स्ट्रोक के कारण मर जाता है। दरअसल, स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है। वहीं अब स्ट्रोक को भी इसके साथ जोड़ दिया गया है।

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स्क्रीन का जितना ज्यादा इस्तेमाल, स्ट्रोक का उतना ज्यादा खतरा

अमेरिका के हालिया अध्ययन के अनुसार, डिजिटल स्क्रीन के इस्तेमाल का समय हमारे जीवनकाल पर सीधा असर डालता है। अध्ययन के अनुसार, एक घंटा डिजिटल स्क्रीन का इस्तेमाल हमारी जिंदगी से 22 मिनट कम कर देता है। स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल पार्ट अटैक, स्ट्रोक और कैंसर का कारण बन सकता है। यूनाइटेड किंगडम के एक बड़े अध्ययन, जो लगभग 40,000 प्रतिभागियों के साथ किया गया था, यह बताता है कि जो लोग स्क्रीन का इस्तेमाल दिन में 2 घंटे से ज्यादा करते हैं उनमें स्ट्रोक का खतरा ज्यादा होता है। शारीरिक सक्रियता (हफ्ते के सातों दिन 1 घंटे की वॉक) इस असर को कम करती है। यहां तक कि स्क्रीन के ज्यादा इस्तेमाल से कैंसर का खतरा भी बढ़ता है।

इस बात का रखें विशेष ध्यान

डॉक्टर विपुल गुप्ता, निदेशक, न्युरोइंटरवेंशन, अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेस, आर्टमिस अस्पताल, गुरूग्राम कहते हैं कि 2 घंटों के बाद, स्क्रीन पर बिताया गया हर घंटा स्ट्रोक के खतरे को 20% तक बढ़ाता है, जो युवाओं के बीच स्ट्रोक का एक आम कारण बना हुआ है। सोने जा रहे हैं तो नीली लाइट वाले उपकरणों का इस्तेमाल करने से बचें। रात में ऐसे उपकरण इस्तेमाल करने से समय पर नींद नहीं आती है, परिणामस्वरूप स्ट्रोक का खतरा बढता है।

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कम उम्र में स्ट्रोक के कारण

स्ट्रोक के अन्य मुख्य कारणों के अलावा, शारीरिक गतिहीनता भी कम उम्र में स्ट्रोक का कारण बनता है। नियमित रूप से किया गया व्यायाम न सिर्फ समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायक होता है बल्कि शरीर को कई बीमारियों से दूर रखता है। स्ट्रोक को बढ़ावा देने वाली अन्य बीमारियों में उच्च रक्तचाप, डायबिटीज़ और हाई कोलेस्ट्रॉल शामिल है।

उच्च-रक्तचाप और स्ट्रोक में संबंध

उच्च-रक्तचाप स्ट्रोक के सबसे बड़े कारणों में से एक है, जो इस्केमिक स्ट्रोक (ब्लॉकेज के कारण) और हेमरेज स्ट्रोक (मस्तिष्क में ब्लीडिंग) के 50% मामलों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है। नियमित एक्सरसाइज़ ब्लड प्रेशर को संतुलित करने में मदद करती है, जिसके साथ स्ट्रोक का खतरा 80% तक कम हो जाता है। यह तो स्पष्ट है कि, डायबिटीज़ के मरीजों में स्ट्रोक का दुगना खतरा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शरीर में ज्यादा शुगर सभी बड़ी रक्त वाहिकाओं को नष्ट कर देता है, जो इस्केमिक स्ट्रोक का कारण बनता है। नियमित व्यायाम न सिर्फ शुगर के स्तर को कम करता है बल्कि उनमें स्ट्रोक के खतरे को भी कम करता है।

हाई कोलेस्ट्रॉल और स्ट्रोक

हाई कोलेस्ट्रॉल भी स्ट्रोक के मुख्य कारणों में गिना जाता है। खराब कोलेस्ट्रॉल की अधिक मात्रा धमनियों में परत के खतरे को बढ़ाती है, जो आगे चलकर क्लॉट का कारण बनता है। यह क्लॉट रक्त प्रवाह को बाधित करता है, जो स्ट्रोक का कारण बनता है। एक्सरसाइज़ में कमी शरीर के साथ मस्तिष्क पर भी बुरा असर डालता है। नियमित व्यायाम और संतुलित आहार के साथ शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करके अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाया जा सकता है।

स्ट्रोक का इलाज संभव है

समय पर इलाज के साथ, स्ट्रोक के मरीज को ठीक करना संभव है। लगभग 70% मामलों में इसके लक्षणों को कम या पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। सही इलाज में एक मिनट की देरी भी मस्तिष्क की 20 लाख कोशिकाओं को नष्ट कर देती है, इसलिए समय पर इलाज कराना आवश्यक है। स्ट्रोक के उचित इलाज के लिए मरीज को अटैक के 6 घंटों के अंतर्गत अस्पताल लाना जरूरी है। इसके बाद लगभग 80% मामलों में मरीज विकलांगता का शिकार बनता है। हालिया प्रगति और इमेजिंग तकनीकों के साथ, अब स्ट्रोक के सफल इलाज के लिए अटैक के पहले 24 घंटे बेहद जरूरी माने जाते हैं।

स्ट्रोक के लक्षण

स्ट्रोक की शुरुआती पहचान इलाज को आसान और परिणामों बेहतर कर देती है। स्ट्रोक के लक्षणों को फास्ट कहा जाता है, यानी कि उतरा हुआ चेहरा, हाथों में कमज़ोरी, बोलने में मुश्किल शामिल हैं। टेक्नोलॉजी और विशेषज्ञता में प्रगति के साथ, मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं को मिनिमली इनवेसिव न्यूरो-इंटरवेंशन तकनीक की मदद से फिर से सही किया जा सकता है।