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यह सच है कि भारत के ज्यादातर राज्यों में शराब पीना लीगल है। हालांकि इसके लिए उम्र सीमा, नियम और कानून पूरी तरह से बने हुए हैं जिनका सभी को पालन भी करना चाहिए। लेकिन एक सरकारी आंकड़े ने इस बात की पोल खोल दी है कि लोग शराब पीने और नशा करने के खिलाफ बने कानून और सजा से डर तो लोग उनसे इत्तेफाक़ भी नहीं रखते हैं। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के एक सर्वे के मुताबिक भारत में करीब 1.48 करोड़ बच्चे अलग-अलग तरह के नशे की गिरफ्त में हैं। शराब, अल्कोहल, अफीम, कोकीन और भांग आदि जैसी नशीली चीजों का सेवन करने वाले बच्चों की उम्र 10 से 18 साल के बीच है।
ये नशा बच्चे शामक पदार्थों, सूंघकर या कश लगाकर नशा करते हैं। इन नशीली चीजों का असर न सिर्फ बच्चों के शरीर पर पड़ रहा है बल्कि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। नतीजा यह है कि जो मानसिक बीमारियां लोगों को व्यस्क होने पर होती थी उनकी चपेट में आजकल बच्चे तेजी से आ रहे हैं। इन चौंकाने वाले आंकड़ों से आप समझ रहे हैं होंगे भारत का 'भविष्य' कितना खतरे में है। 10 अक्टूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ थे (World Mental Health Day) मनाया जाता है, जिसका मकसद लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के बारे प्रति जागरुक करना होता है। आज हम इस मौके पर आपको बताएंगे कि नशे की गिरफ्त में आने से बच्चे किस तरह और किन मानसिक रोगों का शिकार हो रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत की लगभग 30 प्रतिशत आबादी नियमित रूप से शराब का सेवन करती है। अगर सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की बात करें तो यहां शराब पीने की लीगल उम्र 25 साल है। इसके बावजूद भारी संख्या में लोग 25 बल्कि 18 की उम्र से पहले ही शराब पीना शुरू कर देते हैं। नशे के खिलाफ काम करने वाली और शराब पीकर काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन एनजीओ फॉर द ड्रग ड्राइविंग (सीएडीडी) द्वारा हाल ही में किए गए एक सर्वे से पता चलता है कि 25 साल की उम्र से नीचे के 88% से अधिक युवा अवैध रूप से शराब का सेवन करते हैं या खरीदते हैं। सर्वे के अनुसार, युवाओं में 18 वर्ष की आयु से पहले ही शराब का सेवन करने की लगभग 23% (2,310) घटनाएं सामने आती हैं। अफसोस की बात ये है कि गैरकानूनी रूप से शराब पी रहे इन बच्चों के पेरेंट्स इस बात से अनजान हैं। हालांकि शराब न पीने वाले अंडर-15 लड़कों का प्रतिशत 44 प्रतिशत से घटकर 30 प्रतिशत हो गया है और लड़कियों के लिए यह 50 प्रतिशत से घटकर 31 प्रतिशत हो गया है।
बच्चों में जिस तरह नशा करने की लत आम होती जा रही है उसी तरह से उनमें कुछ मानसिक बीमारियां भी आम हो रही हैं। जब बच्चा नशा करता है तो उसका सीधा असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। डिप्रेशन, एंग्जाइटी, कॉन्फीडेंस की कमी, भावनात्मक कमजोरी, नर्वसनेस और आक्रामक स्वभाव जैसी मानसिक समस्याएं बच्चों में आम होती जा रही हैं। पिछले कई सालों से बच्चों में डिप्रेशन और एंग्जाइटी के मामलों में भी इजाफा हुआ है। यदि समय पेरेंट्स और सरकार द्वारा इस ओर ध्यान नहीं दिया गया या जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति बहुत भयावह हो सकती है।
बच्चों द्वारा तेजी से नशे की तरह बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं। सबसे पहला और बड़ा कारण यह है कि जब बच्चा अपने घर में या अपने आसपास किसी को नशा करता देखता है तो वह उससे प्रभावित होकर खुद भी इसमें शामिल होना चाहता है। बच्चे चीजों को बहुत जल्दी आब्जर्व करते हैं। जब वह किसी को नशा करने के बाद मस्ती करता हुआ, हंसता हुआ, झूमता हुआ या खुश देखते हैं तो वह खुद को भी उसी स्थिति में देखना चाहते हैं। इसके अलावा पेरेंट्स द्वारा बच्चों को डांटना, पढ़ाई का दबाव, दूसरे बच्चों के साथ उनकी तुलना, उनकी पर्सनल लाइफ में दखल, जनरेशन गैप, समाज का दबाव, उनकी मांगे पूरी न करना और तनाव आदि बच्चों को तेजी नशे की तरफ ले जा रहा है।
जब बच्चा शराब पीता है या किसी दूसरी नशीली चीज का सेवन करता है तो उसके शरीर में कुछ लक्षण जरूर दिखते हैं। पेरेंट्स होने के नाते आपकी ये जिम्मेदारी बनती है कि आप बच्चे की हर गतिविधि पर नजर रखें और गलत लक्षण दिखने पर जरूरी कदम उठाएं। जब कोई बच्चा नशा करता है तो उसके स्वभाव में आने वाले परिवर्तनों में चिड़चिड़ापन, शारीरिक कमजोरी, भूख की कमी, एनर्जी की कमी, सिर में दर्द रहना, अकेले वक्त बिताना, जरूरत से ज्यादा गुस्सा करना, वजन कम होना और पेट संबंधी समस्याएं होने लगती हैं। यदि आपको अपने बच्चे में ये लक्षण दिखें तो तुरंत किसी डॉक्टर से या काउंसलर से संपर्क करें।