
अंजू रावत
अंजू रावत एक अनुभवी हेल्थ, फिटनेस, रिलेशनशिप, ब्यूटी और लाइफस्टाइल लेखक हैं, जिन्हें इन विषयों पर लिखने ... Read More
Written By: Anju Rawat | Updated : April 30, 2026 1:21 PM IST
Medically Verified By: Dr. Amit Bhushan Sharma
heart beat rate- ai generated image
क्या आपकी दिल की धड़कन भी तेज रहती है? अगर हां, तो कहीं इस संकेत की अनदेखी आप पर भारी न पड़ जाए। दरअसल, हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि दिल की तेज धड़कन, भविष्य में कुछ बीमारियों और स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा सकता है। जैसा की- 42 वर्षीय आशुतोष (बदला हुआ नाम) के साथ हुआ। आशुतोष को पिछले कुछ समय से दिल की तेज धड़कन महसूस हो रही थी, लेकिन वह इसे नजरअंदाज करते गए और बाद में यह गंभीर बीमारी बन गई।
दरअसल, आशुतोष के दिल की धड़कन अचानक तेज हो जाती थी। लेकिन, उन्होंने इस संकेत पर कभी ध्यान नहीं दिया। जब एक दिन उनके दिल की धड़कन काफी तेज, बीपी कम (70/40 mmHg) और तेज चक्कर आने लगे, तब उन्हें अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में उनकी कंडीशन को देखकर आपातकालीन उपचार शुरू किया गया। समय पर इलाज मिलने से उनकी हालत स्थिर हुई और बाद में उनका डिस्चार्ज भी हो गया। हालांकि, आशुतोष को डायबिटीज और हाई बीपी से जुड़ी कोई समस्या नहीं थी।
पारस हेल्थ, गुरुग्राम के वरिष्ठ सलाहकार इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट और इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिस्ट डॉ. नदीम यू रहमान ने बताया कि एट्रियल फाइब्रिलेशन हृदय की पंपिंग क्षमता को काफी कम कर देता है। इसकी वजह से ब्लड प्रेशर अचानक गिरता है और चक्कर आने लगते हैं। ऐसे मामलों में तुरंत इलाज की जरूरत होती है, वरना यह स्थिति जानलेवा हो सकती है।
पारस हेल्थ गुरुग्राम के डायरेक्टर और यूनिट हेड, कार्डियोलॉजी-इंटरवेंशनल डॉ. अमित भूषण शर्मा बताते हैं, "आशुतोष के दिल की धड़कन तेज रहती थी, जब जांच की गई तो एट्रियल फिब्रिलेशन (Atrial Fibrillation) बीमारी का निदान हुआ। इसमें दिल की धड़कन सामान्य से अधिक हो जाती है। इसकी वजह से खून के थक्के बनने का खतरा बढ़ जाता है। अगर थक्का दिमाग तक पहुंचता है, तो स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे मरीजों को तुरंत Electrical Cardioversion करना जरूरी होता है, वरना यह जानलेवा हो सकता है। इस चिकित्सा प्रक्रिया की मदद से दिल की धड़कन को सामान्य करने में मदद मिलती है।"
Dr. Amit Bhushan Sharma
एट्रियल फिब्रिलेशन हृदय की एक बेहद गंभीर बीमारी है। इसमें दिल के ऊपरी कक्ष यानी अटरिया बहुत तेज धड़कने लगता है। इस स्थिति में दिल की धड़कन सामान्य से काफी ज्यादा (150 से 200+ ज्यादा प्रति मिनट) हो सकती है। इस स्थिति में दिल की पंपिंग करने की क्षमता काफी कम हो जाती है। इससे ब्लड प्रेशर कम हो जाता है और व्यक्ति को चक्कर आने लगते हैं। इतना ही नहीं, यह स्ट्रोक और हार्ट फेलियर का खतरा भी बढ़ाता है।
एट्रियल फिब्रिलेशन के मरीज की स्थिति बेहद गंभीर थी। इस स्थिति में डॉक्टरों ने तुरंत Emergency Electrical Cardioversion किया। इसमें DC शॉक देकर दिल की धड़कन को सामान्य किया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद उनका ब्लड प्रेशर सामान्य हुआ और चक्कर आने भी बंद हो गए।
जब आशुतोष की स्थिति सामान्य हुई तो उनकी Echocardiography (इकोकार्डियोग्राफी) की गई, जिसमें दिल की संरचना सामान्य पाई गई। लेकिन, बीमारी की जटिलताओं को कम करने के लिए डॉक्टरों ने Radiofrequency Ablation की सलाह दी। उनके इलाज की पूरी प्रक्रिया को करने में करीब 3 घंटे 50 मिनट का समय लगा।
आपको बता दें कि Atrial Fibrillation सबसे आम प्रकार की Arrhythmia है। यह बीमारी आमतौर पर 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में देखने को मिलती है। वहीं, हाई बीपी के रोगियों में भी इसका खतरा ज्यादा रहता है। वैसे तो Radiofrequency Ablation के बाद 60 से 70 प्रतिशत लोगों में यह बीमारी ठीक हो जाती है। लेकिन, 30 प्रतिशत मामलों में यह बीमारी दोबारा हो सकती है।
अगर आपको ये लक्षण महसूस हो तो इनकी अनदेखी बिल्कुल न करें। दिल की धड़कन में गड़बड़ी सिर्फ बुजुर्गों की समस्या नहीं है। यह युवाओं और स्वस्थ दिखने वाले लोगों में भी हो सकती है। इसलिए समय पर जांच बहुत जरूरी है, इससे हार्ट फेलियर और स्ट्रोक के खतरे को कम किया जा सकता है।