
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Published : May 5, 2026 1:40 PM IST
Medically Verified By: Dr. Amit Goel
किडनी ट्रांसप्लांट
अगर परिवार के एक सदस्य की किसी छोटी या सीजनल बीमारी से तबीयत बिगड़ती है तो सभी परेशान हो जाते हैं। लेकिन अगर यही किडनी ट्रांसप्लांट हो तो ऐसा लगता है जैसे परिवार पर संकट आ गया हो। ऐसा इसलिए क्योंकि पेशेंट के अनुसार सही किडनी साइज मिलना बहुत ही मुश्किल होता है और उससे भी मुश्किल होता है किसी डोनर को ढूंडना। ऐसा ही कुछ मॉरीशस के 67-वर्षीय मरीज अमोद नजीर सहदुत के साथ हुआ।
बता दें कि अमोद नज़ीर सहदुत, लंबे समय से क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD), डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रहे थे। पिछले कुछ वर्षों में उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई और वे एंड-स्टेज किडनी फेलियर की ओर बढ़ रहे थे। अपने देश में सीमित इलाज विकल्पों के चलते परिवार ने बेहतर और स्पेशलाइज्ड ट्रीटमेंट के लिए भारत आने का निर्णय लिया। उन्होंने इलाज के लिए मैक्स हॉस्पिटल, गुरुग्राम को चुना और वहां पहुंच गए।
किडनी ट्रांसप्लांट केस स्टडी
किडनी ट्रांसप्लांट को पूरा करने के लिए डॉक्टर्स की एक टीम तैयार की गई। इसमें किडनी ट्रांसप्लांट, यूरोलॉजी, यूरो-ऑन्कोलॉजी और रोबोटिक सर्जरी विभाग के सीनियर डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉक्टर अमित गोयल शामिल थे। उन्हीं के नेतृत्व में यह ट्रांसप्लांट किया गया।
उसके साथ नेफ्रोलॉजी और किडनी ट्रांसप्लांट, विभाग के प्रिंसिपल डायरेक्टर डॉ. विशाल सक्सेना, तथा नेफ्रोलॉजी विभाग के कंसल्टेंट डॉ. योगेशमन आनंद के साथ साथ मल्टीडिसीप्लिनरी टीम ने मिलकर मरीज की जांच से लेकर रिकवरी तक पूरे इलाज को सफलतापूर्वक किया। आइए डॉक्टर की इस टीम से जानते हैं कि किडनी ट्रांसप्लांट के दौरान उनके सामने कौन-कौन सी चुनौतियां आईं?
डॉ. अमित गोयल- इस केस में सबसे बड़ी चुनौती मरीज की उम्र (67 वर्ष), पहले से मौजूद क्रॉनिक किडनी डिजीज, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और सही डोनर की उपलब्धता थी। प्रारंभिक जांच में पत्नी डोनर के रूप में फिट नहीं पाई गईं। ऐसे में उपयुक्त लिविंग डोनर मिलना सबसे अहम चुनौती था। बाद में छोटे भाई ने डोनर बनने का निर्णय लिया, जिससे ट्रांसप्लांट संभव हो पाया।
डॉ. विशाल सक्सेना- जी हां, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर किडनी फेलियर के प्रमुख कारणों में शामिल हैं और सर्जरी के दौरान जोखिम बढ़ा सकते हैं। ऐसे मरीजों में हार्ट हेल्थ, संक्रमण का खतरा, ब्लड शुगर कंट्रोल और रिकवरी पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। लेकिन सही प्री-ट्रांसप्लांट मूल्यांकन और अनुभवी टीम के साथ इन जोखिमों को सफलतापूर्वक मैनेज किया जा सकता है।
डॉ. योगेशमन आनंद- पोस्ट-ट्रांसप्लांट केयर उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी सर्जरी। नई किडनी शरीर स्वीकार करें, इसके लिए नियमित जांच, दवाएं, इम्यूनोसप्रेसिव थेरेपी, इंफेक्शन से बचाव और ब्लड टेस्ट बेहद जरूरी होते हैं। हमने मरीज की लगातार मॉनिटरिंग की, दवाओं की सही डोज तय की और परिवार को हर चरण में गाइड किया।
डॉ. अमित गोयल- एंड-स्टेज किडनी फेलियर में दो मुख्य विकल्प होते हैं- डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट। अगर मरीज फिट है और डोनर उपलब्ध है, तो ट्रांसप्लांट बेहतर विकल्प माना जाता है क्योंकि इससे जीवन की गुणवत्ता, स्वतंत्रता और लॉन्ग-टर्म सर्वाइवल बेहतर होती है।
डॉ. विशाल सक्सेना- उम्र अकेले जोखिम तय नहीं करती। मरीज की हार्ट हेल्थ, शुगर कंट्रोल, अन्य बीमारियां और फिजिकल फिटनेस ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। सही चयन और मेडिकल तैयारी के साथ बुजुर्ग मरीजों में भी ट्रांसप्लांट सुरक्षित और सफल हो सकता है।
डॉ. अमित गोयल- खर्च कई बातों पर निर्भर करता है- अस्पताल, मरीज की स्थिति, जांच, ICU स्टे, दवाएं और पोस्ट-ऑपरेटिव केयर। भारत में सामान्यतः यह खर्च कुछ लाख रुपये से शुरू होकर केस की जटिलता के अनुसार बढ़ सकता है। सही आंकड़ा अस्पताल मूल्यांकन के बाद बताया जा सकता है।
डॉ. योगेशमन आनंद- समय पर दवाएं लेना, डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच करवाना, साफ-सफाई रखना, भीड़भाड़ और संक्रमण से बचना, पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना, धूम्रपान/शराब से बचना और ब्लड प्रेशर-शुगर कंट्रोल रखना बेहद जरूरी है।
डॉ. अमित गोयल- आधुनिक तकनीक और बेहतर दवाओं के कारण आज किडनी ट्रांसप्लांट का सक्सेस रेट काफी अच्छा है। लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट में शुरुआती सफलता दर 90-95% तक देखी जाती है। लंबी अवधि की सफलता मरीज के अनुशासन और फॉलोअप पर निर्भर करती है।
डॉ. विशाल सक्सेना- सबसे पहले मरीज और डोनर की विस्तृत जांच होती है- ब्लड ग्रुप, टिशू मैचिंग, किडनी फंक्शन, हार्ट फिटनेस आदि। इसके बाद कानूनी और मेडिकल क्लियरेंस लिया जाता है। सर्जरी में डोनर से किडनी निकालकर मरीज के शरीर में लगाई जाती है। पुरानी किडनी अक्सर वहीं रहती है, नई किडनी नीचे की तरफ फिट की जाती है। सर्जरी के बाद ICU/वार्ड में निगरानी, दवाएं और नियमित फॉलोअप किया जाता है।
डिस्क्लेमर- ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं है कि अगर आपको किडनी से जुड़ी कोई बीमारी है तो किडनी ट्रांसप्लांट ही किया जाएगा। इसके लिए जरूरी है कि आप खुद अंदाजा लगाने की बजाय डॉक्टर के पास अपनी समस्या लेकर जाएं। वह सही से जांच करेंगे और उपयुक्त इलाज भी बताएंगे।
मरीजों की एक मात्र काम करती किडनी को यदि किसी कारण से नुकसान पहुँचे तो दूसरी किडनी नहीं होने के कारण शरीर का काम पूरी तरह रुक जाता है।
एक किडनी होने से जीवन प्रत्याशा में कोई निश्चित समयसीमा या कमी नहीं होती, लेकिन जीवनशैली के विकल्प इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
किडनी ट्रांसप्लांट आमतौर पर जीवित दाता से होने पर 15-20 साल तक चलता है। अगर डोनर परिवार का सदस्य हो, तो यह 20-25 साल या इससे भी अधिक समय तक काम कर सकता है। मृत दाता से प्राप्त किडनी औसतन 8-12 साल तक काम कर सकती है।
किडनी ट्रांसप्लांट एक शल्य चिकित्सा है, जिसमें किसी मृत या जीवित दाता से स्वस्थ किडनी लेकर किडनी फेलियर (ESRD) वाले व्यक्ति के शरीर में लगाई जाती है।
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