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5 तरह का होता है अस्थमा! एक्सपर्ट से जानिए कौन सा अस्थमा किस उम्र के लोगों को करता है परेशान
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि अस्थमा रोग एक ऐसी स्वास्थ्य स्थिति है, जो आम तौर पर एलर्जी से संबधित है और ये एलर्जी वातावरण में मौजूद धूल-कण, धुएं जैसी प्रदूषक के कण हमारे सांस लेने के साथ ही श्वास नली में पहुंच जाते हैं, जिससे सांस लेने में दिक्कत होती है। ये स्थिति धीरे-धीरे अस्थमा का रूप ले लेती है। डॉ. अनिमेष आर्य, सीनियर कंसलटेंट, रेस्पिरेटरी मेडिसिन, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टिट्यूट बताते हैं कि अस्थमा के मरीजों सांस की नली में सूजन आ जाती है, जिसके कारण उनकी सांस की नली सिकुड़ जाती है और उन्हें सांस लेने में दिक्कत होती है। आइए जानते हैं कितने प्रकार का होता है अस्थमा और इससे कैसे बचा जा सकता है।
अगर आप या किसी भी व्यक्ति को धूल-मिट्टी के संम्पर्क में आने पर तुरंत ही सांस लेने में किसी प्रकार की दिक्कत महसूस होने लगती है तो निश्चित ही आप एलर्जिक अस्थमा के शिकार हो सकते हैं।
ये स्थिति तब पैदा होती है जब आप बहुत अधिक तनाव में होते हैं और आपको अचानक सर्दी लगने लगें या खांसी-जुकाम हो जाता है। इस स्थिति को नॉनएलर्जिक अस्थमा भी कहा जाता है।
आपने गौर किया होगा कि बहुत से लोगों को अधिक एक्सरसाइज और शारीरिक गतिविधि के कारण भी अस्थमा की परेशानी हो जाती है, जिसे एक्सरसाइज इनड्यूस अस्थमा भी कहते हैं।
इस स्थिति में अस्थमा के अटैक अचानक काम के दौरान पड़ता है। अगर आप नियमित रूप से एक ही तरह के काम करते हैं तो अक्सर आपको इस दौरान अटैक पड़नेलगते है, जिसे ऑक्यूपेशनल अस्थमा कहा जाता है।
ये स्थिति सिर्फ और सिर्फ बच्चों में ही देखी जाती है। इस स्थिति से पीड़ित बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है, इस प्रकार के अस्थमा से अपने आप ही बाहर आने लगता है। यह स्थिति गंभीर नहीं होती और उचित समय पर इलाज से बच्चे को बड़ी आसानी से बचाया जा सकता है।
डॉ. अनिमेष आर्य बताते हैं कि एक वयस्क के अस्थमा की चपेट में आने पर या फिर नॉन-एलर्जिक अस्थमा से पीड़ित व्यक्ति को मोटापे का सबसे ज्यादा खतरा रहता है। वहीं छोटे बच्चों में डर और तनाव उन्हें अस्थमा का शिकार बना देता है। दरअसल तनाव के कारण हार्मोन में गड़बड़ी हो जाती है, जिसके कारण मनुष्य के फेफड़े व श्वास तंत्र की नाड़ियां सिकुड़ने लगती हैं और उन्हें सांस लेने में परेशानी होती है।
डॉ. अनिमेष आर्य के मुताबिक, गर्भावस्था के दौरान अस्थमा अटैक गर्भवती महिला के लिए गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है, इसलिए जरूरी है कि वह प्रेगनेंसी के शुरू में ही अस्थमा की जांच कराएं। सही समय पर इलाज न मिलने से महिला और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता है। एक अध्ययन के मुताबिक, 10 प्रतिशत अस्थमा पीड़ित महिलाओं को गर्भवती होने में सामान्य महिलाओं की तुलना में अधिक समय लगता है।
दरअसल गर्भावस्था में महिलाओं का ब्लड प्रेशर हाई होने के कारण यूरिन में प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे भ्रूण को ऑक्सीजन की कमी होने लगती है। इस स्थिति में महिलाओं को अपनी अस्थमा के दवाएं लेती रहनी चाहिए। इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिलाओं को धूल, मिट्टी, धुंआ और दुर्गध आदि एलर्जी वाली चीजो से दूर रहना चाहिए।