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Written By: Jitendra Gupta | Published : February 3, 2021 3:07 PM IST
सिगरेट न पीने पर भी छाती में हो रही ये 5 दिक्कतें तो आपको हो गया है फेफड़ों का कैंसर, ऐसे पहचानें
हममें से ज्यादातर लोगों का यही मानना होता है कि धूम्रपान या तम्बाकू का सेवन न करने से हमें फेफड़े का कैसर नहीं हो सकता है। दुर्भाग्यरूप से यह तथ्य सत्य नहीं है। भारत में जो सिगरेट नहीं पीते हैं उनमे भी आज के समय में फेफड़े के कैंसर का पता चल रहा है। सबसे बुरी बात यह है कि धूम्रपान न करने वाले लोगों में लक्षण बहुत ही नगण्य या सूक्ष्म होते हैं इसलिए इस कैंसर का शुरुआत में पता चलना मुश्किल होता है। धूम्रपान न करने वालों को इस बीमारी से ग्रस्त होने का खतरा नहीं रहता है क्योंकि वह सोचते है कि वे धूम्रपान तो करते नहीं है इसलिए उन्हें तो कोई खतरा नहीं है।
हालांकि यह बात सही है कि धूम्रपान करना फेफड़े के कैंसर का सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर है। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि फेफड़े का कैंसर केवल उन्ही में हो जो धूम्रपान करते हो। अमेरिकन कैंसर सोसाइटी का अनुमान है कि लगभग 20% ऐसे लोग अमेरिका में हर साल कैंसर से मरते है जिन्होंने तम्बाकू का सेवन किसी भी रूप में कभी भी नहीं किया होता है। हालांकि हमारे पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है जिसमे यह पता लग सके कि भारत में इस तरह से कैंसर से पीड़ित होकर कितने लोग मरते हैं लेकिन ऑन्कोलॉजिस्ट को गैर-धूम्रपान करने वालों के बीच इस बीमारी के बढ़ने की स्पष्ट वृद्धि देखने को मिल रही है।
दिलचस्प रूप से यह देखा गया है कि धूम्रपान करने वालों और धूम्रपान न करने वालों में फेफड़े के कैंसर आनुवंशिक और आणविक स्तरों पर अलग-अलग होते हैं। दरअसल गैर-धूम्रपान वाले लोगों में फेफड़ों के कैंसर में महिलाएं ज्यादा है। गैर-धूम्रपान वाले कैंसर के मरीजों में कई फैक्टर होते है; कुछ फैक्टर में कार्सिनोजेन्स का किसी न किसी रूप में एक्सपोजर या जीन में कुछ परिवर्तन शामिल है। धूम्रपान न करने वाले फेफड़े के कैंसर के मरीज अक्सर युवा लोग होते हैं।
धूम्रपान और धूम्रपान न करने वाले व्यक्तियों में फेफड़े के कैंसर न केवल अलग-अलग होते हैं, बल्कि अलग-अलग रूप से विकसित होते हैं। फेफड़े के एडेनोकार्सिनोमा (जो एक प्रकार का नॉन-स्माल सेल होता है) गैर-धूम्रपानवाले लोगों में पाये जाने वाले फेफड़े के कैंसर का सबसे कॉमन टाइप हैं। आमतौर पर एडेनोकार्सिनोमा फेफेड़े के बाहर बढ़ने लगता है जबकि छोटे सेल कैंसर और स्क्वैमस सेल कैंसर वायुमार्ग के पास बढ़ते हैं।
लगभग सभी कैंसर का इलाज एक ही तरीके से किया जाता है। ऑन्कोलॉजिस्ट अब आनुवंशिक अंतर और विभिन्न प्रकार के कैंसर के ट्रिगर की गहरा अध्ययन कर रहे हैं। आनुवंशिक कैंसर ट्रिगर्स वाले मरीजों में ईजीएफआर म्यूटेशन और एएलके (एनाप्लास्टिक लिम्फोमा काइनेज) जैसे जीन कीमोथेरेपी की तुलना में रिअरेंजमेंट (पुनर्व्यवस्थापन) ट्रीटमेंट में बेहतर प्रतिक्रिया देते हैं। आमतौर पर ये जीन उत्परिवर्तन धूम्रपान न करने वाले लोगों में कैंसर को पैदा करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
बेंजीन, बेन्जोपाइरीन, नाइट्रोजन ऑक्साइड्स, सल्फर ऑक्साइड्स, कार्बन मोनोऑक्साइड और छोटे-छोटे दूषित खतरनाक वातावरण के कणों से कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं होती है। फेफड़े का कैंसर इन समस्याओं में से एक है। ऐसा अनुमान है कि हर साल वायु प्रदूषण से फेफड़ों की बीमारी और कैंसर के कारण 1.8 मिलियन लोग अपनी जान गवांते हैं। दुनिया भर में यह देखा गया है कि जिन शहरों में प्रदूषण ज्यादा होता है वहां पर फेफड़े के कैंसर के केस ज्यादा पाये जाते हैं। इंडस्ट्री से निकलने वाले धुंए और वाहनों के उत्सर्जन से शहरों में होने वाले वायु प्रदूषण को फेफड़े के कैंसर के लिए सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर माना गया है।
सेकेंड हैंड धुएं के संपर्क में आने से या रेडियोएक्टिव तत्व- यूरेनियम, आर्सेनिक या एस्बेस्टस जैसे कार्सिनोजेन्स के संपर्क में आने से भी फेफड़े का कैंसर हो सकता है।
जैसे कि ऊपर बताया गया है कि धूम्रपान न करने वाले लोगों में धूम्रपान करने वाले लोगों के मुकाबलें कैंसर अलग तरह से होता है। इसलिए कभी-कभी फेफड़े का कैंसर इस तरह के मरीजों में अलग-अलग तरह से दिखता है। जो लोग धूम्रपान नहीं करते हैं उनमे लक्षण बहुत सूक्ष्म होते हैं जैसे कि सांस लेने में रुकावट, थकान, खांसी के साथ पीठ में दर्द आदि। कभी-कभी इन लक्षणों को अन्य बीमारी का लक्षण मान लिया जाता है, इस वजह से इस बीमारी का पता जल्दी नहीं चल पाता है और इलाज भी संभव नहीं हो पाता है। वहीं दूसरी तरफ जो लोग धूम्रपान करते हैं उनमे लक्षण बहुत स्पष्ट रूप से दिखते हैं जैसे कि बहुत ज्यादा खांसी या खांसी में खून आना आदि। इससे आसानी से पता चल जाता है कि यह लक्षण फेफड़े के कैंसर का है। धूम्रपान न करने वाले लोगों में धूम्रपान करने वाले लोगों के मुकाबलें लक्षण अक्सर अंतिम स्टेज में दिखते हैं। इसके अलावा गैर-धुम्रपान वाले लोगों में रिस्क कम होता है कभी-कभी डाक्टर भी इस तरह के लक्षणों को नज़रअंदाज कर देते है।
चाहे आप धूम्रपान करें या न करें लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि किसी भी सांस से सम्बंधित परेशानी को हल्के में न लें। अगर नीचे लिखे गए लक्षणों को महसूस करते हैं तो तुरंत डाक्टर को सूचित करें।
- अगर दो हफ्ते से ज्यादा खांसी आ रही हो
- सांस लेने में कठिनाई
- सांस की तकलीफ के साथ क्रोनिक बीमारी या थकान
- सांस लेते समय दर्द होना
- बार-बार छाती में इन्फेक्शन होना
(इनपुटः पारस कैंसर सेंटर, पारस हेल्थकेयर के चेयरमैंन डॉ. (कर्नल) आर रंगा रॉव)