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पिछले कुछ समय से, हमारे देश की हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री या ‘बॉलीवुड’, ने पिंक, दंगल और हिंदी मीडियम जैसी फ़िल्मों के माध्यम से सामाजिक महत्व के विषयों पर रोशनी डालने का काम किया है। लेकिन फ़िल्म टॉयलेट: एक प्रेम कथा, के साथ फ़िल्म डायरेक्टर श्री नारायण सिंह ने चकाचौंध, रोमांस, विदेशी लोकेशन और एनआरआई से जुड़ी कहानियों से हटकर एक अस्वाभाविक विषय उठाया है, और वह बात कही है जिसे कहने की हिम्मत इससे पहले किसी फ़िल्म निर्माता ने नहीं की थी। यह विषय है: खुले में शौच करना और स्वच्छता।
फ़िल्म में अभिनेता अक्षय कुमार और भूमि पेडणेकर एक नवविवाहित जोड़े के रुप में नज़र आ रहे हैं, जिनकी शादी के दूसरे दिन ही टूटने की कगार पर आ जाती हैं, क्योंकि पत्नी का किरदार निभा रही भूमि पेडणेकर अपने पति का घर छोड़ देती हैं, जिसकी वजह है- वहां शौचालय नहीं होना। यह फ़िल्म स्वच्छता और खुले में शौच के मुद्दे पर वह वाजिब प्रश्न उठाती है जिसे देश की आज़ादी के समय से ही नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। खुले में शौच की समस्या सीधे तौर पर डायरिया, इंस्टेटाइन में कीड़े, हेपेटाइटिस और पोलियो जैसी गम्भीर बीमारियों के फैलने का कारण बनती है। लेकिन इस लेख में, मैं उन सामाजिक बीमारियों की तरफ आपका ध्यान खींचने की कोशिश करुंगी जिनका ख़तरा हमारे देश की औरतों (मर्दों पर भी) पर हमेशा बना रहता हैं। क्या आप यकीन करेंगे कि खुले में शौच करने गयी महिलाओं के साथ छेड़छाड़, बलात्कार और यहां तक कि हत्या जैसी घटनाएं होती रही हैं। ऐसी ही कुछ घटनाओं के बारे में मैं आपको आज बताती हूं।
मिशिगन विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं अपूर्व जाधव, अबीगैल वीज़मैन और एमिली स्मिथ ग्रीनवे ने 2016 ने एक स्टडी में यह निष्कर्ष निकाला है कि ऐसी महिलाएं जो खुले में शौच करने के लिए मजबूर हैं, उनके साथ शौचालयों का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की तुलना में सेक्चुअल हिंसा की संभावना दो गुना अधिक होती है। हमारे देश में हुई ऐसी ही 3 घटनाएं, जिनमें से 2 हाल ही में हुई हैं, जो साबित करती हैं कि अपराधियों ने शौचालयों की कमी का ग़लत फायदा महिलाओं पर हमला करने के लिए उठाया है।
3 साल पहले, उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में, ऊंची जाति के पुरुषों द्वारा शौच के लिए बाहर गयीं 2 युवा लड़कियों का बलात्कार और हत्या कर दी गई। 3 दिन पहले ही, एक व्यक्ति, ज़फ़र खान की पीट-पीटकर हत्या केवल इसलिए कर दी गयी क्योंकि ज़फ़र खान ने राजस्थान सरकार के अधिकारियों को खुले में शौट करती हुयी महिलाओं का वीडियो बनाने से रोक दिया था। दिखाते हुए उन्हें मार दिया था, उन्हें कोई मार दिया गया था। इसी तरह कल, शौच के लिए गयी एक 14 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार के बाद उसे रेलवे की पटरी पर मरने के लिए छोड़ दिया गया। ये महिलाओं के खिलाफ हिंसा की सच्चाई बताने वाली अनगिनत घटनाओं में से सिर्फ 3 घटनाएं हैं, लेकिन ऐसी बाकी घटनाओं की बात कभी सामने नहीं आती।
सोशल एक्टिविस्ट ज़फ़र खान जिन्हें राजस्थान के सरकारी अधिकारियों ने पीट-पीटकर मार डाला
भारत की महिलाओं के लिए, शौच जैसे प्राकृतिक और बुनियादी कार्य करना भी एक बहुत बड़ा संघर्ष है। भारत के ग्रामीण इलाकों में जहां शौचालय नहीं हैं, गांव की महिलाएं सुबह उजाला होने से पहले ही लोटा और टॉर्च लेकर जंगल में शौच के लिए जाती हैं। वह भी पुरुषों के जागने से पहले। अंधेरे का आवरण उन्हें उन लोगों से सुरक्षित रखता है जो महिलाओं को शौच करते हुए देखने जाते हैं। कभी-कभी, ये अधर्मी घूरने के साथ-साथ महिलाओं को छेड़ने और शर्मिंदा करने जैसी हरकतें भी करते हैं। जिज्ञासा या हमले को आगे बढ़ाते हैं
उड़ीसा जैसे राज्यों में, महिलाएं लगातार इस डर के साए में जीती हैं कि कहीं उन्हें कई देख न ले, उनपर रौशनी न डाले या कहीं उन पर बलात्कार के लिए हमला न कर दे। इसी डर की वजह से वह शौच जैसी मौलिक जरूरत से शामिल बचतीं फिरती हैं। इसी तरह की परिस्थितियों में बिहार में, महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले एक आम बात बन गए हैं। वास्तव में, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि अगर राज्य में उचित स्वच्छता की सुविधा होती तो 400 महिलाएं बलात्कार से बच सकती थीं। ऐसे तथ्यों पर ध्यान देने पर समझ में आता है कि, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया नारा, ‘शौचालय पहले, मंदिर बाद में' भी यहां खोखला ही साबित हो रहा है। कांग्रेस सरकार के टोटल सैनिटेशन कैम्पेन (टीएससी) के 25 साल बाद और एनडीए सरकार के स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने के 3 साल बाद, लाखों लोगों के लिए शौचालयों का आश्वासन दिए जाने के बाद भी लोगों के पास शौचालय की सुविधा नहीं है। लेकिन ज़्यादातर लोगों को इस नारे से कोई फायदा नहीं हुआ। भ्रष्टाचार और पैसों के लालच के चलते शौचालयों का निर्माण नहीं हुआ। यहां तक कि सरकार द्वारा लोगों के लिए शौचालय बनाए जाने के लिए दिए जा रहे पैसों का ग़लत इस्तेमाल दुरुपयोग हो रहा है, और सभी प्रयासों के बावजूद, लोग फिर से शौच करने के लिए खुले में जा रहे हैं। आप यह जानकर चौंक जाएंगे कि दुनियाभर में 42% लोगों के पास उचित सैनिटेशन की सुविधा नहीं है और शौचालयों से वंचित इस आबादी में से 59% लोग भारत के हैं।
मुझे विश्वास है कि टॉयलेट: एक प्रेम कथा उचित समय पर रिलिज हो रही है, जब खुले में शौच के कारण महिलाओं के खिलाफ हिंसक घटनाएं बहुत ज़्यादा बढ़ गयी हैं। यह सरकार के लिए एक सीधा संकेत है कि शौचालय बनवाने की दिशा में कुछ कड़े कदम उठाए जाएं। क्योंकि यह लोगों की खुले में शौच करने की समस्या को रोकने के साथ महिलाओं के खिलाफ हो रही यौन हिंसा पर भी काबू करने के लिए ज़रूरी है।
हम एक ऐसी जनता हैं, जो बड़े सपने देखती है और बेहतर भविष्ट की कल्पना करती है। लेकिन यह बड़े शर्म की बात है कि हमारी आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से के लिए, शौच जैसी प्राकृतिक क्रिया भी उनके अस्तित्व के लिए एक चुनौती बन गया है।
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अनुवादक-Sadhana Tiwari
चित्रस्रोत-YouTube/Viacom 18 Motion Pictures/Grazing Goat Pictures