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युवतियों में कैंसर की गांठ का पता लगाने में ज्‍यादा कारगर है थ्रीडी मैमोग्राफी

3 डी मैमोग्राम में बेहतर नतीजों के लिए ब्रेस्ट की कई तस्वीरें विभिन्न एंगलों से ली जाती हैं।

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Written By: Yogita Yadav | Updated : October 23, 2018 8:47 AM IST

स्‍तन कैंसर के बढ़ते मामलों में युवा महिलाएं भी इसकी चपेट में आ रही हैं। ऐसे में 3डी मैमोग्राफी युवा महिलाओं में स्तन कैंसर को पकड़ने में कारगर टूल के रूप में देखी जा रही है। स्तन कैंसर क्यों हो रहा है, इसके कारणों का हालांकि अभी पता नहीं लग पाया है, लेकिन यह तय है कि जितनी जल्दी इसका पता लगाया जाता है, ठीक होने के अवसर उतने ही बढ़ जाते हैं।

थ्री डी मैमोग्राफी

परंपरागत तौर पर मैमोग्राफी 2 डायमेंशनल ही होती है, जो ब्लैक एंड व्हाइट एक्सरे फिल्म पर नतीजे प्रदर्शित करती है। इसके साथ ही इन्हें कंप्यूटर स्क्रीन पर भी देखा जा सकता है। 3 डी मैमोग्राम में ब्रेस्ट की कई तस्वीरें विभिन्न एंगलों से ली जाती हैं, ताकि एक स्पष्ट और अधिक आयाम की इमेज तैयार की जा सके।

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इस तरह के मैमोग्राम की जरूरत इसलिए है, क्योंकि युवावस्था में युवतियों के स्तन के ऊतक काफी घने होते हैं और सामान्य मैमोग्राम में कैंसर के गठन का पता नहीं लग पाता है। 3  डी मैमोग्राम से तैयार किए गए चित्र में स्तन के टिश्यू के बीच छिपी कैंसर की गठान को भी पकड़ा जा सकता है।

और भी हैं कई फायदे

3डी मैमोग्राम के और कई फायदे हैं, जैसे कि ब्रेस्ट कैंसर की गांठ का जल्द से जल्द पता लगाकर उसका इलाज करना ही मैमोग्राम का मुख्य उद्देश्य है। इसके लिए 3डी इमेजिंग को काफी कारगर माना जाता है।

3डी मैमोग्राम की तस्वीरों और सीटी स्कैनिंग में काफी समानता है और इसमें मरीज को परंपरागत मैमोग्राफी की तुलना में काफी कम मात्रा में रेडिएशन का सामना करना पड़ता है।

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चालीस के बाद जरूरी है ये

40 साल उम्र के आसपास पहुंच रहीं महिलाओं को हर साल मैमोग्राफी करने की सलाह दी जाती रही है।  लेकिन अब उन्हें 3-डी इमेजिंग टैक्नोलॉजी का सहारा लेना चाहिए। इस टैक्नोलॉजी का फायदा हर उम्र की महिलाओं को मिल सकता है, लेकिन युवावस्था में कैंसर की गांठ यदि पकड़ में आ जाती है तो उसका कारगर इलाज करके मूल्यवान जान बचाई जी सकती है।

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ये है प्रक्रिया

3डी मैमोग्राफी करने का तरीका बिल्कुल 2डी मैमोग्राफी की ही तरह होता है।  इसमें महिला के स्तन को एक्सरे प्लेट और ट्यूबहेड के बीच रखकर कई एंगल से अनेक तस्वीरें ली जाती हैं। इस तरह की तस्वीरों को स्लाइसेस कहा जाता है। इतने बारीक अंतर से स्तन के फोटो स्लाइसेस बनाए जाते हैं कि उसकी निगाह से छोटी से छोटी कैंसर की गठान भी छिप नहीं पाती है और उजागर होकर स्क्रीन पर दिखाई देने लगती है।