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Written By: Jitendra Gupta | Published : September 28, 2021 6:13 PM IST
35 साल के इस शख्स के दिल ने 99 फीसदी तक काम करना कर दिया था बंद, डॉक्टरों ने दिया नया जीवनदान
खराब खान-पान और अव्यवस्थित जीवनशैली के कारण मौजूदा वक्त में युवाओं में कार्डियक अरेस्ट और हार्ट अटैक के मामले हाल के दिनों में काफी तेजी से बढ़े हैं। हार्ट अटैक का सीधा संबंध हमारे दिल के कमजोर होने से है लेकिन कम उम्र में ये समस्या किसी भी व्यक्ति के लिए परेशानी का सबब बन सकती है। कम उम्र में हार्ट अटैक कितना घातक हो सकता है इसका अंदाजा किसी को नहीं। इसी तरह का एक मामला दिल्ली के पटपड़गंज स्थित मैक्स सुपर स्पेशियल्टी हॉस्पिटल में देखने को मिला, जहां घातक हार्ट अटैक से पीड़ित 35 साल के एक युवक को अस्पताल लाया गया। डॉक्टरों के मुताबिक, उसे सही समय पर इलाज नहीं मिलता तो उसकी जान भी जा सकती थी।
डॉक्टरों ने 35 साल के पीड़ित व्यक्ति के अवरुद्ध कोरोनरी आर्टरीको खोलने के लिए रेडियल एंजियोप्लास्टी की और रेडियल आर्टरी या उस आर्टरी के जरिये उसमें रक्तप्रवाह सुचारु किया गया, जिसमें दिल से हाथ तक रक्तप्रवाह होता है। मैक्स हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने तत्परता से स्टेंट प्लेसमेंट करते हुए न सिर्फ उसकी स्थिति सुधारने में सफलता पाई बल्कि मरीज को मौत से भी उबार दिया।
इस प्रक्रिया को अपनाने की जरूरत बताते हुए मैक्स सुपर स्पेशियल्टी हॉस्पिटल, पटपड़गंज में कार्डियोलॉजी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. पवन कुमार ने कहा, 'इस खास मामले में यह विकल्प चुनना अहम रहा क्योंकि मरीज की मुख्य एलएडी आर्टरी 99 फीसदी तक अवरुद्ध हो चुकी थी। परंपरागत रूप से कोरोनरी एंजियोप्लास्टी के लिए फेमोरल आर्टरी रूट (जांघ के जरिये) अपनाया जाता है यानी आर्टरी से टांग तक रक्त आपूर्ति कराई जाती है। लेकिन इस मामले में जटिलता बढ़ने की संभावना थी और रक्तस्राव भी अधिक हो सकता था। रेडियल आर्टरी में एक आवरण या बड़ा आईवी प्रवेश कराया गया और छोटे कैथेटर या वायर को इसमें डालकर कोरोनरी आर्टरी तक पहुंचाया गया।
उन्होंने कहा कि तब हमने कोरोनरी आर्टरी देखने और ब्लॉकेज के साफ होने की जांच के लिए कम मात्रा में इंक डाई इंजेक्ट किया। ब्लॉकेज में स्टेंट के उचित जगह पहुंचना सुनिश्चित करने के लिए एक बैलून फुलाकर इसमें डाला गया, जिससे आर्टरी खुल गई और ब्लॉकेज की समस्या खत्म हो गई। इस प्रक्रिया में इन नसोंसे और आर्टरी के जरिये नैविगेट करने के लिए पूरी परिशुद्धता की जरूरत होती है क्योंकि ऑपरेशन के बाद गंभीर वैस्कुलर संकुचन की संभावना हो सकती है। इतने बड़े ऑपरेशन के बाद भी मरीज ऑपरेशन थियेटर में बड़े आराम से बैठा हुआ था और सफल सर्जरी के पांच दिन बाद ही उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई। अब वह स्वास्थ्यलाभ कर रहा है।
इस प्रक्रिया के अपने अनुभव के बारे में डॉ. कुमार कहते हैं, 'एशिया और यूरोप में इन दिनों रेडियल आर्टरी के जरिये परंपरागत कैथेटराइजेशन बहुत लोकप्रिय प्रक्रिया है। मैंने ऐसे जितने ऑपरेशन किए हैं उनमें लगभग 95 फीसदी अब रेडियल अप्रोच से ही हुए हैं। पिछले महीने ही मैंने 22 कोरोनरी आर्टरी एंजियोग्राफी, 15 एंजियोप्लास्टी स्टेंटिंग और सिर्फ एक फेमोरल पद्धति अपनाई है।
रेडियल एंजियोप्लास्टी के फायदों के बारे में डॉ. कुमार बताते हैं, 'इस प्रक्रिया के लाभ से फेमोरल रूट की तुलना में इसे अधिक सुरक्षित बनाते हैं। रेडियल पद्धति के अन्य बड़े फायदे यह हैं कि इसमें न्यूनतम रुग्णता दर और मृत्यु दर, रक्तस्राव की परेशानियों का खतरा बहुत कम रहता है और इसमें जल्दी स्वास्थ्यलाभ मिलने के कारण मरीज को कुछ ही घंटे में अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है। इसके अलावा मरीज का खर्च भी बहुत कम होता है और प्रक्रिया अपनाने के बाद मुंह से कुछ भी नहीं खाने (एनपीओ) की पाबंदी भी खत्म हो जाती है। बहुत कम जटिलताओं के कारण फेमोरल रूट के मुकाबले इसमें जीवन रहने की अधिक संभावना रहती है।
यदि किसी को सीने के बीचोबीच असहज दबाव, भारीपन, खिंचाव और दर्द जैसा अनुभव होता है और कुछ मिनट से ज्यादा समय तक यह परेशानी रहती है तो वह हार्ट अटैक से जुड़े खतरे का संकेत हो सकता है। दोनों बाजुओं, पीठ, गर्दन, जबड़े या पेट में दर्द या असहजता, सीने में तकलीफ के साथ या उसके बगैर सांस उखड़ना, ठंडा पसीना आना, मितलाहट तथा हल्का सिरदर्द जैसे अन्य लक्षणों में भी मरीज को सचेत हो जाना चाहिए।
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