दिन में 30 बार तक दस्त कर रहा था ये 2 साल का बच्चा! डॉक्टरों ने इस तकनीक की मदद से बचाई बच्चे की जान

हाल ही में एक 2 साल के बच्चे को दिल्ली के एक निजी अस्पताल में दस्त न रुकने की शिकायत के बाद भर्ती कराया गया था। ये बच्चा दिन में 30 बार तक दस्त कर रहा था।

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Written By: Jitendra Gupta | Published : January 27, 2023 7:20 PM IST

मेडिकल साइंस के क्षेत्र में आए दिन कोई न कोई चमत्कार होता रहता है और ये कहने में कोई गुरेज नहीं ये चमत्कार किसी के साथ भी हो सकता है। हाल ही में एक 2 साल के बच्चे को दिल्ली के एक निजी अस्पताल में दस्त न रुकने की शिकायत के बाद भर्ती कराया गया था। और आपको यकीन ही नहीं होगा कि किस तरह बच्चे की जान बचाई गई। आइए आपको बताते हैं एक ऐसे मामले के बारे में जिसे सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे।

क्या था मामला

मामला नई दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशलटी अस्पताल का है, जहां डॉक्टरों ने 2 साल के बच्चे को नया जीवन दिया है। एक्यूट मायलॉइड ल्युकेमिया के इलाज के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लान्ट (बीएमटी) के बाद बच्चे का डायरिया यानि दस्त नियंत्रित नहीं हो पा रहा था। जिसके लिए फेकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लान्ट (एफएमटी) किया गया। एफएमटी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें स्वस्थ व्यक्ति का सामान्य मल मरीज की आंतों में डाला जाता है।

पूरी तरह बिगड़ गया था पाचन

दो साल का दक्ष सिंह एक्यूट डायरिया (दिन में 30 बार) से पीड़ित था। उसके मल की जांच करने के बाद डॉक्टरों ने एक बैक्टीरया क्लॉस्ट्रिडियम डिफिसिले पाया। गंभीर डायरिया के चलते उसका पाचन तंत्र पूरी तरह से गड़बड़ा गया था। जिसके चलते उसमें डीहाइड्रेशन और कमज़ोरी हो गई थी और उसे भूख भी नहीं लग रही थी। डायरिया की वजह से शरीर से बहुत अधिक पानी एवं ज़रूरी पोषक निकलने के कारण उसका जीवन खतरे में पड़ गया। डॉक्टरों में एंटीमाइक्रोबियल एवं अन्य तरीकों से डायरिया का इलाज करने की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

मैक्स हॉस्पिटल, साकेत के डायरेक्टर- बोन मैरो ट्रांसप्लान्टेशन एवं क्लिनिकल हेमेटोलोजी, डॉ. राहुल नैथानी का कहना है कि बोन मैरो ट्रांसप्लान्ट के अक्सर साईड इफेक्ट के रूप में मरीज को डायरिया हो जाता है, लेकिन आमतौर पर यह दवाओं से नियन्त्रित हो जाता है। हालांकि दक्ष को दवाओं से भी कोई असर नहीं हो रहा था। तब हमने एफएमटी करने का फैसला लिया। हमने परिवार को इस प्रक्रिया के बारे में बताया और परिवार इसके लिए तैयार हो गया। दक्ष की बहन पलक जो उसकी बीएमटी डोनर थी, वहीं उसकी एफएफटी डोनर भी बनी।

कैसे हुआ इलाज

फेकल ट्रांसप्लान्ट में एक स्वस्थ डोनर के अच्छे बैक्टीरिया को मरीज़ की आंतों में डाला जाता है जिससे मरीज़ का नॉर्म फेरा फिर से ठीक होने लगता है और उसकी प्रतिरक्षा प्रणालीमें सुधार होने से उसे ठीक होने में मदद मिलती है।

6 दिनों के अंदर कंट्रोल हुए दस्त

मैक्स हॉस्पिटल, साकेत के प्रिंसिपल कन्सलटेन्ट, पीडिएट्रिक लिवर ट्रांसप्लान्ट, गैस्ट्रोएंट्रोलोजी एवं हेपेटोलोजी, डॉ. विक्रम कुमार ने कहा कि एफएमटी के लिए स्वस्थ डोनर के ताज़े मल को सलाईन के साथ मिलाकर डिस्टिल्ड किया जाता है, इसे एंडोस्कोपी के ज़रिए मरीज़ की आंतों में डाला जाता है। हमारी आंतों में लाखों बैक्टीरिया बनते हैं। ये बैक्टीरिया हमारे स्वास्थ्य को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एफएमटी के ज़रिए हम कोलन (बड़ी आंत का एक हिस्सा) अच्छे बैक्टीरिया डालते हैं, जो माइक्रोबियल कम्युनिटी में बदलकर पाचनतंत्र को फिर से स्वस्थ बनाने में मदद करते हैं।

दक्ष का फेकल माइक्रोबायोटा ट्रांसपलान्ट करने के 6 दिनों के अंदर उसका डायरिया कंट्रोल हो गया।

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