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Olive Oil vs Mustard Oil : खाना बनाने से लेकर शरीर में लगाने तक तेल की अहम भूमिका होती है। खासकर खाना बनाने के लिए तेल की अहम भूमिका होती है। खाना पकाने के साथ-साथ शरीर में लगाने के लिए स्वास्थ्य वर्धक तेल का चयन आवश्यक है। पुराने समय से ही खाना पकाने के लिए सरसों के तेल का उपयोग होता आ रहा है लेकिन जब हम आधुनिक समय में देखते हैं तो जैतून का तेल भी लोगों का पसंदीदा बनता जा रहा है। इस लेख में हम आपको विस्तार से बताएंगे कि जैतून का तेल या सरसों के तेल में से कौन सा बेहतर हो सकता है।
सरसों के तेल में मोनोअनसैचुरेटेड फैट (एमयूएफए) लगभग 60% और पॉलीअनसेचुरेटेड फैट (पीयूएफए) लगभग 21% पाया जाता है। संतृप्त वसा 12% और ओमेगा-3 फैटी एसिड की मात्रा अधिक होने के कारण यह हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होते हैं। इसमें ओमेगा-6 फैटी एसिड मध्यम मात्रा में होता है। सरसों के तेल में इरुसिक एसिड की मात्रा अधिक होती है, जिसकी वजह से इसका अधिक सेवन हानिकारक हो सकता है।
जैतून के तेल में मोनोअनसैचुरेटेड वसा लगभग 73%, पॉलीअनसेचुरेटेड वसा (पीयूएफए) लगभग 11%, संतृप्त वसा 14% है और इसमे विटामिन ई और पॉलीफेनोल्स जैसे एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
सरसों के तेल में एमयूएफए और पीयूएफए भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो खराब कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (एचडीएल) को बढ़ाने में मदद करता है।
ओमेगा-3 फैटी एसिड सूजन को कम करने और हृदय रोग को रोकने में मदद करता है। दूसरी ओर, जैतून का तेल एमयूएफए, ओलिक एसिड भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो खराब कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (एचडीएल) को बढ़ाने में मदद करता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो ऑक्सीडेटिव क्षति से बचाते हैं।
सरसों के तेल में एलिल आइसोथियोसाइनेट जैसे यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें रोगाणुरोधी गुण होते हैं।
सरसों के तेल में ओमेगा-3 और फैटी एसिड भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो साहरी में सूजन कम करने का काम करते हैं। वहीं दूसरी ओर जैतून के तेल में पॉलीफेनोल्स प्रचूर मात्रा में पाया जाता है, जो सूजन को कम करने का काम करता है।
जैतून के तेल में विटामिन ई और पॉलीफेनॉल जैसे एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो कोशिकाओं को क्षति से बचाने और पुरानी बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद करता है।
सरसों के तेल में इरुसिक एसिड प्रचूर मात्रा में पाया जाता है, जो अधिक मात्रा में हानिकारक हो सकता है। हृदय से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं। हालांकि इससे घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसके अधिक सेवन से ही समस्या होती है।
जैतून का तेल पाचनतंत्र को स्वस्थ बनाने में मददगार साबित हो सकते हैं। लेकिन मात्रा का विशेष ध्यान रखें।।
नियमित रूप से जैतून के तेल के सेवन से ब्लडप्रेशर को कम करने में मदद मदद मिलता है, जिससे हृदय रोग का खतरा कम हो सकता है।
सरसों का तेल तीव्र, तीखा होता है। इस लिए यह सभी व्यंजनों के लिए सही नहीं होता। दूसरी ओर, जैतून के तेल को विभिन्न व्यंजनों के लिए उपयुक्त होता है।
जैतून के तेल में मौजूद एमयूएफए से अधिक समय तक पेट भर रहता है, जिससे अधिक खाने से बचा जा सकता है। यदि आप भी मोटापा कम करना चाहते हैं तो जैतून के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं।
जैतून के तेल से खाना बनाने में कम धुआं होता है। जिससे अधिक ताप पर खाना पकाने के लिए जैतून का अनुकयुक्त माना जाता है।
हृदय के लिए दोनों तेल फायदेमंद हैं, लेकिन जैतून के तेल को एमयूएफए और एंटीऑक्सिडेंट और इरुसिक एसिड की अनुपस्थिति के कारण बेहतर माना जाता है। जैतून के तेल में एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जिसके कारण यह अधिक फायदेमंद हो सकता है। इसके साथ ही जैतून के तेल को विभिन्न प्रकार से इस्तेमाल किया जा सकता है।
सरसों का तेल ज्यादातर पारंपरिक भारतीय खाना पकाने में इसके स्वाद और रोगाणुरोधी गुणों के लिए पसंद किया जाता है। दूसरी ओर, जैतून का तेल भूमध्यसागरीय व्यंजन, सलाद और कम से मध्यम ताप पर खाना पकाने के लिए बेहतर अनुकूल है।