
... Read More
Written By: Anshumala | Published : September 3, 2018 5:02 PM IST
भारत के कई क्षेत्रों के लोगों में विभिन्न विटामिनों की भारी कमी। © Shutterstock
भारत में चिकित्सकों की सबसे पसंदीदा डायग्नॉस्टिक चेन एसआरएल डायग्नॉस्टिक्स के पास उपलब्ध डाटा के विश्लेषण से पूरे भारत के लोगों में अनिवार्य विटामिनों की कमी की बात सामने आई है। यह समस्या विशेष कर देश के शहरी आबादी में अधिक व्याप्त है। तेजी से शहरीकरण और साथ ही जीवनशैली में आए बदलाव और खान-पान की गलत आदतों की वजह से स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण मानकों पर भारतीयों के पोषण में बड़ी कमियां पाई गई हैं। एसआरएल के डाटा के इस विश्लेषण ने स्पष्ट कर दिया है कि विटामिन ए, सी, बी 1, बी 6, बी 12 और फोलेट में जिस प्रकार की कमी है, उससे लंबे समय में कई गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
एसआरएल के विश्लेषण से यह सामने आया है कि विटामिन की कमी देश के अन्य हिस्सों की तुलना में सबसे अधिक उत्तर भारतीय आबादी में है। यह डाटा 2015 और 2018 के बीच पूरे भारत के 29 राज्यों और संघीय प्रदेशों के एसआरएल लैब्स में 9.5 लाख से अधिक सैम्पल की जांच पर आधारित है।
क्यों जरूरी हैं विटामिन्स
विटामिन सी नर्व इम्पल्स ट्रांसमिशन के लिए जरूरी कोलाजेन (जख्म भरने के लिए जरूरी), एल-कार्नाटीन और कुछ न्यूरोट्रांसमीटर के सिंथेसिस में सहायक है। साथ ही प्रोटीन के मेटाबॉलिज्म में सक्रिय रहता है। इसके अतिरिक्त यह रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज से लड़ने और वनस्पति प्रधान आहार से नॉन-हीम आयरन के एब्जॉर्बशन में सहायक है।
पढ़ें- बच्चे में बढ़ता कोलेस्ट्रॉल लेवल, कहीं विटामिन डी की कमी तो नहीं ?
विटामिन बी कॉम्प्लेक्स न्युट्रिएंट्स जैसे कि बी 1, बी 2, बी 6 स्वस्थ शरीर की रचनात्मक इकाई का काम करते हैं और इनका हमारे एनर्जी लेवेल, मस्तिष्क के कार्य और सेल के मेटाबॉलिज्म पर सीधा प्रभाव दिखता है। इसके अतिरिक्त विटामिन बी 12 और फोलिक एसीड मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया में आपस में बहुत जुड़े हुए हैं। इनकी कमी से नर्व इम्पल्स ट्रांसमिशन में खराबी और एनीमिया की समस्या भी हो सकती है। फोलिक एसीड की कमी का सबसे गंभीर दुष्परिणाम गर्भवती महिलाओं में देखा जाता है। इससे उनके बच्चे विकृत पैदा हो सकते हैं। नियत समय से पहले बच्चे के जन्म और नवाजत की मृत्यु की समस्या बढ़ सकती है। उन्हें दिल की बीमारी और सही विकास नहीं होने जैसी अन्य समस्याएं हो सकती हैं। विटामिन ए आंखों की सही रोशनी के लिए सबसे जरूरी विटामिन है।
विटामिन ए, सी, बी 1, बी 2, बी 12 और फोलेट के पूरे भारत में किए गए डायग्नॉस्टिक टेस्ट के डाटा के विश्लेषण में देखा गया कि 24 प्रतिशत सैम्पलों (228,915 सैम्पलों) में कम से कम एक विटामिन में कमी है। इसलिए यह कड़वा सच है कि आज जागरूकता की जरूरत केवल गांव-देहात नहीं बल्कि शहरों में भी है, जहां लोगों को निरंतर शिक्षित करना और याद दिलाना होगा कि संतुलित और पोषण युक्त आहार पर ध्यान नहीं देने के कितने घातक दुष्परिणाम हो सकते हैं।
उत्तर भारत की स्थिति सबसे खराब
विटामिन ए, सी, बी 12 और फोलिक एसीड में प्रतिशत कमी के हिसाब से सबसे खराब स्थिति उत्तर भारत की है, जबकि विटामिन बी 1 की सबसे अधिक कमी दक्षिण भारत में देखी गई। विटामिन बी 2 की सबसे अधिक कमी पश्चिम क्षेत्र के मरीजों में दर्ज की गई। महिला एवं पुरुष आधारित विस्तृत विश्लेषण में देखा गया कि विटामिन ए, बी 2 और बी 6 की कमी महिलाओं में अधिक है, जबकि पुरुषों में विटामिन सी एवं बी 12 की अधिक कमी है।
पढ़ें- महिलाओं में विटामिन डी कमी से बढ़ सकता है डायबिटीज का खतरा
एसआरएल डायग्नॉस्टिक में शोध-विकास एवं मोलेक्युलर पैथलॉजी के सलाहकार और मेंटर डॉ. बी आर दास का कहना है, ‘‘हर वर्ग के लोगों में जांच के परिणामों में असामान्यता पर ध्यान देने से यह सामने आया कि भारत के चारों क्षेत्रों में विटामिन सी, बी 1, बी 2, बी 12 और फोलिक एसिड की कमी की अधिक समस्या 31 से 45 वर्ष के लोगों में है। संभव है कि इसकी बड़ी वजह सफर करते हुए कुछ खा लेना या स्नैक्स में फास्ट फूड लेना है और दैनिक आहार में पोषक फल और सब्ज़ियां नहीं होने से स्थिति और बिगड़ जाती है।’’
डॉ. दास ने इस संबंध में विस्तार से बताया, ‘‘विटामिन ए हमारे आहार में मौजूद ऑर्गेनिक कम्पाउंड है जो मेटाबॉलिक प्रक्रिया और अनुकूल स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। इसकी कमी से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इससे पहले प्रकाशित एक विश्लेषण में हम ने देखा कि एसआरएल में सभी आयु वर्गों के लोगों के विटामिन डी की जांच के लगभग 80 प्रतिशत सैम्पल में विटामिन डी की कम या अपर्याप्त मात्रा पाई गई।’’
पिछले कई वर्षों में प्राप्त एसआरएल के डाटा का यह विश्लेषण कम्पनी की खास पहल है जिसका मकसद भारत के लोगों की मौजूदा सोच बदलना है कि स्वास्थ्य समस्या आ जाने के बाद निदान करा लेंगे। एसआरएल का लक्ष्य लोगों में समस्या आने से पहले रोकथाम की सोच विकसित करना है। आज कम्पनी अपने पास उपलब्ध अनाम डाटा (एनोनिमाइज्ड डाटा) के विश्लेषण के लिए मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीकियों पर जोर दे रही है ताकि हर मरीज के स्वास्थ्य की स्थिति का स्पष्ट दृष्टिकोण सामने आए।